भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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ब्रह्मावचन ।

कह ब्रह्मा दोऊ हैं साखी । परस्यो सीस देख इन आँखी ॥

अद्यावचन गायत्री प्रति ।

तब माता बूझे अनुसारि । कहु गायत्री वचन विचारी ॥

तुम देखा इन दरसन पावा । कहो सत्य दरसन परभावा ॥

गायत्रीवचन ।

तब गायत्री वचन सुनावा । ब्रह्मा दरस सीस पितु पावा ॥

मैं देखा इन परसेउ सीसा । ब्रह्महि मिले देव जगदीसा ॥

छन्द-लेइ पुहुप परसेउ सीस पितु इन द्विष्टि मैं देखत रही ।

जल ढार पुहुप चढाय दीन्ह हे जननि यह है सही ॥

पुहुपते पुहुपावती भयी प्रगट ताही ठामते ॥

इनहु दरसन लह्यो पितुको पूछहू इहि वामते ॥ २६ ॥

हो जननी यह है सही तुम पूछि लो पुहुपावती ।

सबही साँच मैं तोसो कहूँ नहि झूठ है एको रती ॥

अद्यावचन पुहुपावती प्रति ।

माता कह पुहुपावतीसो कहो सत्यहि मो सना ।

जो चढे सीसहि पिताके तुम वचन बोलहु ततखना ॥ २७ ॥

सोरठा-कहु पुहुपावति मोहि, दरश कथा निरवारके ॥

यह मैं पूछों तोहि, किमि ब्रह्मा दरसन किये ॥ १७ ॥

सावित्रीवचन ।

पुहुपावती बेचन तब बोली । माता सत्य वचन नहि डोली ॥

दरसन सीस लह्यो चतुरानन । चढेसीस यह धर निश्चय मन ॥

साख सुनत अद्या अकुलानी । भाअचरज यह मरम न जानी ॥

अद्याकी चिन्ता

अलख निरंजन अस प्रण भाखी । मोकहैं कोउ न देखै आँखी ॥

ये तीनहुँ कस कहहि लबारी । अलख निरंजन कहहु सम्हारी ॥

ध्यान कीन्ह अष्टंगी तेहि छन । ध्यान माहिँ अस कह्यो निरंजन ।

निरञ्जनवचन ।

ब्रह्मा मोर दरश नहि पाया । झूठि साखि इन आय दिवाया ॥

तीनो मिथ्या कहे बनाई । जनि मानहु यह है लबराई ॥