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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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रहस वचन बोली म्निदु बानी । नारि नीच बुधि रति विधि ठानी ॥
रहस वचन सुनि धरम हरषाना । भोग करनको मनमें आना ॥

छन्द-भग नहिं कन्याके हूती, अस चरित कीन्ह निरंजना ।

नख घात किये भगद्वार तत छिन, घाट उत्पति गंजना ॥

नखरेष शोनिता चला, तिहूँको सब खास आरंभनी ।

आदि उत्पति सुनुहु धर्मनि, कोउ नहिं जानत जम मनी ॥

त्रिबार कीन्ही रति तवैं, भये ब्रह्मा विस्तु महेस हो ।

जेठे विधि विस्तु लघु तिहि, तीजे सम्भू सेषहो ॥ १८ ॥

सोरठा-उत्पति आदि प्रकास, यह विधि तेहि प्रसंग भो ॥

कीन्हो भोगविलास इक मति कन्या काल ह्वै ॥ १८ ॥

भवसागरकी रचना ।

तेहि पीछे ऐसा भो लेखा । धर्मदास तुम करो विवेखा ॥

निरञ्जनवचन-अद्या प्रति ।

अगिन पवन जल मही अकासा । कूर्म उदरते भयो परगासा ॥

पाँचों अंस ताहि सन लीन्हा । गुन तीनो सीसनसो कीन्हा ॥

यहि विधि भये तत्व गुन तीनो । धर्मराय तब रचना कीनो ॥

कबीरवचन-धर्मदास प्रति ।

गुन तत सम कर देविहि दीन्हा । आपन अंस उत्पन कीन्हा ॥

बुन्द तीन कन्या भग डारा । ता सँग तीनो अंस सुधारा ॥

पाँच तत्व गुण तीनो दीन्हा । यहि विधि जगकी रचना कीन्हा ॥

प्रथम बुन्दते ब्रह्मा भयऊ । रज गुण पंच तत्व तेहि दयऊ ॥

दूजो बुन्द बिस्तु जो भयऊ । सतगुण पंच तत्व तिन पयऊ ॥

तीजे बुन्द रुद्र उत्पाने । तमगुण पंच तत्व तेहि साने ॥

पंच तत्व गुण तीन खमीरा । तीनों जनको रच्यो सरीरा ॥

ताते फिरि फिरि परलय होई । आदि भेद जाने नहिं कोई ॥

कहै धर्म कामिनि सुन बानी । जो मैं कहूँ लेहु सो मानी ॥

जीव बीज आहै तुव पास । सोले रचना करहु प्रगासा ॥

कहै निरंजन पुनि सुनु रानी । अब अस करहु आदिभवानी ॥

तीनो सुत सौप तोहि दीना । अब हम पुरुष सेव चित लीन्हा ॥

राज करहु तुम लै तिहुँ बारा । भेद न कहियो काहु हमारा ॥