भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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छन्द-त्रय सुत बाल खेलत चले ज्यों सुभग बाल मरालहो ।
एक गहि छोडत मही पुनि एक कर, गहि चलत लटपट चालहो ॥
छनहिं धावत छन अस्थिर खड़े छनभुजहिं गर लावहीं ।
तेहि समयकी सोभा भली नहिं देवता कहैं गावहीं ॥

सोरठा-गये सिन्धुके पास, भये ठाढ तीनों जने ।
जुगति मथन परकास, एक एकको निरखहीं ॥ २१ ॥

प्रथम बार सिन्धुमंथन ।

तीनों कीन्ह मथन तब जाई । तीन वस्तु तीनों जन पाई ॥
ब्रह्मा वैद तेज तेहि छोटा । लहुरा तासु मिले विष खोटा ॥
भेटी वस्तु त्रय तीनों भाई । चलि भये हर्ष कहत जहैं माई ॥
मातापहैं आये त्रय बारा । निज २ वस्तु प्रगट अनुसारा ॥
माता आज्ञा कीन्ह प्रकासा । राखु वस्तु तुम निज २ पास ॥

द्वितीय बार सिन्धुमंथन ।

पुनि तुम मथहु सिन्धु कहैं जाई । जो जिहि मिले लेहु सो भाई ॥
कीन्ह चरित अस आदि भवानी । कन्या तीन कीन्ह उत्पानी ॥
कन्या तीन उत्पान्यो जबहीं । अंस वारि महैं नायो सबहीं ॥
पठयो सिधुमाहिं पुनि ताहीं । त्रय सुत मरम सो जानत नाहीं ॥
पुनि तिन मथन सिधुको, कीन्हा । भेंटयो कन्या हर्षित ह्वै लीन्हा ॥
कन्या तीनहु लीन्हे साथ । आ जननी कहैं नायउ माथा ॥
सब माताके आगे कीन्हा । माता बाँटि तिन्हन कहैं दीन्हा ॥
माता कहे सुनहु सुत मोरा । यह तो काज भये सब तोरा ॥
एक एक बाँटि तीनहुको दीन्हा । करहु भोग अस आज्ञा कीन्हा ॥
सावित्री ब्रह्मा तुम लेऊ । है लक्ष्मी विष्णु कहैं देऊ ॥
पारवती शंकर कहैं दीन्ही । ऐसी माता आज्ञा कीन्ही ॥
तीनउ जन लीन्ही सिर नार्ई । दीन्ह अद्या जस भाग लगाई ॥
पाई कामिनी भये अनंदा । जस चकोर पाये निश्चिचंदा ॥
काम वसी भए तीनों भाई । देव दैत दोनों उपजाई ॥
धरमदास परखो यह बाता । नारी भयी हती सो माता ॥

तृतीय बार सिन्धुमंथन ।

माता बहुरि कहे समझायी । अब फिर सिंधु मथो तुम जाई ॥