भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 153

कबीरवचन-धर्मदास प्रति ।

सुनिके धर्म क्रोध उर जरेऊ । जोगजीत सो सन्मुख भिरेऊ ॥
जोग जीत तब किन्हे ध्याना । पुरुष प्रताप तेज उर आना ॥
पुरुष आज्ञा भई तोह काला । मारहु माँझ लिलार कराला ॥
जोगजीत पुनि तँसो कीन्हा । जस आज्ञापुरुष तेहि दीन्हा ॥
छन्द-गहि भुजा फटकार दीन्हों, परेउ लोकते न्यारहो ॥
भयो त्रासित पुरुष ढरते, बहुरि उठेउ सम्हार हो ॥
निकसि कन्या उदरते पुनि, देख धर्महि अति डरी ॥
अब नाहि देखों देस वह, कहो कौन विधि कहैंवां परी ॥ १७ ॥
सोरठा-कामिनि रही सकाय, त्रासित काल डर अधिक ॥
रही सो सीस नवाय, आस पास चितवत खडी ॥ १७ ॥

निरञ्जनवचन-अद्या प्रति ।

कहे धर्म सुनु आदि कुमारी । अब जनि डरपो त्रास हमारी ॥
पुरुष रचा तोहि हमरे काजा । इकमति होय करहु उपराजा ॥
हम हैं पुरुष तुमहिं हौ नारी । अब जनिडरपो त्रास हमारी ॥

अद्यावचन-निरञ्जन प्रति ।

कहे कन्या कस बोलहु बानी । भ्राता जेठ प्रथम हम जानी ॥
कन्या कहै सुनो हो ताता । ऐसी विधि जनि बोलहु बाता ॥
अब मैं पुत्री भई तुम्हारी । तँ उदर मांझु लियो डारी ॥
जेठ बंधु प्रथमहिके नाता । अब तो अहो हमारे ताता ॥
निरमल द्विष्ट अब चितवहु मोही । नहिंतो पाप होय अब तोही ॥
मंद द्विस्टिन चितवहु मोही । नातो पाप होय अब तोही ॥

निरञ्जनवचन-अद्या प्रति

कहे निरंजन सुनो भवानी । यह मैं तोहि कहों सहिदानी ॥
पाप पुन्य डर हम नहिं डरता । पाप पुन्यके हमहीं करता ॥
पाप पुन्य हमहींसे होई । लेखा हमार न लेवे कोई ॥
पाप पुन्य हम करंब पसारा । जो बाझे सो होय हमारा ॥
ताते तोहि कहों समुझाई । सीख हमार लो सीस चढाई ॥
पुरुष दीन तोहि हम कहैं जानी । मानहु कहा हमार भवानी ॥

कबीरवचन धर्मदास प्रति ।

विहैंसी कन्या सुन अस बाता । इक मति होय दोइ रंगराता ॥