कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
उनके भिन्न पंथ, महाप्रलयकी कथा
विष्णुमें भरकर विष्णुको अपना उत्तराधिकारी एवं समस्त संसारका रचयिता ठहराया है। इस कारण यह विष्णु अग्निकी प्रतिमूर्ति है। इसीका पूजन समस्त संसारमें, हो रहा है। वही आग खुदा है, इसी आगको हिन्दू मुसलमान ईसाई यहूदी इत्यादि षट्दर्शनके लोग पूज रहे हैं। किसी प्रकार पूजें, समस्त पृथ्वी पर इसीकी पूजा है। यज्ञ हवन इत्यादि इसीके निमित्त होता है। जो कुछ बलिप्रदान अथवा महाबलिप्रदान आदि हैं हवन इत्यादि सब उसीके निमित्त होता है। वह परमेश्वर अग्नि है और अग्नि उनका मुंह है, जो कुछ उसके नामसे आगमें पड़ता है सो सब उसका भोजन है। अन्न, फल, घी, गुड़, मनुष्य और पशु सब उसके भोजन हैं। वह सबको खाता है, समस्त मनुष्य इसी आगकी पूजा करते हैं। इसका भेद बिलकुल नहीं जानते। समस्त पवित्र पुस्तकें इसी अग्निकी प्रशंसा तथा बड़ाई प्रगट करते हैं। इस अग्निकी पहचान बिना सद्-गुरुकी आज्ञाके नहीं हो सकती। जो कुछ वेद बतलाता है और ऋषीश्वर कहते हैं, वही कथन अंबियाका देखो।
खिरोजका (३) बाब (२) डुरेबके पर्वतपर मूसापर खुदाबन्द अग्निकी लपटोंमें प्रगट हुआ। देखो तौरीतमें।
खिरोज २४-१७-खुदाबन्दका जलाल दहकती
आगके सद्गुण दिखालाई देता था।
इसनसना ४-२४-तेरा परमेश्वर एक मस्म करनेवाली आग है।
तथा ४-३३-परमेश्वरकी आवाज आगमेंसे बोलते सुनी
तथा ५-४-परमेश्वरने अग्निमेंसे बातें कीं।
तथा ९-१५-समस्त पर्वत अग्निसे जल रहा था मूसा
पर्वतसे उतरा।
२ समोइल २२-९-खुदाके मुहँसे आग निकलकर खागई।
मकाशिफ़ात २०-९-खुदाके पाससे आग उतरी और उनको खागई।
विराट् पुरुष जिसकी प्रशंसा वेद करता है वही विराट् पुरुष विष्णुका अवतार है। जब अर्जुनको दिखाया तो वह डर गया था जब मूसाको दिखाया तो मसा अचेत हो गया, न देख सका। वही विराट् पुरुष ईसा है। देखो मतीकी इञ्जील (१७) बाब (१) से (९) आपत पर्यन्त पढ़े।
और छः दिवसोंके उपरान्त मसीह, पिटर्स याकूब और भाई योहन्नाको पृथक् एक ऊँचे पर्वतपर लेगया। (२) उनको सामने उसकी सूरत बदल गई। उसका मुखडा सूर्यसा चमका, उसके, वस्त्र तेजके सद्गुण श्वेत हो गये। (३)
अन्तर्धान होनेकी कथा
मूसा और अलियास उससे बातें करते उन्हें दिखाई दिए । (४) ए परमेश्वर ! हमारे निमित्त यहाँ रहना अच्छा है । यदि इच्छा हो तो हम यहाँ तीन डेरे बनावें । एक तेरे और एक मूसा और एक अलियासके निमित्त । (५) वह यह कहताही था कि एक प्रकाशमय बादलने उनपर साया कर दी, इस बादलसे एक आवाज इस विषयकी आई कि, यह मेरा प्यारा बेटा है जिससे मैं प्रसन्न हूँ । तुम उसकी सुनो (६) शिष्य यह सुनकर मुहँके बल गिरे अत्यन्त भयभीत हुए । (७) तब मसीहने इन्हें छूकर कहा कि, उठो भयभीत मत हो । (८) पीछे उन्होंने अपनी आँख उठाकर मसीहके अतिरिक्त और कुछ नहीं देखा ।
वह तो हजरत ईसाने अपना प्राकृतिक स्वरूप अपने शिष्योंको दिखल-लाया था ।
प्रगट हो कि, सब वह अवतार इसी निरञ्जनके हैं । जो उसके मुख्यपुत्र कहलाते हैं । इन ऋषीश्वरों सिद्ध साधुओं पीर पैगम्बरोंको बड़ा बल होता है परन्तु इनको न तो अपने प्राकृतिक स्वरूपकी सुध रहती है । न अपना आवागमन बन्द करनेकी युक्ति मालूम है । ये सब अवतार निरञ्जनके पुत्रोंके हैं और अपने पिता विराटके स्वरूपमें हैं ।
यह विष्णु सबमें बादशाह है । इस बादशाहके पास युद्धका समस्त समान है । इसके पास पाञ्चजन्य शंख है । जब वह समरके निमित्त चढ़ता है तब पाञ्च जन्य शंख फूंक डंका बजाकर चढ़कर युद्ध करता है । वास्तवमें इसे कोई कामना नहीं । भक्तोंके उद्धार तथा संसारी जनोंके बोधके लिये ऐसा किया करता है ।
भगवान् विष्णुके विषयमें कबीर साहिबजी कहते, चले आ रहे हैं कि सत्य पुरुष विष्णु भगवान्को पकड़ो उसके सच्चे भक्तोंका मान करो झूठे गुरुआ लोगोंके फन्देसे बचो । ये किसी बिरले पुरुषको मिलते हैं, जिसे मिलते हैं वो इनकी ही कृपासे सत्य पुरुषके लोकको चला जाता है । फिर भी जीवोंकी बुद्धि अन्धी हो रही है जो इस ओर ध्यान नहीं देते ।
देखो भगवान् विष्णुके विषयके कबीर साहिबके शब्द—
शब्द ३७—हरिठग ठगत सकल जग डोला ।
गवन करत तोसों मुखहु न बोला ॥
बालापनके मीत हमारे । हमें छाड़िकस चले सकारे ।
तुम अस पुरुष हों नारि तुम्हारी ।
तुम्हरी चाल पाहनहुते भारी ।
वाटिकि देह पवनको शरीरा, हरिठग ठगतसो उरल कवीरा ॥
कबीर दासजी उन गुरुओंके लिये कहते हैं जो भगवान् के तत्त्वको न जान उनकी निन्दा स्तुतिसे अपना कार्य चलाते हैं कि, भगवान् विष्णुके नामपर नकली गुरु बिना विष्णुके सत्यरूपको जनाये ज्ञानी होनेके ठगरी करते फिरते हैं । जब यमराज आकर घेर लेता है तो भी वे वह नहीं कहते कि, हमने सत्यपुरुष विष्णुके नामपर तुमें धोखा दिया था ।
हम तुम बालापन के मित्र हैं । हमें छोड़कर पहिले ही कहाँ चल दिये । आप बिना मंत्र सिद्ध कियेही लोगोंको चेला करने चल दिये जैसे गुरु वैसेही चेला हैं आजकलके गुरु लोगोंकी चाल पत्थरसेभी ज्यादा जड़ है क्योंकि, पत्थर तो जड़ होनेके कारण सत्यपुरुष विष्णुभगवान्का चिन्तन नहीं कर सकता किन्तु ये गुरु लोग चैतन्य होकर भी विष्णुको भी नहीं पहिचानते । पृथ्वी आदिका स्थलदेह तथा प्राणादि वायु आदिका सूक्ष्म है । कबीर साहेब कहते हैं कि, ऐसे पाखण्डियोंसे डरकर जीव भगवान् विष्णुके चरणोंमें पुकार मचावे हैं कि, मेरी रक्षा हो ।
शब्द ३८—हरि विनु मर्म बिगुर विन गन्दा ।
जहूँ जहूँ गयो अपन पाँ खोये, तेहि फन्दे बहु फन्दा ॥ १ ॥
योगी कहे योग है नीको, द्वितिया और न भाई ।
चुण्डित मुण्डित मौन जटा धरि, तिनहुँ कहाँ सिधि पाई ॥ २ ॥
ज्ञानी गुणी शूर कवि दाता, ये जो कहहिं बड हमहीं ।
जहूँ ते उपजे तहूँहि समाने, छूटि गये सब तबहीं ॥ ३ ॥
बाँये दहिने तजो विकारै, निजुकै हरिपद गहिया ।
कह कबीर गूगे गुर खाया पूछेसो का कहिया ॥ ४ ॥
गन्दा—मलिन बुद्धिवाला, विन—पक्षीजीव—हरि—विष्णुभगवान्के, बिहु—बिना, बिगुर—बिगड़ गया । अपनेपे-अपने आत्मतत्वको, खोये-खोकर, जहूँ जहूँ—जिस जिस जगह गयो—पहुँचा, बहूँही, तेहि—उसे, बहुत—बहुतसे, फन्दा—झगड़े पड़े । अथवा जहाँ जहाँ गया अपने भजन ध्यान ही खोये और बिना विष्णुकी कृपाके संसारी बन्धनोंमेंही बँधा । योगी कहते हैं कि, योगही अच्छा है । योगके मुकाबिलेमें दूसरा कुछ नहीं है । उन्होंने तप किये शिर मुड़ाये मौन रहे जटाएँ राखीं पर क्या सिद्धि प्राप्त की, येही क्यों, ज्ञानी शूर कवि और दाता ये भी कहते हैं कि, हमही बड़े हैं जिस गर्भसे उपजे थे फिर उसी गर्भमें जन्म लेने चले गये । उनके सब मत रखेही रह गये । वाम और दक्षिण दोनों विकारोंको छोड़ दो, भगवान् विष्णुकी शरणको अपनी मानकर ग्रहण करो । जिससे कल्याण हो
कबीर साहिब कहते हैं कि, गुडखाया हुआ गूंगा स्वाद नहीं बता सकता, खाली इसारेसे ही कह सकता है।
शब्द ३९—ऐसो हरिसों जगत लरतु है, पंडुर कतहूँ गरुड धरतु है ॥ १ ॥
मूस बिलासी कँसे हेतू, जम्बुक करके हरिसों खेतू ॥ २ ॥
अचरज यक देखा संसारा, सोनहा खेद कुंजर असवारा ॥ ३ ॥
कह कबीर सुनों सन्तो भाई, यह सन्धि कोई विरले पाइ ॥ ४ ॥
ऐसे भगवान् दयालु जो अनायासही मुमुक्षु जीवोंके रक्षक हैं। पाप जीव इनसेभी विरोध किये बिना नहीं मानते। व्यर्थकी निन्दा करते हैं। क्या पीला सोंप गरुडको खालेना चाहता है ? जो विष्णुकी निन्दा करके अपना महत्त्व प्रकट करते हैं, वे सीधे सीधे पुरुषोंको बहकाकर ऐसे हजम करना चाहते हैं जैसे बिल्ली मूसेको खालेना चाहे। पर ये सब बातें इसी तरह हैं जैसे कि, श्यार शेरसे लड़नेका इरादा करे। श्रीविष्णु रहित जीवोंको वे क्या उमराह कर सकते हैं। हमने एक बड़ा आश्चर्य देखा कि, कुत्ते हाथीपर चढ़कर उसे चलाना चाहते हैं। यानी ऐसी बँसी गप्योंसे विष्णु भक्तोंको भक्तिसे डिगाना चाहते हैं। कबीर साहिब कहे हैं कि, किसी विरलेको विष्णुका साक्षात्कार हुआ है जिससे सत्य लोककी प्राप्ति हो जाती है ॥
भगवान् रामचन्द्रजी महाराज ।
मनु और शतरूपाका विवरण रामायणमें कहा है। कि, इन दोनोंने बड़ी तपस्याकी है। अस्सी सहस्र वर्षपर्यन्त प्रार्थना करते रहे, इसके उपरान्त ब्रह्मा इनके सामने गए। परन्तु मनुके पीछे खड़े होकर कहने लगे कि ए, राजा वर माँग। तब मनुने कहा कि, तुम मेरे सामने आओ। तब ब्रह्माने कहा कि, ए राजा ? तेरे प्रतापके कारण मैं तेरे सामने नहीं आ सकता हूँ। तब राजाने कहा कि, यदि तुमसे मेरे सामने आया नहीं जाता तो मैं तुमसे क्या माँगूँ ? फिर शिवजी आए वे भी ब्रह्माहीके सद्गुण पलट गए। पीछे विष्णु आए और कहा कि, राजा तू माँग क्या चाहता है। तब मनुने अपने नेत्र खोलकर देखा तो विष्णु महाराज शंख चक्र गदा पद्म इत्यादि लिए सामने खड़े हैं। तब राजाने कहा कि, तुम्हारे सद्गुण मेरा पुत्र उत्पन्न हो। तब विष्णुने कहा कि, मेरे सद्गुण दूसरा कौन है मैं स्वयम् तेरा पुत्र होऊँगा और कुछ माँग। तब राजाने कहा कि, दूसरा वरदान यह दो कि, मैं आपसे जुदा होकर जीवित न रहूँ, भगवान् विष्णुने 'एव मस्तु' कह दिया। वेही मनु और शतरूपा राजा दशरथ और महारानी कौशलया हुए। भगवान्ने जो वरदान दिया था उसके अनुसार उनके घरमें भगवान् रामका
५ अ० कबीर पन्थके धार्मिक नियम
अवतार हुआ। यद्यपि वहाँ कौशल्यका वर पाना अतिही सुगम था तो भी उन्होंने वात्सल्य भक्तिसे प्रेरित होकर भगवान् को पुत्र बनने काही वर माँगा क्योंकि, बिना अपने ध्येयके आगे विश्वके साक्षाज्यको, नरककी भयंकरका तपत साधन समझते हैं। येही भगवान् रामचन्द्रजी महाराज कबीर जी साहिबके परम इष्ट थे। स्वामी रामानन्दजीसे ये ही दो अक्षर कानमें पड़नेके बाद मंत्रका रूप आपसे पूछा तो आपने परिस्फुट शब्दोंमें समझाते हुए कह दिया कि, 'राम न कह्यो खुदाई' ऐ मुसलमानों! तुम रामका महत्त्व नहीं समझ सकते, किन्तु तुमभी भूलके साथ इस खुदा शब्दसे भी रामको ही याद कर रहे हो।
इसी बातको शब्द चारमें कह दिया है कि—'हिन्दू कहै मोहि राम पियारा, तुरक कहै रहिमाना। आपसमें दोउ लरि लरि मूये, मर्म कोई नहि जाना' हिन्दू कहते हैं कि, हमें राम प्यारा है तथा तुरक रहमानका प्यारा बताते हैं। दोनों आपसमें लड २ कर मर गये पर मर्मका पता न चला कि, रामको ही वो दयालु कहकर याद कर रहे हैं। इन्होंने और भी कितनी ही स्थलोंपर भगवान् रामका गुण गाया है जिसमें से कुछ एक यहीं उद्धृत करते हैं।
शब्द १३—राम तेरी माया दुन्दि मचावे ॥
गति मति वाकी समझि परे नहिं, सुरनर मुनिहिं नचावे ॥ १ ॥
कबीर साहिब कहते हैं कि, हे राम! तेरी माया ऊधम मचा रही है। या मैं तू का भेद कर रही है यदि यह न हो, तो मैं तू का भेद न रहे। उसकी चाल तथा ज्ञान विचार जाने नहीं जाते यह सुर नर मुनि सबको नचा रही है।
शब्द ८—वे रघुनाथ एकके सुमिरै जो सुमिरै सो अन्धा ॥ ७ ॥
बिना एक सत्यपुरुष रघुनाथके सुमिरन किये जो किसी दूसरेका स्मरण करता है वो अन्धा है भगवान् रामको छोड़कर किसीका भी स्मरण न करना चाहिये।
१—दो शब्द—प्रायःभमें कबीर मंशूरका अर्थ कबीर साहिबकी ज्योतिर्या कहा गया है। इस कारण इस ग्रन्थमें कबीर दर्शन या उससे सम्बन्ध रखनेवाले एवम् उसके परिपोषक विषयोंका ही संग्रह होना चाहिये। कबीर साहिबका जीवन चरित्र भक्तभालमें है। सनातन धर्मों उन्हें इस कराल कलिकालके भक्तोंमें एक उच्च कोटिका मानते हैं। इस नातेसे वे भी उनपर उतनीही श्रद्धा रखते हैं जितनी कि, उनके सम्प्रदायके लोग उनपर रखते हैं वे परम भक्त थे। इस कारण उनका महत्त्व ईश्वरसे भी अधिक वर्णन किया जाय तो सनातनियोंकी तो आनन्दकी ही बात है। क्योंकि उनके यहाँ तो "दासानुदासो भवितास्मि भूयः" का अधिक महत्त्व है।
ईश्वरके दास होनेसे पहले ईश्वरके दासोंमें अपना नाम लिखाना सबसे उत्तम मानते हैं। इस कारण उनका महत्त्व वर्णन तो सुखका ही कारण होगा किन्तु जो बात उनके वचनों तथा उनके मान्य साम्प्रदायिक ग्रन्थोंसे बिल्कुल विभिन्न हो उस बातको उनके प्रकाशमें मिश्रित करना सर्वथा अनुचित प्रतीत होता है।
शब्द १४—रामरा संशय गाठिन छूटे । ताते पकरि २ यम लूटे ॥ १ ॥
जो राम के उपासक नहीं हैं उनकी संशय की गांठ नहीं छूटती इस कारण सबको यह पकड़ २ कर लूटता है । इन दोनों शब्दोंसे कबीर साहिबने स्पष्ट शब्दोंमें कह दिया है कि, रामको छोड़ दूसरेका स्मरण करना अन्धोंका काम है, बिना उसका स्मरण किये संशयकी गांठ नहीं छूटती । हृदयकी कुन्डी नहीं खुलती रामका अनुभव या यथार्थ ज्ञान क्यों नहीं होती । इस पर कबीर साहेब कहते हैं कि—
स्मृति वेद पुराण पढ़ै सब, अनभव भाव न दरशै ।
लोहो हिरण्य होय धों कौसे, जो नहिं पारस परसै ॥
चाहे वेद स्मृति पुराण एवम् अनेक तरहके सम्प्रदायिक पोथा पढलो पर बिना अविचल प्रेम दृढ़ विश्वास और सच्चे गुरु रामका अनुभव हो नहीं सकता । वो सीताके लिये बन २ फिरनेवाला रावणका संहारक ही दीखेगा । पर जब पारसरूप गुरु मिल जायेंगे तो परसकर लोहे को पारसकर सोना बना लेंगे ।
उसी रामने सुप्रीवकी सख्य भक्तिके वश हो उसके बडे भाई बालिपर छलसे प्रहारकरके अपने बनाये कर्म नियमको, भी मर्यादा पुरुषोत्तमने अटल दिया कि, ए अंगद ! तू बापके बदलेके लिये उतावला न हो मैं तेरे बापका बदला स्वयं चुकाऊंगा । हुआ भी ऐसा ही । कृष्णावतारमें मर्यादा पुरुषोत्तमने कर्मफलकी मर्यादाको अनिवार्य दिखलाते हुए बालिके हाथके तीर से ही इच्छामय लीलाविग्रहका संवरण किया । भिलनी केवल निषादराज राक्षसराज और गीधराज आदि अनन्तोंको अपनाकर अपना नित्यधाम दिया जिसके रहनेवाले भगवानकी आज्ञासे संसारमें लोक कल्याणके लिये आकर भी निर्द्वन्द्व रहते हैं जैसे वहाँ अनुभव करते थे वैसाही यहाँ पर भी करते रहते हैं । श्रीकबीर साहेब बडे भी अपनानेवाले आप थे, कबीर साहिबमें जो भी कुछ कबीरपंथा था वो सब आपकी कृपाकाही फल था ।
पूर्णब्रह्म भगवान् कृष्ण ।
अब हम भगवान् कृष्णचन्द्रजीके कुछ वात्सल्य पूर्ण गुणोंको सुनाना चाहते हैं जो कि, अवतार लेकर एक भक्तिको देखते हैं, दूसरे वहाँ कुछ भी भेद भाव नहीं होते । कश्यप ऋषिके दिति अदिति नामकी दो स्त्रियाँ थीं । अदितिसे राजा इन्द्र उत्पन्न हुआ । वह देवतोंका बड़ा बलिष्ठ राजा हुवा । तब दितिने कश्यपजीसे निवेदन किया कि महाराज ! मेरे ऊपर भी दया करो कि, मेरा
भी इन्द्रके समान बलिष्ठ तथा प्रतापी पुत्र उत्पन्न हो तब कश्यपजीने कहा कि, तूभले कार्य कर तो तेरा पुत्र भी वैंसाही होगा और दिति भी सुकर्म करने लगी। तब दिति गर्भवती हुई जब उसको गर्भ रहा तब दितिका चेहरा तेजमय हो गया। यह स्वरूप देखकर अदितिने ईर्षा की और अपने पुत्रसे कहा कि, ए पुत्र। तेरा बैरी दितिके गर्भसे उत्पन्न हुवा चाहता है जो तुमसे सामना करेगा। तब इन्द्रने कहा कि, माता ! तू कोई चिंता न कर, मैं भली भाँति युक्ति करूँगा, तब इन्द्र एक छोटा अस्त्र लेकर और बहुत छोटा रूप धारण करके अपने योगबलसे दितिके पेटमें पैंठ गया, उस गर्भके बालकके सात टुकड़े किए और फिर उन सातमें भी और सात २ टुकड़े किए। जब उस बच्चेको दुःख हुआ तब रोने लगा। तब इन्द्रने कहा कि, ए भाई ! तुम मत रोओ, तुम सब उनचास मरुत् हो गए। जब दितिको मालूम हुवा कि, आदितिके कहनेसे इन्द्रने मेरे साथ ऐसा व्यवहार किया और मेरे गर्भके पुत्रके उनचास टुकड़े किए, तब उसने अदितिको शाप दिया कि, जैसे तेरे पुत्रने मेरे पुत्रको मारा काटा है उसी प्रकार तेरे पुत्रोंका भी विनाश हो और तू बंधनमें पड़े। जैसे बंधन तथा गर्भमें मेरे बच्चेको मारा तैसे बंधनमें तेरे बच्चे मारे जावें। वही अदिति देवकी हुई और कश्यप ऋषि वसुदेव हुए।
उन्हींके घर जब कि, पृथ्वीने जाकर पुकार किया कि, मेरे ऊपर पापी राक्षस और अनेक दैत्य इत्यादि होगए हैं मैं दुःखी हूँ। इस कारण इनके मारनेके निमित्त कृष्णावतार हुवा। समस्त राक्षसों तथा दैत्योंका विनाश किया। इसी प्रकार विष्णु अवतार पृथ्वीपर हुवा करता है और अवतार धरकर राक्षसोंका नाश करते हैं।
इन्होंने मुमुक्षुजनोंके कल्याणके लिये गीता जैसे शास्त्रका निर्माण किया जिसके छोटेसे रहस्यकी चिनगारियोंके सोले, मात्र ही सारे संप्रदायके रहस्य हैं। कबीर साहिबने इस गीता काही अनुवाद उग्रगीताके नामसे करके धर्मदासजी को सुनाया है। सौलभ्य गुण, जितना इस अवतारमें मिलता है उतना किसीभी में नहीं मिलता। उग्र गीतामें कहा है कि —सर्वव्यापक मैं हों भाई, मोहि बिन दूजा और न कोई” मैं सर्वव्यापक सत्य पुरुष हूँ, मैं ही एक हूँ मेरे बिना और कोई नहीं है। ये ही सत्य लोकके अधिपति हैं, राम आदि इन्हीके अनन्त नाम हैं, हंस कबीर इन्हींके लोकसे आते जाते हैं।
क्या इस रहस्यसे ईसाई अनभिज्ञ हैं ? अथवा मुहम्मद साहबके ग्रन्थोंका वृत्तान्त मुसलमान लोग नहीं जानते हैं ? सब जानते हैं। परन्तु इस मनुष्यके
मनमें विचार और चिन्ता नहीं है कि, उसपर विचार करके यथार्थ अवस्था से विज्ञ हो । न उनके मनमें दूढ़नेकी अभिलाषाही है ॥
विष्णुके उपकार ।
कितने मनुष्य ऐसा कहते हैं कि, हम तो विष्णुको परमेश्वर कदापि न मानेंगे और न उसकी कृतज्ञता स्वीकार करेंगे । भला विचारना चाहिए कि, यदि चूहा कहे कि, मैं शेर बबरसे सामना करूँगा उसकी कृतज्ञता न करूँगा । भला यह संभव है कि, चूहा शेर बबरसे विरुद्धता कर सके । ऐसेही ये मूर्ख मनुष्योंके ध्यान हैं कि, हम विष्णुकी आज्ञासे बाहर चरण रक्खेंगे । यह बात सर्वतोभावसे असंभव है कि, कोई मनुष्य मायाकी सेवासँ बाहर जासके । हों वह मनुष्य जो साधुगुरुकी सेवामें तन मन धन अर्पण करेगा वह विष्णुके वात्सल्यभावसे बंधनसे निकलेगा । जितने तनुपोषक और सांसारिक कांक्षासे भरे हैं कोई किसी धर्मका क्यों न हो सदैव विष्णुका सेवक रहेगा । क्योंकि, जितने धर्म पृथ्वीपर हैं वे सब बन्धनके कारण हैं कबीर साहबके शरण बिना अन्तमें समस्त जीवोंको विष्णुकी मायाके ग्रहमें प्रविष्ट कराते हैं । इस ब्रह्माण्डको चीरकर पार जानेकी किसीमें सामर्थ्य तथा बल नहीं जो कोई कुछ पावेगा सो सत्तगुरुकी सहायतासे पावेगा । दूसरी कोई युक्ति नहीं । सबके सब वेद और पुस्तकोंके बंधनमें पड़े हैं । केवल गुरुमुख पार उतरेंगे, मनमुख सब डूब मरेंगे । गुरुमुखके निमित्त भक्ति मुक्ति प्रस्तुत हैं । मनमुखके निमित्त सदैव का बंधन प्रस्तुत है । इस बातको समस्त संत महंत सदैवसे पुकारते चले आते हैं । गुरुमुखके निमित्त दोनों संसारमें विभ्राम है । समस्त ऋषि सिद्धि गुरुमुखके चरे हैं ।
मुखम्मस तरजीयबन्द ।
सरापा जीव करमोंसे लदा है । तमन्ना दीनवीमें पुर सदा है ॥
बहरदो एकसो शाहो गदा है । कहाँ दर ख्वाव विहमुक्ती पदा है ॥
यह जैसा जगत् है वैसा खुदा है ।
है जैसी रूह वैसे ही फ़रिश्ते । बंधे सब जीव हैं आमालरिश्ते ॥
कुदूरत और आलायश आगश्तः । न कर होश इब्र आदम कालकुशतः ॥
यह जैसा जगत् है वैसा खुदा है ।
यह कहने ही को हैं सब आदमेजाद । कियाशहवातने अकल उनकी बरबाद ॥
तअस्सुबमें हुए हैवान दिलशाद । यही सब जीवके बंधनकी बुनियाद ॥
यह जैसा जगत् है वैसा खुदा है ।
न सद्गुरु बिन वसह तदबीर छूटे । न अमाला कारिश्नः उसके टूटे ॥
जपो तपज्ञान ध्यान उसका सो लूटे । जिघर जावैं उधर धर कालकूटे ॥
यह जैसा जगत है वैसा खुदा है ।
फिकरमें सब लगे खुद खावसुखरकी । न खिदमत और नपरस्तिशसाधुगुरुकी ॥
खबर क्योकर मिले उस धामधुरकी । फँसे सब फंदमें ठगजीव बुरकी ॥
यह जैसा जगत है वैसा खुदा है ।
न तन मन धनसे हो जबसे निरासा । रहेगा तबतलक यह काल फाँसा ॥
करो जप तप महलमें होवे वासा । हवस जब तर्क हो मुक्ति हो पासा ॥
यह जैसा जगत है वैसा खुदा है ।
हवस है दीनवी दिलमें यह जवतक । न पावै रस्तगारी जीव तब तक ॥
सभी आमाल इसके जाल अवतक । न हरगिज पहुँचे घरलासा नीरव तक ॥
यह जैसा जगत है वैसा खुदा है ।
तअस्सुब छोड़कर कर अकलओ होश । यगानः मिल बेगानः कर फ़रामोश ॥
नसाएह पन्द सुन अज्ज सन्त करगोश । मदद गुरु साधु चल तु पार नौ कोश ॥
यह जैसा जगत है वैसा खुदा है ।
जिधर जावे उमर जीवका मरण है । हरण दुःखद्वंद्व सतगुरुकी शरण है ॥
वही मुकता वही तारनतरन है । वह आजिज जीवकापोशन बेहतरन है ॥
यह जैसा जगत है वैसा खुदा है ।
इसका भाव वही है जिसका कि, निरूपण कर चुके हैं । उसीके सारको लेकर इस कवितामें कहा है कि दोनोंका एकही रूप है सत्य पुरुषसे भिन्न नहीं ।
अध्याय ८.
ब्रह्माजीकी कथा ।
यह ब्रह्मा समस्त संसारका रचयिता कहलाता है । इस ब्रह्मासे समस्त संसार है । यह रजोगुण अर्थात् प्रवृत्तिकी प्रतिमूर्ति हैं । बुद्धिरूप ब्रह्मा है । इससे समरत वेद और विद्या संसारमें प्रचलित हैं । इस ब्रह्माका स्थान लिङ्ग छः पत्तोंके कमल सो अधिष्ठान चक्रमें है । यह ब्रह्मा प्रवृत्तिकी कामनाको
यहाँ साहबके सांप्रदायिक कबीर ग्रन्थोंका सम्बन्ध छोड़कर ब्रह्मा और शिवजीपर देवी भागवतके धामक आधारपर लोग स्वतंत्र ही लिख पढ रहे हैं । यद्यपि यों यह ऐसे स्थलोंमें आवश्यक है । उसकी कोई आवश्यकता नहीं थी । परन्तु मनुष्यकी अनन्त भावनाएँ होती हैं । न जाने किस भावनासे लिख दिया करते हैं । यह उनका ही अन्तःकरण जानता होगा । हम ऐसे विषयोंका कितनी ही बार सार्वजनिक समन्वय दिखा चुके हैं । जिन्हें ऐसे प्रकरणोंके रहस्यकी जिज्ञासा हो वो हमारे तिभिरभास्कर आदि ग्रन्थोंको देख लें । यहाँ दिखाना नहीं चाहते । अच्छा होता यदि इन कहानियोंके स्थानपर भक्ति ज्ञान वा स्वयं वेदकी इन्हींके विषयकी बातें होतीं ।
कबीरसाहिबके लोक तथा हंसोंकी कथा
उठाता है। स्वयम् काम कामना भी कहा जा सकता है। इस ब्रह्माका ज्ञान विहारी वह स्वयम् संसारी है। वह स्वयम् अपने कार्योंका अधिकारी नहीं है जो कुछ वह करता है विवश होकर करता है और वह करता है और अपने कार्योंसे डरता फिरता है। जब दैत्योंकी तपस्या पूरी होती है तब उनके सामने जाता है। उनको वरदान देता है उस ब्रह्माके वरदानसे दैत्य प्रबल होकर समस्त देवताओंको ब्रह्मा सहित मारकर भगा देते हैं। ब्रह्मा भी देवोंके साथ भागता तथा दुःख पाता फिरता है। उसका कोई वश नहीं चलता है। यदि यह ब्रह्मा अधिकारी होता तो दैत्योंको क्यों वरदान देता। परन्तु वह विवश होकर वरदान दे दिया करता है। यह ब्रह्मा संसार बढ़ानेकी कामनाओंमें डूबा रहता है। यह ब्रह्मा इतना दुःख पाता है तो भी दैत्योंको वरदान देनेको भागाही जाता है, उसका कुछ वश नहीं। यह जीव आपसे आप अपने कर्मोंका फल भोगता है। उनको रोकनेवाला कोई नहीं। वेदका प्रचार संसारमें ब्रह्माने किया परन्तु वेदके यथार्थ तात्पर्यको वह भी नहीं समझ सका, यदि ब्रह्मा वेदके यथार्थ तात्पर्यको समझता तो निश्चय वेदकी सच्ची शिक्षा देता। यदि इस ब्रह्मामें एकताकी विद्या होती अथवा एकका ज्ञान होता तो महामायाका ध्यान करके अपनी कठिनाइयोंको क्यों सरल किया चाहता। यह ब्रह्मा समस्त सांसारिक रीतोंका सिखलानेवाला है। इस ब्रह्माका हृदय सांसारिक कामनाओंसे भरा हुआ है। अपनी कामनाओंसे खिंचा हुआ बारम्बार जन्म मरणके दुःख कष्टमें फँसा रहता है यह ब्रह्मा इस जगत्के सोचमें पड़ा रहता है। ब्रह्माकी संतान ब्राह्मण हैं। शास्त्र और धर्म-कर्मका प्रचार करता रहता है। यह ब्रह्मदेव मुक्तिका उपदेश देनेवाला कहलाता है। इसीकी शिक्षासे सब जानी तथा ध्यानी होते हैं।
विद्या अविद्या आदि यथेष्टोंका रचयिता ब्रह्मा है। सब ऋषि मुनि इससे उत्पन्न होकर धार्मिक चलन सिखलाते हैं। समस्त सांसारिक पुरुष इसीपर चलते हैं।
देवीभागवतके तीसरे स्कंध की २-३-७ अध्यायमें लिखा है कि, सबसे पूर्व पानी था, दूसरा कुछ नहीं था। अब यहाँ नारदजी अपने पिता ब्रह्मासे पूछते हैं कि, ए पिता ! इस संसारकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई ? तब ब्रह्माने उत्तर दिया कि, मधु तथा कंटभ दो दैत्य विष्णुके कानके मेलसे उत्पन्न हुए। वे जलपर रहा करते, जलही पर उन लोगोंने बड़ी तपस्या की, अत्यंत बलिष्ठ हुए। जब मैं उत्पन्न हुआ तो मैंने अपने आसनके नीचे कमल देखा। मैं इस कमलपर बैठता था कि, दोनों दैत्य दिखलाई दिए, मैं उनको देखकर भयभीत हुआ। उन
कबीर साहिबकी मंगलवाणी
दोनोंने मुझको युद्धके निमित्त ललकारा। मैं भयभीत होकर कमलकी नाल पकड़े हुए नीचे उतरा तो सहस्र वर्षपर्यन्त मैं फिरता और चक्कर खाता रहा कुछ ठिकाना नहीं चला। तब मैंने वहाँ बैठकर सहस्र वर्ष पर्यन्त तपस्या की, तब आकाशवाणी हुई कि, ए मुख् ! तूने अब तक नहीं जाना कि, इस संसारके, रचयिता कौन है ? तब उसीमें फिरते हुए नीचेको गया तब मुझको आसमानी रङ्गका एक स्वरूप जिसके चार भुजाएँ थीं जो पीताम्बर पहने था, दिखलाई दिया। शेषजीके ऊपर सोया हुवा और वनमाला उसके गलेमें थी। शंख चक्र गदा पद्म लिए हुए अंचेत योगनिद्राके वशीभूत दिखलाई दिया। इस पुरुषको देखकर मैं निद्राशक्तिकी स्तुति करने लगा। तब उसके शरीरमेंसे भगवती देवी निकल पड़ी। तब मैं उस रूपको देखकर निर्भय होगया। जब भगवती निकल पड़ी। तब भगवान् जागे। पाँच सहस्र वर्ष पर्यन्त उन दोनों दैत्योंके साथ युद्ध करके उनका वध किया। पीछे उस शक्तितने जो भगवान्के शरीरसे निकली थी यह कहा कि, हे ब्रह्मन् ! समस्त संसारका स्तंभ मैं हूँ। ये दैत्य जो मारे हैं इनकी उत्पत्तिका कारण भी मैं हूँ। अब तू भली भाँति जगत् की उत्पत्ति कर। यह कहकर वह शक्ति भगवान्के शरीरमें समागई। इतनी बात सुनकर ब्रह्मा कहता है कि, मैं आश्चर्यान्वित हुवा मनमें सोच विचार करने लगा कि, मैं किस प्रकार सृष्टिको उत्पन्न करूँ ? मुझको तो कुछ दिखलाई नहीं देता अब मैं किससे पूछकर सृष्टिको उत्पन्न करूँ ? ब्रह्मा इस ध्यानमें बहुत गोता खा रहा था। तब उसने देखा कि, एक विमान आकाशसे उड़ आया उसके बराबर बैठ गया। उसके ऊपर भगवतीजी महारानी अपनी शक्तियों सहित बैठी हैं। इस विमानको समीप विष्णु और शिवको खड़े देखा।
तीसरा अध्याय—फिर नारदने ब्रह्माजीसे कहा कि, हम तीनों देवता जाकर इस विमानके एक डण्डेपर बैठ गए। तब वह विमान वहाँसे उड़कर एक भूभागपर आया। वहाँ जल नहीं था। परन्तु अनेक प्रकारकी वाटिका वृक्ष और बड़े सुन्दर मनुष्य बावड़ीं कुएँ इत्यादि और अनेक प्रकारके मकान तथा मन्दिर इत्यादि देखे। तब हमने एक मनुष्यसे पूछा कि यह कौन लोक है। तब उसने उत्तर दिया कि, यह स्वर्गलोक है। वहाँ एक मनुष्य राजा इन्द्रके सदृश दिखलाई दिया। एक क्षण वहाँ ठहर कर विमान पुनः आगे बढ़ा तो एक नन्दन वनमें पहुँचा। वहाँ सहस्रों प्रकारके पुष्प थे। बड़ी सुगंधि आती थी। चार दांतवाले हाथी थे। सहस्रों परियों नाचतीं और गंधर्व लोग गीत गाते और बाजा बजाते थे। तूबा वृक्ष तथा कल्पवृक्षोंकी बड़ी सुगंधि आती थी। वहाँ एक बड़ा सुन्दर नगर
दिखाई दिया और नगरमें एक राजा दिखाई दिया था जिसका नाम देवराज था । हमने पूछा यह कौन लोक है ? तब लोगोंने उत्तर दिया कि, यह ब्रह्मलोक है । वहाँ एक ब्रह्माका भी दर्शन हुवा जो सनातन ब्रह्मा कहलाता है । तब ब्रह्माने कहा कि, ब्रह्मा तो मैं हूँ यह सनातन ब्रह्मा कहाँसे आया इस ब्रह्माके चहुँ ओर अनेक देवतागण सेवाके निमित्त उपस्थित हैं ? उसको देखकर ब्रह्मा नारदसे कहता है कि, मैं आश्चर्यान्वित हुवा । फिर वहाँसे वह विमान उड़कर एक पल-भरमें कौलासमें पहुँचा । इस पर्वतपर भौंति भौंतिके पुष्पोंकी सुगंधि आरही थी । सहस्रों प्रकारके पक्षी बोल रहे थे । वीणा इत्यादि नाना प्रकारके बाजे बज रहे थे । तब एक क्षणमें शम्भु महाराज इस मकानसे बहिर्गत हुए जो बैलपर सवार थे । उनके तीन नेत्र थे, पाँच मुंह और दश भुजाएँ थीं, उनके ललाटमें चन्द्रमा था, वाघम्बर ओढ़े हुए थे । गणपति जी और वीरभद्र तथा स्वामिकांतिक इनके साथ थे । सहस्रों ब्रह्मा और शंकर आदि इनकी स्तुति करते हुए एवं चँवर इनके शीशपर फिरता हुआ देखा फिर एक पलभरमें वह विमान वैकुण्ठमें जा पहुँचा । इस वैकुण्ठको देखकर मैं परमानन्दित हुवा । वहाँ मैंने सनातन विष्णुको देखा । सहस्रों प्रकारके ब्रह्मा और शिव और इन्द्र इत्यादि देवता देखे उस सनातन विष्णु का स्वरूप अलसीके पुष्पके सदृश दिखाई दिया । शेषनागकी शय्यापर शयन कर रहे हैं लक्ष्मी चँवर कर रही हैं । ब्रह्माजी नारदसे कहते हैं कि, हम दोनों इस माया को देखकर आश्चर्यान्वित हो रहे । वहाँसे विमान उड़कर समुद्रमें पहुँचा । वहाँ सहस्रों प्रकारके कुएँ और बावडियाँ दिखलाई दीं, वहाँका जल अत्यंत मीठा था, सहस्रों प्रकारके वृक्ष और मोती इत्यादिकी खान थीं इस स्थानका नाम मुनिद्वीप था, अनेक प्रकारकी दवाई बूँटी और पुष्पोंकी सुगंधि आरही थी, भँबरे गूँज रहे थे, वहाँके मनुष्य रत्नजटित वस्त्र आभूषण पहने हुए थे और वहाँ एक रत्नजटित पलंग था । उसपर एक देवी बैठी थी । उसकी श्रीवामें सहस्रों प्रकारके रत्नोंकी माला थी, वह सूर्यके सदृश देदीप्यमान थी, वहाँ उसके नेत्रोंका प्रकाश करोड़ों लक्ष्मीके सौन्दर्यके सदृश था और अंकुश तथा त्रिशूल उसके समीप धरा था तथा उस माहामाया का दर्शन करके मैं बड़ा ही सुखी हुआ और सहस्रों प्रकार के रत्नों से जड़े हुए देखे, सहस्रों देवियों उस माहामायाकी सेवा और चँवर कर रही थीं । ब्रह्माजी नारदजीसे कहते हैं कि, हम तीनों उस सनातन आदिमहामायाका दर्शन करके आनन्दित हुए फिर आगे चलकर एक और दूसरी मूर्तिका दर्शन हुवा जो बालकके समान एक बड़के पतेपर लेटा था, बच्चोंके सदृश अपने पावोंका अँगूठा, अपने मुँहमें दिये हुए था, उसको देखकर नितान्तही हर्षित हुए, अपने मनमें सोचा कि, कामनाओंको पूर्ण करनेवाली यही माहामाया है ।
चौथे अध्याय—ब्रह्माने नारदसे कहा कि, हम तीनोंने इस महामायाके समीप जानेका उद्योग किया, इतनेमें एक विमान आकाशसे उतरा, उस विमानसे सहस्रों प्रकारकी स्त्रियोंको उतरती देखकर हम तीनोंको अत्यन्तआश्चर्य हुआ, उनमें कोई पुरुष नहीं था, सब स्त्रियाँ थीं, तब हम तीनों देवताओंने स्त्रीरूप धारण कर लिया, हमभी उन स्त्रियोंके बीचमें गए, उनका सौन्दर्य हमारे कथनसे बाहर है, इस महामायाको बड़के पत्तेपर सोया देखकर हम उसके चरणोंके समीप गए, तब समस्त स्त्रियोंने हमारी ओर देखा, उनको हमारे स्त्री होनेका ज्ञान नहीं हुआ। तब श्रीमहामाया मुसकराई, और प्रसन्न हुई, उस समय उस महामायाके चरणोंके नखोंमें एक कौतुक दिखलाई दिया कि, जैसे दर्पणमें मूर्तिका प्रतिबिम्ब दिखलाई देता है। वैसेही इसमें अनगिनती ब्रह्माण्ड और अनगिनती वृक्ष और पर्वत और अनगिनती ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सूर्य, चन्द्र, अग्नि, इत्यादि देखे बरुण, वीर त्वष्टा, विश्वआत्मा नारद, ऋषि, मुनि, गंधर्व, अश्विनीकुमार, सहस्रों प्रकारके नाग, वैकुण्ठ, स्वर्ग, पाताल और विष्णुकी नाभिकमलमें ब्रह्मा भी देखा, मधु कंटभकी लड़ाई भी देखी, इस मायाका पारपाया नहीं जाता। इस प्रकार सौ वर्ष पर्यन्त हमने मेधासमुद्रमें कौतुक देखा, इस कौतुक देखनेके उपरान्त विष्णु महाराज देवीकी स्तुति करनेको दंडायमान हुए कि, हे महामाये सच्चिदानन्द रूपिणी ! मैं तुमको नमस्कार करता हूँ कि, समस्त पृथ्वी आकाश पर्वत और जलके बीच आपही समा रही हो। हे मातः ! यह महाज्ञान हमको आपके चरणोंके प्रतापसे हुआ, समस्त कर्तव्याकर्तव्यको मैंने जाना, आपके चरणोंके प्रभाव विना किसीको ज्ञान नहीं होता, संसारमें यह बात स्तब्ध है कि विष्णु विना और दूसरा कोई नहीं, परन्तु आपके चरणोंके प्रभावसे यह ज्ञान मुझमें उत्पन्न हुआ, हे मातः ! जिस समय मुझको नींद आगई थी उस समयभी तुम्हारी कृपासे मधु कंटभका नाश हुआ, ब्रह्माकी रक्षा की थी। इस संसारमें देवता और मनुष्य जानते हैं कि, विष्णु पालन करता है। परन्तु विना आपके मुझको पालनेका सामर्थ्य नहीं है। हे मातः आपके नखोंमें अनेक ब्रह्मा और अनेक विष्णु और अनेक रुद्र इत्यादिको देखकर मेरी बुद्धि चक्कर खागई, अब मुझको ज्ञान हुआ कि, मैं स्त्रीरूप होकर सर्व आपकी सेवा किया करूँ।
पाँचवाँ अध्याय—विष्णुके उपरान्त शिवजीने बड़ी स्तुति की कि, हे मातः ! जो कुछ है सो सब तेरी लीला है। तेरे विना हम कौड़े मकोड़ेके समान भी नहीं, तेरीही कृपासे मैं जगत्का संहार करता हूँ। जब शिवजीने स्तुति की तब महामाया के मुखसे एक मंत्र निकला, उसको शिवजीने याद करलिया, उसके कारण प्रत्येक स्थानपर शिवजीको महामायाकी मूर्ति दिखलाई दी। फिर नारदजीने स्तुति की
६ अध्याय कुछ लीलाएं
छठवाँ अध्याय—तब महामाया मुसकराकर बोलीं, कि ऐ देवताओ ! तुममें और मुझमें कुछभी विभिन्नता नहीं, जो विभिन्नता मानता है वह नरकमें जायगा, ब्रह्मा और विष्णु और शिव सब मैं हूँ अन्य कोई नहीं, इस समस्त जगत्का कारण मैं हूँ । मैंने भिन्न भिन्न कार्योंके निमित्त अपने पृथक् २ नाम रखे हैं । समस्त वेद तथा शास्त्रोंमें मेरे पृथक् पृथक् नाम हैं । मेरीही कामनासे उत्पत्ति स्थिति और प्रलय सब कुछ है । ब्रह्माने महामायाकी स्तुति करके नवार्ण मन्त्र पाया । ब्रह्मा विष्णु और शिव तीनोंको उत्पत्ति स्थिति और विनाशके मन्त्र बतलाकर, महालक्ष्मी महाकाली और महासरस्वती विमानारूढ होकर अन्तर्धान हो गईं । ब्रह्माजीने नारदजीसे कहा कि, ए पुत्र ? तू समझ ।
सातवें अध्यायमें—ब्रह्माने नारदको निर्गुण और सगुणका समस्त रहस्य बतलाया । यह ब्रह्मा मायासे उत्पन्न हुवा । मायाही ब्रह्माका गुरु और पथदर्शक है । महामायाका उपदेश ब्रह्माको मिला ब्रह्माका उपदेश ऋषीश्वरोंको मिला । ऋषीश्वरोंका उपदेश समस्त जगत्को मिला । यह जगत् मायाका बन्धन है । काम क्रोधादिकी कामनाओंसे कलुषित हुआ है । ब्रह्मलोक कैलास आदिक सभीमें मायाका कौतुक है । अन्धा मनुष्य इसीमें भूल रहा है, यथार्थकी ढुढ़ाई कौन करे कि, वह क्या है ? जब ब्रह्माही बेसुध हुआ तो दूसरा कैसा सूचना पावे ? प्रत्येक मनुष्य बड़ोंसे सूचनाएँ पाते हैं । हमारा प्रपिता अति अज्ञानवश मायाके चक्करमें पड़ा डुबकियाँ खारहा है । मायाको समस्त संसारका बीज समझकर उसकी पूजामें संलग्न है तो अपनी सन्तानोंको क्यों न बही पथ बतावे । ब्रह्मा वेद पढ़ २ करभी मायाकी नदीमें डुबकियाँ खारहा है । इसी कारण मनुष्योंका हाथ पकड़नेके निमित्त तथा उनको मुक्तिपथ बतलानेके अर्थ किसी दूसरे गुरु तथा पथदर्शककी आवश्यकता है । ब्रह्मा तथा कर्मकी पथदर्शकताही अज्ञानी हम लोगोंके लिये बहुत नहीं है । ब्रह्मा बेचारा मुक्तिमार्गको क्या जाने उसकी पहुँच तो वेद ही पर्यन्त है । महामाया यथार्थ रहस्यको ब्रह्मासे कदापि न बतलाती । अपने भीतरसे बाहर न निकालती । पर ब्रह्मा इस भेदसे नितान्त ही अनभिज्ञ था, इस कारण माया उन सबोंसे श्रेष्ठ है । ब्रह्मा उसके अधीन है, सदैव उसको इस संसारके प्रबन्धका सोच करता है । जैसे प्रत्येक गृहस्थ अपने बाल बच्चोंके सोचमें रहता है वैसेही ब्रह्मा इस जगत्के विचारोंमें रहा करता है । यदि वह जानता कि, मैं क्या हूँ अथवा जगत् क्या है तो समस्त शंकाओंसे निवृत्त होकर अपने यथार्थ अंशकी ओर ध्यान देता । जब उसको अपने यथार्थ अंशसे मिलनेका ध्यान होगा तब वह निश्चय जगत्को तुच्छ मानेगा । फिर उसकी ओर वह दृष्टिपात भी नहीं करेगा । यह बात नहीं है,
यह उसी सत्य पुरुषकी आज्ञाका पालन कर रहा है तथा मोक्ष तक पालन करता रहेगा ।
शिवजी महाराजकी कथा ।
शिवजी समस्त देवताओंमें श्रेष्ठ हैं । सबके अग्रणी हैं, विष्णुके समान शिवजी की पूजा भी तीनों लोकोंमें हुआ करती है, पुराणों तथा समस्त शास्त्रोंके देखनेसे विशेषतः शिवपुराणसे आपकी श्रेष्ठता तथा बड़ाई प्रगट होगी, ये शिवजी जगत्के संहार करनेवाले हैं; बड़े वीर तथा साहसी हैं ॥
वाम मार्ग ।
वाममार्ग एक तरहका शिवका धर्म है । इस धर्ममें जाति पौत्तिका तनिक भी ध्यान नहीं किया जाता है । मंदिरा मांस मछली इत्यादि खाते पीते हैं । अघोर धर्म और अघोर क्रिया समस्त वाममार्गकी शिक्षासे है । विशेषतः योगी संन्यासी मुहम्मदी और शक्ति धर्मके अनेक प्रकारके मनुष्य सब इस मतमें भूत प्रेत राक्षस जिन्द और परी इत्यादि सब इसीमें हैं । यह पन्थ क्रोध लोभादिकका स्थल है । इस शिवका नाम भू है जिससे भवसागर स्थिर है । भव और भवानी दोनों इस भवसागरके सरदार हैं । प्रथम में लिख आया हूँ कि, उत्पत्तिके पूर्व महामाया तीनों भाइयोंको एक कौतुक दिखलाया कि, उन्होंने रक्तसे भरी हुई एक नदी देखा उसमें दुर्गन्धिसे भरा हुवा कूड़ा करकट देखा । इसे देखकर ब्रह्मा और विष्णु तो भाग गए परन्तु शिवजीने उसको चूतड़ोंके नीचे रखकर उसका आसन बना लिया । इस दुर्गन्धिमेंसे आदिभवानी निकल पड़ी वह शिवसे प्रसन्न हुई । शिवको अपना निजका किया । इस कारण भू और भवानी दोनों भवसागरके मूलही ठहरे । समस्त सौंसारिक वासनाएँ आपको भली जान पड़ीं । यह तमोगुण अज्ञानका मूल है । शिवजी क्रोधकी प्रतिमूर्ति हैं । जब तमोगुणी बुद्धि मनुष्यमें आती है तब समस्त कार्य सत्तोगुणके विरुद्ध करता है । तमोगुणी, मुक्ति एवं सत्तोगुणके विरुद्ध है । जब तमोगुण विजयी होता है तब मनुष्य भौति २ के दुष्कर्मों में फँसता है; उसका फल जो है सो संसारमें प्रगट है ॥
श्री कागभुसुण्डिकी उत्पत्ति ।
वसिष्ठ संहितामें अर्थवाद लिखा है कि, शिवजीके साथ अनेक स्त्रियाँ थीं वे समस्त देवियाँ कागके स्वरूपमें थीं । शिवजी विशेषतः पार्वतीजीसे प्रेमसंबंध जोड़ते हैं कारण यह कि, पार्वतीजी अत्यंत सुन्दरी तथा धर्मिष्ठा थीं । इस कारण अन्यान्य देवियाँ शिवजीसे विरुद्ध तथा पार्वतीजी को बँरिन होगईं । तब इनसबोंने आपसमें परामर्श करके एक दिवस पार्वतीजीको मार डाला । उनका सार पकाया
भैंसेसे वेदपाठ
पार्वतीके हाथ पावोंको काटकर समूचा रख लिया था । वह सार खानेके निमित्त शिवजीके सामने धर दिया । पार्वतीके कटे हुए हाथ पाँव भी साथही सामने रख दिए । वह पार्वतीका हाथ पाँव देखकर शिवजी अत्यंत दुःखी हुए कि, इन सबोंने पार्वतीको मार डाला, जब इन देवियोंने शिवजीको अत्यंत दुःखी देखा तब पार्वती को इन सब देवियोंने पुनः जीवित किया । पार्वती जैसे पूर्व थीं वैसेही पुनः शिवजी के पास बैठ गईं । तब शिवजी उन देवियोंसे नितान्तही प्रसन्न हुए । उन सबोंके साथ दृष्टिभोग किया वे सब गर्भवती हो गईं और उन देवियोंसे पुत्र उत्पन्न हुए । सो सब अपनी माताकी सूरतके थे । वे सब बच्चे तो अपना २ वय पूरा करके मर गए । परन्तु उनमेंसे एक कागभुसुंडी अमर हो गया । वह सदैव जीवित रहता है, महाप्रलयमें भी नहीं मरता, वह नीलगिरि पर्वतपर रहता है और बड़ा प्रसिद्ध ज्ञानी है ।
देवीभागवतके सप्तम स्कंधके तीसवें अध्यायमें लिखा है, कि एक बेर दुर्वासा ऋषि हाम्बूनदीश्वरी भगवतीका दर्शन करनेको गए । माया बीज मंत्रको जपा, तब भगवतीजीने हर्षितहोकर अपने गलेकी माला उतारकर दुर्वासाजीको दे दी, वह माला पहनकर दुर्वासाजी राजा दक्षजीके घर गए, सतीजीको दंडवत् प्रणाम किया, तब राजा दक्षने दुर्वासा ऋषिसे प्रार्थना करके वह माला माँगली । अपने गलेमें पहनकर रात्रिके समय राजाने वह माला उतारकर अपने पलँगपर रख दी और अपनी स्त्रीसहित इस पलँगपर लेट रहा । उस मालाकी अप्रतिष्ठा होनेके कारण भगवतीजी अत्यंत क्रुद्ध हो गईं । राजा दक्षकी बुद्धि भ्रष्ट होगई, वह शिवजीसे वैर करने लगा । सतीजीने राजाको शिवका विरोधी देखकर अपनेको अग्निकुण्डमें भस्म कर दिया । सतीजीके भस्म होनेसे शिवजीका क्रोध ऐसा भडका और शिवजीके शरीरसे ऐसी अग्नि बहिर्गत हुई कि, मानों वह तीनों लोकको भस्म किया चाहती है । इस अग्निमेंसे वीरभद्र उत्पन्न हुआ, वह वीरभद्र कालीके गणमेंसे था । इस वीरभद्रके तेजको देखकर समस्त देवता भयभीत हुए । शिवजी के शरण आए । तब शिवजीने कहा तुमको उससे कुछ भी आपत्ति नहीं तुम भयभीत न हो और वीरभद्रको आज्ञा दी कि, तुम राजा दक्षके गृह जाओ, उसको अपना भय दिखलाओ । वह वीरभद्र राजाके घर गया उसका शीश काट डाला । शिवजीने राजाके यज्ञके स्थाममें जाकर सतीजीके शवको राजाके यज्ञकुण्डसे निकाल लिया । अपने कंधेपर रखकर ढाढ़े मार २ कर रोने लगे, हाय सती ! हाय सती ! ! पुकारने लगे । ब्रह्मासे लेकर समस्त देवतागण चिन्तित हुए । शिवजी उस शवको अपने कंधेपर धरे रोते हाय सती ! हाय सती ! ! पुकारते विदेशको
जहांगीर, रामदास
चले । उस समय श्रीविष्णु भगवान् अपना तीर धनुष लेकर शिवजीके पीछे चले जहाँ २ शिवजी गए, वहाँ २ विष्णु भी गए। अपने तीर धनुषसे सतीजीके शरीरको तोड़ते गए । जिन २ स्थानोंपर शतीजीका शरीर गिरा उन उन स्थानोंपर मूर्तियाँ उत्पन्न होगईं । उन स्थानोंपर जो कोई तप जप करे शीघ्र सिद्ध हो जाता है । एक सौ आठ स्थानोंपर वह देह टूट २ कर गिरा, सो समस्त सिद्धस्थान होगा । उन स्थानोंपर लोग मंत्र इत्यादि सिद्ध करते हैं वे शीघ्र सिद्ध पाते हैं और तुरंत सिद्ध हो जाते हैं ।
फिर भोलानाथ महाराजने भस्मासुरको वरदान दिया कि, जिसके शीश पर तू हाथ धरेगा वह तुरन्तही भस्म हो जावेगा । इस दैत्यने चाहा कि, मैं शिवही को भस्म करके पार्वतीको लेलूँ । तब उसके भयसे शिवजी भागे । तब विष्णुने आपका प्राण रक्षा की और भस्मासुरको भस्म किया । इसलिये उस दिनसे वैसे वरदान नहीं देते । ये शिव बड़े दयालु हैं, वर आदि शीघ्रही देदेते हैं ।
निरञ्जनके चार दूत ।
कबीर साहबका वचन है कि, चार दूत सदैव निरञ्जनके दरबारमें उपस्थित रहते हैं, जो आज्ञा तथा उपदेश होते हैं उन्हें तुरंत कार्यमें परिणत करते हैं, समस्त कार्यवाहियाँ तथा काम धाम उन्हींकी आज्ञानुसार होते हैं । ब्रह्मा विष्णु शिव और यम इन्हींको अरबी भाषामें जिव राईल, मेकाईल, इसराफ़ील और इज़राईल कहा है । इसलामके हदीसोंमें इनका विवरण सविस्तार रूपसे किया गया है । परन्तु मैं संक्षेपतः लिखता हूँ कि, हदीस रसूल राबी इब्र अब्बासकी कहावत है कि, जगदीश्वरने आकाशमें अनगिनती देवता बनाए हैं । इनमें चार देवता बड़े हैं । प्रथम जिंवराईल । दूसरे मेकाईल । तीसरा इसराफ़ील । चौथा इज़राईल । इन चारोंको परमेश्वरने पृथक् कार्योंपर नियुक्त किया है । वे सदैव परमेश्वरके अधीन रहते हैं ।
हजरत जिंवराईलका यह काम है कि, जो परमेश्वरकी आज्ञा हो वह पैगम्बरोंके पास पहुँचाया करे । मेकाईलको यह कार्य सौंपा गया कि, वह वृष्टि कर । समस्त संसारको भोजन पहुँचाया करे । इसराफ़ीलके हाथमें नरसिंघा है कि, परमेश्वरकी आज्ञासे फूँके । उसके शब्दसे महाप्रलय हो जाता है । इज़राईल को आत्मा निकालनेकी आज्ञा है । जब इसराफ़ील उत्पन्न हुआ तब परमेश्वरसे बल मांगा कि, सबसे मुझमें अधिक बल हो। निदान समस्त जीवोंसे इसराफ़ीलमें बल विशेष है । जो माँगा सो परमेश्वरने प्रदान किया । इसराफ़ील के शरीरमें जितने बाल हैं प्रत्येकबालमें सहस्रों मुँह और प्रत्येक मुँहमें एक २ लाख जिह्वा
कमाल कमालीका जिलाना
हैं । प्रत्येक जिह्वाद्वारा परमेश्वरका गुणानुवाद करता है । प्रत्येक जिह्वासे एक दममें दश लाख नाम लेता है । प्रत्येक मालासे दशलाख देवता उत्पन्न होते हैं । वह भी परमेश्वरके गुणानुवादमें संलग्न होते हैं । उन समस्त फ़रिस्तोंकी सूरत इसराफ़ीलकी तरह है । उन समस्त फ़रिस्तोंका नाम परमेश्वरने मुकर्रंब रक्खा है ।
करामन कातबीनकी पुस्तकमें लिखा है कि, इसराफ़ील सदैव दुःखी रहता है । उसके नेत्रोंसे सदैव अश्रुधारा प्रवाहित रहती है और इतने आँसू चलते हैं कि, यदि वह समस्त जल एकत्रित किया जाता तो समस्त सृष्टि डूब मरती । इसराफ़ीलका क्रद इतना बड़ा है कि, यदि नूहके समयकी बाढ़का समस्त जल उसकी पीठपर डाला जावे तो वह समस्त जल उसकी पीठपरही सूख जावे और पृथ्वीपर न पहुँचे ।
इसराफ़ीलकी उत्पत्तिके पांच सौ वर्ष उपरान्त मेकाईल उत्पन्न हुवा । मेकाईलके दश लाख नेत्र हैं । परमेश्वरके भयसे सदैव रोया करता है । उसके प्रत्येक नेत्रसे सत्तर २ सहस्र धाराएँ आँसुओंकी बहती हैं जितनी बूँदें होती हैं, प्रत्येक बूँदसे परमेश्वर दश २ फ़रिश्ते उत्पन्न करता है । और वे समस्त फ़रिश्ते मेकाईलकी सूरतके होते हैं । वे सब सदैव परमेश्वरकी वंदनामें लगे रहा करते हैं । उन समस्त फ़रिस्तोंका नाम करीबी है उन समस्त फ़रिस्तोंका यह कार्य है कि, सबको रोजी पहुँचाया करें । पृथ्वीपर जितने अनाज और फल हैं प्रत्येकपर मेकाइलका एक चौकीदार फ़रिश्तः रहता है । ऐसे वृक्षका फल कोई नहीं जिस पर कि, मेकाईलका एक फ़रिश्तः न हो ।
जब पाँच सौ वर्षका वय मेकाइलका होचुका तब परमेश्वरने जिबराईल को उत्पन्न किया । और छः लाख डहने आपने जिबराईलको प्रदान किए । तीनसौ साठ बार प्रत्येक दिवस वह तेजकी नदीमें डुबकी मारा करता है । जब जब वह गोता मारता है जितनी बूँदें तेजकी उसकी शरीरसे गिरती हैं परमेश्वर उस प्रत्येक बूँदसे एक एक दूत उत्पन्न करता है । वे समस्त फ़रिश्ते जिबराईलकी प्रतिमूर्ति हैं । जिबराईलके आधीन रहते हैं । महाप्रलयपर्यन्त परमेश्वरकी प्रशंसा करते हुए उसीके शोचमें रहते हैं ।
जिबराईलके पांचसौ वर्ष उपरान्त परमेश्वरने इज़राईलको उत्पन्न किया । इज़राईलके उत्पन्न होनेके उपरान्त परमेश्वरने मृत्युको उत्पन्न किया । मृत्युका शरीर बहुत बड़ा पृथ्वीसे आकाशपर्यन्त था । बड़ाही भयानक था । जब पहले फ़रिश्तोंने मृत्युको देखा तो भयभीत होकर अचेत हो गए । सहस्र वर्षपर्यन्त चुपचाप
पुस्तकोंका लिखाजाना
अचेत पड़े रहे। इसराईलको परमेश्वरने इतना बल प्रदान किया कि, उसने मृत्यु को अपने वशमें कर लिया। यमको परमेश्वरने अनगितनी आँखें प्रदान की हैं। उसके चार पर हैं। जितने पृथ्वी तथा आकाश हैं। सबकी और उसकी एक आँख रहती है। जब कोई जीव मर जाता है तब उसकी एक आँख गिर पड़ती है। जब कोई उत्पन्न होता है तब उसकी एक आँख बढ़ जाती है। जब आदम उत्पन्न हुवा था, उसी समयसे मृत्यु उत्पन्न हुई थी।
यह तो मुसलमानी हदीसके अनुसार चारों फ़िरिश्तोंका हाल लिखा गया। पश्चिमदेशीय अम्बिया सहानुभावता प्रकाशित करते हैं। जो नबियों की हदीसे हैं, सूक्ष्म वेदसे कहीं २ मिलती हैं, कहीं २ विभिन्नता भी है। वो उनकी विद्याका दोष है। इसके अतिरिक्त कहनेवालोंने कुछ विभिन्नताकी अथवा लिखनेवालों ने कुछ औरका और लिख दिया परमेश्वरी वाक्य सब ठीक हैं परन्तु समझनेवालों में दोष है। जिनका हृदय कलुषित हैं वे परमेश्वरी वाक्यको समझ नहीं सकते।
यह समस्त संसार हरिण्यकशिपु फिर ऊन (परमात्माका वागी) इत्यादि सद्गुण अंधा और अज्ञानी है। अपनेको अपने कर्मोंका कर्ता तथा भोक्ता जानता है। जबलों यह अपनेको कर्मोंका कर्ताभोक्ता जानता है तबलों यह निश्चय उन तीनों के अधीन रहेगा। यह तीनों उसके परमेश्वर होंवेंगे। जब यह जान लेवेगा कि, मैं कर्मोंका कर्ता तथा भोक्ता नहीं हूँ, तब उसकी भीतरी आँखें खुल जावेंगी। तब यह फिरऊनी प्राणसे दूर भागेगा। सुतरां मूसाकी दूसरी पुस्तक खिरोजनामकका (७) वाब।
(१) फिर खुदावन्दने मूसासे कहा कि, देख मैंने तुझे फ़िरऊनके निमित्त परमेश्वरसा बनाया तेरा भाई हारूँ तेरा अनागतवक्ता होगा। (२) सब कुछ जिसकी मैं तुझको आज्ञा दूँ कहना। तेरा भाई हारूँ फिर ऊनसे कहेगा कि, बनी इसराईलको अपने देशसे जाने दो। मैं फ़िरऊनके हृदयको दृढ़ करूँगा। इत्यादि।
अब यहां पर दोनों कि, मूसा तो फ़िरउनका खुदा था। हारूँ रसूल अर्थात् भविष्यवक्ता था। इसी प्रकार इस संसारके ये तीन परमेश्वर हैं। समस्त धर्मों के अग्रगण्य भविष्यवक्ता हैं। यह संसारके मनुष्य पशुओं तथा डेंगरू डोरके सद्गुण हैं। ये तीनों इसके चरब हैं और परमेश्वर हैं। क्या भेड़ बकरियाँ अपने चरवाहेके अतिरिक्त और किसी परमेश्वरकी सुध पासकती हैं? कदापि नहीं।
इसी प्रकार अनगितनी ऋषि मुनि अपनी २ सृष्टिके परमेश्वर हैं। यथार्थ परमेश्वरको कौन जान सकता है?
इस सृष्टिकी दृष्टि व्यर्थ और बिलकुल रूढ़ी हुई है । इस कारण यह यथार्थ परमेश्वरको पहचान नहीं सकता ।
जैसे—एक पिपीलिका जो कागज पर फिरती अथवा बँठी हो वह देखती है कि, कागजपर अक्षर बनते जाते हैं । वह केवल लेखनीको देख सकती है विशेष दृष्टि उठावे तो उँगलियोंपर्यन्त देखे । तीन उँगलियोंको उसका कारण जाने । इसमें विशेष देखनेका सामर्थ्य नहीं । कोई बड़ा जीव बाजूपर्यन्त देख सकता है, कोई समस्त शरीर देखता है । कोई आत्माको देखता है, कोई अपने यथार्थ-तत्वसे विज्ञ है ।
कर खाब अपना दूर तू ग़फ़लतको छोड़ जाग ।
हर सिस्त हर मक़ामें लगी देखलीजे आग ॥
आँखोंको खोल आजिज़ उठ जल्द जाव भाग ।
है कामशशीशः एक फ़क़त दूरवीनका ॥
देखो जिधरको जाके तमाशा है तीनका ॥
मनु स्वायम्भूकी कथा ।
देवीभागवतके दशमस्कंधके प्रथम अध्यायमें लिखा है कि, विष्णुकी नाभि-कमलसे ब्रह्मा उत्पन्न हुवा, ब्रह्मासे मनु स्वायम्भू उत्पन्न हुवा । मनु स्वायम्भू क्षीर समुद्रके किनारेपर जा श्रीभगवतीजीकी मिट्टीकी मूर्ति बनाकर एक चरणसे खड़ा हो और बिना अन्नजलके बंदना करते हुए वाक्यबीजमंत्र पढ़ता रहा । अपने श्वास को रोककर वृक्षके सदृश खड़ा रहा । तब श्रीभगवतीजी सौ वर्षके उपरान्त प्रसन्न हो कहने लगीं कि, वरदान माँगो । तब मनुजीने निवेदन किया कि, मेरी इस बंदना में कुछ बिगाड़ न हो । इस बंदनासे मेरी कामना पूरी हो । भगवतीने कहा कि, तथास्तु । इसी मंत्रसे मनुने जगत्की रचना की ।
दशवें स्कंधके नववें तथा दशवें अध्यायमें देखो कि, सब मनु श्रीभगवतजी की पूजा करते रहे और देवीसे वरदान पाकर सांसारिककांक्षाओंको प्राप्त करते रहे यही मानवी सृष्टिके आदि प्रवर्तक हैं ।
राजा इन्द्रकी कथा ।
समस्त देवताओंका राजा इन्द्र है । यह बड़ा ज्ञानी है । समस्त देवता उसकी आज्ञामें रहते हुए सेवा करते हैं । यह इन्द्र कहता है कि, मैं समस्त संसारका सृजन करता हूँ, मुझसे ही उत्पत्ति स्थिति और मृत्यु सब कुछ है । सुतरां ऋग्वेदमें सकलोपनिषदमें लिखा है कि, यद्वात्थ नामक एक ऋषिको राजा इन्द्र वैकुण्ठमें उठा ले गया । तब उस ऋषिने पूछा कि, तू कौन है ? तब इन्द्रने उत्तर दिया कि, तू जप तप