कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 161, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंछन्द-जाय देख्यो चतुरमुख कहैं नाहि पलक उधारई ॥
कछुक दिन सो रहा तहवाँ बहुरि युक्ति विचारई ॥
कौन विधि यह जागिहै अब करें कौन उपाय हो ॥
मन गुनति सोच बहुत विधि ध्यान जननी लाय हो ॥ २४ ॥
ब्रह्माको जगानेके लिये अद्याका गायत्रीको युक्ति बताना ।
सोरठा-अद्या आयसु पाइ, गायत्री तब ध्यान महैं ॥
निज कर परसेहु जाइ, ब्रह्मा तबहीं जागिहैं ॥
गायत्री पुनि कीन्ही तैसी । माता जुगति बतायी जैसी ॥
गायत्री तब चित्त लगाई । चरण कमल कहैं परसेउ जायी ॥
ब्रह्माका जागकर गायत्रीपर क्रोध करना ।
ब्रह्मा जाग ध्यान मन डोला । व्याकुल भयो बचन तब बोला ॥
कवन अहै पापिन अपराधी । कहा छुडायहु मोरि समाधी ॥
साप देहैं तो कहैं मैं जानी । पिता ध्यान मोहि खंडयो आनी ॥
गायत्रीवचन ब्रह्मा प्रति ।
कहि गायत्री मोहि न पापा । बूझि लेहु तब देहहु सापा ॥
कहों तोहिसो सांची बाता । तोहि लेन पठयी तुव माता ॥
चलहु बेगि जनि लावहु बारे । तुम बिन रचना को बिस्तारे ॥
ब्रह्मावचन गायत्री प्रति ।
ब्रह्मा कहे कौन विधि जाऊँ । पिता दरस अजहूँ नहि पाऊँ ॥
गायत्रीवचन ।
गायत्री कह दरस न पैहो । बेगि चलहु नहि तो पछतैहो ॥
ब्रह्माका गायत्रीको झूठी साक्षी देनेको कहना और गायत्रीका
ब्रह्मासे रति करनेकी बात कहना ।
ब्रह्मा कहे देहु तुम साखी । परस्यो सीस देख मैं आंखी ॥
ऐसे कहो मातु समुझायी । तो तुम्हरे संग हम चलि जायी ॥
गायत्रीवचन ।
कह गायत्री सुन स्तुति धारी । हम नहिं मिथ्या बचन उचारी ॥
जो मम स्वार्थ पुरवहु भाई । तो हम मिथ्या कहब बनाई ॥
ब्रह्मावचन ।
कह ब्रह्मा नहिं लखी कहानी । कहैं बुझाय प्रगटकी बानी ॥