कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 159, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंअद्यावचन ब्रह्मा प्रति ।
कहे जननी सुनो ब्रह्मा कहों तोसों सत्तही ॥
सात स्वर्ग है माथ ताको चरन पताल सप्तही ॥ २२ ॥
ब्रह्माका पिताके खोजको जाना ।
सोरठा-लेहु पुष्प तुम हाथ, जो इच्छा तिहिं दरसकी ॥
जाय नवाओ माथ, ब्रह्मा चलै शिर नाइकै ॥ २३ ॥
जननी गुन्यो वचन चितमाहीं । मोरि कही यह मानति नाहीं ॥
या कहैं वेद दीन्ह उपदेशा । पै दरस ते नहिं पावे भेसा ॥
कह अष्टंगि सुनो रे वारा । अलख निरंजन पिता तुम्हारा ॥
तासु दरश नहिं पैहौ पूता । यह मैं वचन कहैं निज गूता ॥
ब्रह्मा सुनि व्याकुल ह्वै धावा । परसन सीस ध्यान हिय लावा ॥
ब्रह्मा चले जननि सिर नाई । सीस परसि आवों तोहि ठाई ॥
तुरतहि ब्रह्मा दीन्ह रिगायी । उत्तर दिशा बेगि चलि जायी ॥
आज्ञा माँगि विस्नु चले बाला । पिता दरशको चले पताला ॥
इत उत चितय महस न डोला । सेवा करत कछू नहिं बोला ॥
तेहि सिव मन अस चित अभावा । सेवा करन जननि चित लावा ॥
यहि विधि बहुत दिवस चलियऊ । माता सोच पुत्र कह कियऊ ॥
विष्णुका पिताके खोजसे लौटकर पिताके चरण तक न पहुंचनेका
बूतान्त अद्यासे कहना ।
प्रथम विस्नु जननी ढिग आये । अपनी कथा कहि समुझाये ॥
भेटचो नाहि मोहि पगु ताता । विष ज्वाला स्यामल भौ गाता ॥
व्याकुल भयउ तबै फिरि आवा । पिता पगु दरस मैं नहिं पावा ॥
सुनि हरषित भई आदिकुमारी । लीन्ह विस्नु कहैं निकट दुलारी ॥
चूमेउ बदन सीस दियो हाथा । सत्य सत्य बोलेउ सुत बाता ॥
धर्मदासवचन कबीर प्रति ।
कहे धरमनि यह संशय बीती । साहब कहहु ब्रह्माकी रीती ॥
पिता सीस तिन पर छन कीन्हा । कि होय निरास पीछे पगु दीन्हा ॥
छन्द-गयऊ ब्रह्मा सीस परसन, कथा ता दिनकी कहो ॥
भयो द्विस्टि मेराव कि नहिं, तासु दरसन तिन लहो ॥
यह बरनन सब कहो सतगुर, एक एक विलोयके ॥
निज दास जानि परगास कीजे, धरहु निज जनि गौयके ॥ २३ ॥