भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 168

कबीरवचन धर्मदास प्रति ।

पुनि माता कहि विस्नु दुलारा । मरद्यो मान जेठ निज वारा ॥
अहो विस्नु तुम लेहु असीसा । सब देवनमें तुमहीं ईसा ॥
जो इच्छा तुम चितमें धरिहौ । सो सब तोर काज मैं करिहौ ॥

मायाका विष्णुको सर्वप्रधान बनाना ।

प्रथम पुत्र ब्रह्मा दुरि गयऊ । अकरम झूठ ताहि प्रिय भयऊ ॥
देवन सेष्ठ तुमहिं कहैं मानहिं । तुम्हरी पूजा सब कोई ठानहिं ॥

कबीरवचन धर्मदास प्रति ।

किरपा वचन अस मातैं भाखा । सबसे सेष्ठ विस्नु कहैं राखा ॥
माता गयी रुद्रके पास । देख रुद्र अति भये हुलासा ॥

अद्याका महेशको बरदान देना ।

पुनि लहुरा कहैं पूछे माता । तुम सिव कहो हृदयकी बाता ॥
माँगहु जो तुम्हरे चित भावे । सो तोहिं देउँ माता फुरमावे ॥
दोइ पुत्रन कहैं मता दृढावा । माँग महेश जोई मन भावा ॥

महेशवचन ।

जोरि पानि सिव कहबे लीन्हा । देहु जननि जो आज्ञा कीन्हा ॥
कबहिं न विनसे मेरी देही । हे माता माँगों बर एही ॥
हे जननी यह कीजे दाय। कबहुँ न विनशै मेरी काया ॥

अद्यावचन ।

कह अष्टंगी अस नहिं होई । दूसर अमर भयो नहिं कोई ॥
करहु योग तप पवन सनेहा । रहे चार जुग तुम्हरी देहा ॥
जौलौ पृथ्वी अकास सनेही । कबहुँ न विनसे तुम्हरी देही ॥

धर्मदासवचन ।

धर्मदास विनती चित लाई । ज्ञानी मोहि कहो समुझाई ॥
यह तो सकल भेद हम पायी । अब ब्रह्माको कहो उपायी ॥
अद्या साप ताहि कहैं दीन्हा । तेहि पीछे ब्रह्मा कस कीन्हा ॥

कबीरवचन ।

विस्नु महेश जबै वर पाये । भये आनन्द अतिहि हरषाये ॥
दोनों जने हरण मन कीना । ब्रह्मा भयो मान मद हीना ॥
धरमदास मैं सब कुछ जानों । भिन्न २ कर प्रगट बखानों ॥