भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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जीव सोहँगम दूसर नाहीं । जीव सो अंस पुरुषको आही ॥
सकती पुनि तीन पुरुष उत्पाना । चेतनि उलंघनि अभया जाना, ॥
छन्द-पुरुष सेवावश भये तब अष्टंगहि दीन्ह हो ॥
मानसरोवर जाहु कहिया देहु धर्महि चीन्ह हो ॥
अष्टंगी कन्या हती जेहि रूप शोभा अति बनी ॥
जाहु कन्या मानसरवर करहु रचना अति घनी ॥ १५ ॥

सोरठा-चौरासी लख जीव, मूल बीज तेहि संग दे ॥

रचना रचहु सजीव, कन्या चलि सिर नायके ॥ १५ ॥

यह सब दीन्हे आदि कुमारी । मान सरोवर चलि भइ नारी ॥
ततछिन पुरुष सहज टेरावा । धावत सहज पुरुष पहिं आवा ॥

पुरुषवचन सहजप्रति ।

जाइ सहज धरम यह कहहूँ । दीन्ही वस्तु जस तुम चहहूँ ॥
मूल बीज तुम पहुँ पठवावा । करहु स्लिष्टि जस तुम मन भावा ॥
मान सरोवर जाइ रहाहूँ । तहँते होइ हैं स्लिष्टि उराहूँ ॥

पुनि सहजका निरञ्जनके ढिग जाना ।

चले सहज तहवाँ तब आये । धर्म धार जहँ ठाढ रहाये ॥
कहेउ सु वचन पुरुषको जबहीं । धर्मराय सिर नायो तबहीं ॥

निरञ्जनका मानसरोवरमें अच्छाको पाकर मोहवश हो उसे निगल
जाना और सत्पुरुषका शाप पाना ।

पुरुष वचन सुन तबहीं गाजा । मान सरोवर आन विराजा ॥
आवत कामिनि देख्यो जबहीं । धरमराय मन हरण्यो तबहीं ॥
कला उभय अष्टंगी केरी । धरमराय तिहिं दिदकै हेरी ॥
कला उदोत अंत कछु नाहीं । काल मगन हँ निरखे ताही ॥
निरखत धरम सुभयो अधीरा । अंग अंग सब निरखसरीरा ॥
धरमराय कन्या कह ग्रासा । काल स्वभाव सुनो धर्मदासा ॥
कीनो ग्राह काल अन्याई । तब कन्या चित विस्मय आई ॥
ततछन कन्या कीन्ह पुकारा । काल निरंजन कीन्ह अहारा ॥
तबही धर्म सहज लग आई । सहज सून्य तब लीन्ह छुड़ाई ॥
पुरुष ध्यान कूर्म अनुसारा । मोसनकाल कीन्ह अधिकारा ॥
तीन शीश मम भच्छन कीन्हो । हो सत्पुरुष दया भल चीन्हो ॥
यही चरित्र पुरुष भल जानी । दीन्ह सापसों कहीं बखानी ॥