कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 157, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंजो जेहि मिलै लेहु सो जाई । अब जनि करो विलंब तुम भाई ॥
त्रय सुत चले तब माथ निवायी । जो कछु कहेउ करब हम जायी ॥
मथ्यो सिंधु कछु विलंब न कीन्हा । निकसे चौदह रतन सो लीन्हा ॥
चौदह रतनकी निकसी खानी । ले माता पहुँ पहुँचे आनी ॥
तीनहु बन्धु हरषित हँ लीन्हा । विस्नुसुधा पायउ हर विष दीन्हा ॥
अद्याका तीनों पुत्रोंको सृष्टि रचनेकी आज्ञा देना और
सब मिलकर पांच खानकी उत्पत्ति करना ।
पुनि माता अस वचन उचारा । रचहु सृष्टि तुम तीनों वारा ॥
अंडज उत्पत्ति कीन्हीं माता । पिंडज ब्रह्मा कर उत्पाता ॥
ऊषमजखानि विस्नु व्यवहारा । सिव अस्थावर कीन्ह पसारा ॥
चौरासी लाख योइन कीन्हा । आधा जल आधा थल दीन्हा ॥
एक तत्त्व अस्थावर जाना । दोय तत्त्व ऊषमज परमाना ॥
तीन तत्त्व अंडज निरमायी । चार तत्त्व पिंडज उपजायी ॥
पाँच तत्त्व मानुष विस्तारा । तीनों गुण तेहि माहिँ सवोंरा ॥
ब्रह्माका वेद पढकर निराकारका पता पाना ।
ब्रह्मा वेद पढन तब लागा । पढत वेद तब भा अनुरागा ॥
कहे वेद पुरुष इक आही । निराकार जेहि रूप न छांही ॥
सून्यमाहिँ वह जोत दिखावे । चितवत देह द्विष्टि नहिं आवे ॥
स्वर्ग सीस पग आहि पताला । तेहि मत ब्रह्मा भौ मतवाला ॥
चतुरानन कहि विस्नु बुझावा । आहि पुरुष मोहि वेद लखावा ॥
पुनि ब्रह्मा सिवसों अस कहई । वेद मथन पुरुष एक अहई ॥
अहै पुरुष इक वेद बतावा । वेद कहे हम भेद न पावा ॥
ब्रह्माका मातासे पिताका पता पूछना ।
कबीरबचन धर्मदास प्रति ।
तब ब्रह्मा माता पहुँ आवा । करिपरनाम तिहि टेके पाँवा ॥
ब्रह्माबचन अद्या प्रति ।
हे माता मोहि वेद लखावे । सिरजनहार और बतलावे ॥
छन्द-ब्रह्मा कहे जननी सुनो कहहु कहा कंत तुम्हार है ॥
कीजै कुपा जनि मोहि दुरावो कहाँ पिता हमार है ॥