भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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छन्द-जाय देख्यो चतुरमुख कहैं नाहि पलक उधारई ॥
कछुक दिन सो रहा तहवाँ बहुरि युक्ति विचारई ॥
कौन विधि यह जागिहै अब करें कौन उपाय हो ॥
मन गुनति सोच बहुत विधि ध्यान जननी लाय हो ॥ २४ ॥

ब्रह्माको जगानेके लिये अद्याका गायत्रीको युक्ति बताना ।

सोरठा-अद्या आयसु पाइ, गायत्री तब ध्यान महैं ॥

निज कर परसेहु जाइ, ब्रह्मा तबहीं जागिहैं ॥

गायत्री पुनि कीन्ही तैसी । माता जुगति बतायी जैसी ॥

गायत्री तब चित्त लगाई । चरण कमल कहैं परसेउ जायी ॥

ब्रह्माका जागकर गायत्रीपर क्रोध करना ।

ब्रह्मा जाग ध्यान मन डोला । व्याकुल भयो बचन तब बोला ॥

कवन अहै पापिन अपराधी । कहा छुडायहु मोरि समाधी ॥

साप देहैं तो कहैं मैं जानी । पिता ध्यान मोहि खंडयो आनी ॥

गायत्रीवचन ब्रह्मा प्रति ।

कहि गायत्री मोहि न पापा । बूझि लेहु तब देहहु सापा ॥

कहों तोहिसो सांची बाता । तोहि लेन पठयी तुव माता ॥

चलहु बेगि जनि लावहु बारे । तुम बिन रचना को बिस्तारे ॥

ब्रह्मावचन गायत्री प्रति ।

ब्रह्मा कहे कौन विधि जाऊँ । पिता दरस अजहूँ नहि पाऊँ ॥

गायत्रीवचन ।

गायत्री कह दरस न पैहो । बेगि चलहु नहि तो पछतैहो ॥

ब्रह्माका गायत्रीको झूठी साक्षी देनेको कहना और गायत्रीका

ब्रह्मासे रति करनेकी बात कहना ।

ब्रह्मा कहे देहु तुम साखी । परस्यो सीस देख मैं आंखी ॥

ऐसे कहो मातु समुझायी । तो तुम्हरे संग हम चलि जायी ॥

गायत्रीवचन ।

कह गायत्री सुन स्तुति धारी । हम नहिं मिथ्या बचन उचारी ॥

जो मम स्वार्थ पुरवहु भाई । तो हम मिथ्या कहब बनाई ॥

ब्रह्मावचन ।

कह ब्रह्मा नहिं लखी कहानी । कहैं बुझाय प्रगटकी बानी ॥