कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 155, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंमोर दरस तिहुँ सुत नहिं पैहँ । जो मुहि खोजत जन्म सिरैहँ ॥
ऐसो मता दिढेहो जानी । पुरुष भेद नहिं पावै प्रानी ॥
त्रय सुत जबहिं होहि बुधिवाना । सिधु मथन दे पठहु निदाना ॥
कबीरबचन धर्मदास प्रति ।
छन्द-कहेउ बहुत बुझाय देविहि गुप्त भये तब औहिहो ॥
सून्य गुफहि निवास कीन्हों भेद लह को ताहि हो ॥
वह गुप्त भा पुनि संग सबके मनै निरंजन जानिये ॥
मन पुरुष भेद उच्छेद देवे आपु परगट आनिके ॥
सोरठा-जीव भये मति हीन, परसि अगम सो कालको ।
जनम जनम भय खीन, मुरुचा करम अकर्मको ॥ १९ ॥
जीव सतावे काल, नाना कर्म लगायके ।
आप चलावै चाल, कस्ट देइ पुनि जीवको ॥ २० ॥
सिन्धुमथन और चौदह रत्न उत्पत्तिकी कथा ।
त्रय बालक जब भये सयाने । पठये जननी सिधु मथाने ॥
बालक मातै खेल खिलारी । सिन्धुमथन नहिं गयेउ खरारी ॥
तेहि अंतर इक भयो तमासा । सो चरित बूझो धर्मदासा ॥
धान्यो योग निरंजन राई । पवन अरंभ कीन्ह बहुताई ॥
यागो पवन रहित पुनि जबहीं । निसरे उवेद स्वास संग तबहीं ॥
स्वास संग आयेउ सो वेदा । विरला जन कोई जाने भेदा ॥
अस्तुति कीन्ह वेद पुनि ताहां । आज्ञा का मोहि निरगुन नाहां ॥
कह्यो जाय कर सिधु निवासा । जेहि भेंटे जैहौ तिहि पास ॥
उठी अवाज रूप नहिं देखा । जोति अगम दिखलावत भेखा ॥
चलेउ वेद पुनि तेज अपाने । तेज अन्न पुनि विष संधाने ॥
चले वेद तहँवा को जाई । जहँवा सिधु रचा धर्मराई ॥
पहुँचे वेद तब सिन्धु मँझारा । धर्मराय तब युक्ति विचारा ॥
गुप्त ध्यान देबिहिं समुझावा । सिन्धु मथन कहँ कस विलमावा ॥
पठवहु बेगि सिन्धु त्रय वारा । दिठकै सोचहु बचन हमारा ॥
बहुरि आप पुनि सिन्धु समाना । देवी कीन्ह मथन अनुमाना ॥
तिहुँ बालक को कहा समुझायी । आसिष दे पुनि तहाँ पठायी ॥
पैहो वस्तु सिन्धुके माहीं । जाहु बेगि तीनों सुत ताहीं ॥
चलिभौ ब्रह्मा मान सिखाही । दोइ लहुरा पुनि पाछे जाई ॥