कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 150, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंदेखत सहज धर्म हरपाना । सेवा बस पुरुष तब जाना ॥
सहजवचन ।
कहै सहज सुनु धर्मराया । केहि कारन अब सेवा लाया ॥
निरञ्जनवचन ।
धर्म कहे तब सीस नयायी । देहु ठौर जहँ बैठौं जायी ॥
सहजवचन
तब सहज अस भाषे लीन्हा । सुनहु धर्म तोहि पुरुष सब दीन्हा ॥
कूर्म उदर सो जो कछु आवा । सो तोहि देन पुरुष फरमावा ॥
तीनों लोक राज तोहि दीन्हा । रचना रचहु होहु जनि भीना ॥
निरञ्जनवचन ।
तबै निरंजन विनती लायी । कैसे रचना रचूँ बनायी ॥
पुरुषहि कहौ जोरि युग पानी । मैं सेवक दुतिया नहि जानी ॥
पुरुष सो विनती करो हमारा । दीजे खेत बीज निज सारा ॥
मैं सेवक दुतिया नहि जानू । ध्यान पुरुषको निसिदिन आनू ॥
पुरुषहि कहो जाइ यह बानी । देहु बीज अम्बर सहिदानी ॥
कबीरवचन-धर्मदास प्रति ।
सहज कह्यो पुनि पुरुषहि जाई । जस कछु कह्यो निरंजनराई ॥
गयो सहज निज दीप सुखासन । जबहि पुरुष दीन्हें अनुशासन ॥
सेवा वश सतपुरुष दयाला । गुण औगुण नहिंचित्ति किरपाला ॥
अद्याको उत्पत्ति ।
इच्छा कीन पुरुष तेहि बारा । अष्टंगी कन्या उपचारा ॥
अष्ट बाहु कन्या होय आई । बायें अंग सो ठाढ़ रहाई ॥
अद्यावचन ।
माथ नाइ पुरुष सो कहई । अहो पुरुष आज्ञा कस अहई ॥
पुरुषवचन अद्या प्रति । सत्यपुरुषको अद्याको मूलबीज देना ।
तबहीं पुरुष वचन परगासा । पुत्री जाहु धरमके पासा ॥
देहुँ वस्तु सो लेहु सम्हारी । रचहु धर्म मिलि उत्पत्ति वारी ॥
कबीरवचन-धर्मदास ।
दीन्हो बीज जीव पुनि सोई । नाम सोहँग जीव कर होई ॥