कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 152, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंपुरुषका शाप निरंजन प्रति ।
लच्छ जीव नित प्राप्त करहू । सवा लच्छ नित प्रति विस्तरहू ॥
छन्द-पुनि कीन्ह पुरुष तिवान किमि मेटि डारो काल हो ॥
कठिन काल कराल जीवन बहुत करइ बिहाल हो ॥
यहि मेटत मुहि अब ना बने नाल । इक सुत षोडसा ॥
एक मेटत सबै मिटिहैं वचन डोल अडोलसा ॥ १६ ॥
सोरठा-डोले वचन हमार, जो अब मेटों धरमको ।
वचन करौं प्रतिपाल, देश मोर अब ना लहै ॥ १६ ॥
सत्पुरुषका योगीतजीको निरञ्जनके पास उसे मानसरोवरसे
निकाल देनेकी आज्ञा देकर भोजना ।
जोगजीत कहैं पुरुष बुलावा । धर्म चरित सब कहि समुझावा ॥
सत्पुरुषवचन-योगजीत प्रति ।
जोगजीत तुम बेगि सिधारो । धर्मरायको मारि निकारो ॥
मानसरोवर रहन न पावै । अब यहि देस काल नहि आवै ॥
जाके रहे धरम वहि देसा । स्वर्ग मृत्यु पाताल नरेसा ॥
धर्मके उदर माहि है नारी । तासो कहो निज शब्द सम्हारी ॥
उदर फारिकै बाहर आवै । कूर्म उदर विदारि फल पावै ॥
धरमरायसे कहो विलोई । वहै नारि अब तुम्हरी होई ॥
कबीरवचन-धर्मदास प्रति ।
जोग जीत चल भे सिर नाई । मानसरोवर पहुँचे जाई ॥
जोगजीत कहैं देखा जबहीं । अति भो काल भयंकर तबहीं ॥
निरञ्जनवचन-योगजीत प्रति ।
पूछा काल कौन तुम आहू । कौन काज तुम यहाँ सिधाहू ॥
योगजीतवचन-निरंजन प्रति ।
जोगजीत अस कहे पुकारी । अहो धरम तुम प्राप्त नाारी ॥
आज्ञा पुरुष दीन्ह यह मोही । इहिते बेगि निकारों तोही ॥
जोग जीतवचन-अद्या प्रति ।
जोगजीत कन्या सो कहिया । नारि काहे उदरमहँ रहिया ॥
उदर फारि अब आवहु बाहर । पुरुष तेज सुमिरो तेहि ठाहर ॥