भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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मूसा और अलियास उससे बातें करते उन्हें दिखाई दिए । (४) ए परमेश्वर ! हमारे निमित्त यहाँ रहना अच्छा है । यदि इच्छा हो तो हम यहाँ तीन डेरे बनावें । एक तेरे और एक मूसा और एक अलियासके निमित्त । (५) वह यह कहताही था कि एक प्रकाशमय बादलने उनपर साया कर दी, इस बादलसे एक आवाज इस विषयकी आई कि, यह मेरा प्यारा बेटा है जिससे मैं प्रसन्न हूँ । तुम उसकी सुनो (६) शिष्य यह सुनकर मुहँके बल गिरे अत्यन्त भयभीत हुए । (७) तब मसीहने इन्हें छूकर कहा कि, उठो भयभीत मत हो । (८) पीछे उन्होंने अपनी आँख उठाकर मसीहके अतिरिक्त और कुछ नहीं देखा ।

वह तो हजरत ईसाने अपना प्राकृतिक स्वरूप अपने शिष्योंको दिखल-लाया था ।

प्रगट हो कि, सब वह अवतार इसी निरञ्जनके हैं । जो उसके मुख्यपुत्र कहलाते हैं । इन ऋषीश्वरों सिद्ध साधुओं पीर पैगम्बरोंको बड़ा बल होता है परन्तु इनको न तो अपने प्राकृतिक स्वरूपकी सुध रहती है । न अपना आवागमन बन्द करनेकी युक्ति मालूम है । ये सब अवतार निरञ्जनके पुत्रोंके हैं और अपने पिता विराटके स्वरूपमें हैं ।

यह विष्णु सबमें बादशाह है । इस बादशाहके पास युद्धका समस्त समान है । इसके पास पाञ्चजन्य शंख है । जब वह समरके निमित्त चढ़ता है तब पाञ्च जन्य शंख फूंक डंका बजाकर चढ़कर युद्ध करता है । वास्तवमें इसे कोई कामना नहीं । भक्तोंके उद्धार तथा संसारी जनोंके बोधके लिये ऐसा किया करता है ।

भगवान् विष्णुके विषयमें कबीर साहिबजी कहते, चले आ रहे हैं कि सत्य पुरुष विष्णु भगवान्को पकड़ो उसके सच्चे भक्तोंका मान करो झूठे गुरुआ लोगोंके फन्देसे बचो । ये किसी बिरले पुरुषको मिलते हैं, जिसे मिलते हैं वो इनकी ही कृपासे सत्य पुरुषके लोकको चला जाता है । फिर भी जीवोंकी बुद्धि अन्धी हो रही है जो इस ओर ध्यान नहीं देते ।

देखो भगवान् विष्णुके विषयके कबीर साहिबके शब्द—

शब्द ३७—हरिठग ठगत सकल जग डोला ।

गवन करत तोसों मुखहु न बोला ॥

बालापनके मीत हमारे । हमें छाड़िकस चले सकारे ।

तुम अस पुरुष हों नारि तुम्हारी ।