भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पुरुषका शाप निरंजन प्रति ।

लच्छ जीव नित प्राप्त करहू । सवा लच्छ नित प्रति विस्तरहू ॥
छन्द-पुनि कीन्ह पुरुष तिवान किमि मेटि डारो काल हो ॥

कठिन काल कराल जीवन बहुत करइ बिहाल हो ॥

यहि मेटत मुहि अब ना बने नाल । इक सुत षोडसा ॥

एक मेटत सबै मिटिहैं वचन डोल अडोलसा ॥ १६ ॥

सोरठा-डोले वचन हमार, जो अब मेटों धरमको ।

वचन करौं प्रतिपाल, देश मोर अब ना लहै ॥ १६ ॥

सत्पुरुषका योगीतजीको निरञ्जनके पास उसे मानसरोवरसे
निकाल देनेकी आज्ञा देकर भोजना ।

जोगजीत कहैं पुरुष बुलावा । धर्म चरित सब कहि समुझावा ॥

सत्पुरुषवचन-योगजीत प्रति ।

जोगजीत तुम बेगि सिधारो । धर्मरायको मारि निकारो ॥

मानसरोवर रहन न पावै । अब यहि देस काल नहि आवै ॥

जाके रहे धरम वहि देसा । स्वर्ग मृत्यु पाताल नरेसा ॥

धर्मके उदर माहि है नारी । तासो कहो निज शब्द सम्हारी ॥

उदर फारिकै बाहर आवै । कूर्म उदर विदारि फल पावै ॥

धरमरायसे कहो विलोई । वहै नारि अब तुम्हरी होई ॥

कबीरवचन-धर्मदास प्रति ।

जोग जीत चल भे सिर नाई । मानसरोवर पहुँचे जाई ॥

जोगजीत कहैं देखा जबहीं । अति भो काल भयंकर तबहीं ॥

निरञ्जनवचन-योगजीत प्रति ।

पूछा काल कौन तुम आहू । कौन काज तुम यहाँ सिधाहू ॥

योगजीतवचन-निरंजन प्रति ।

जोगजीत अस कहे पुकारी । अहो धरम तुम प्राप्त नाारी ॥

आज्ञा पुरुष दीन्ह यह मोही । इहिते बेगि निकारों तोही ॥

जोग जीतवचन-अद्या प्रति ।

जोगजीत कन्या सो कहिया । नारि काहे उदरमहँ रहिया ॥

उदर फारि अब आवहु बाहर । पुरुष तेज सुमिरो तेहि ठाहर ॥