भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 375

शब्द १४—रामरा संशय गाठिन छूटे । ताते पकरि २ यम लूटे ॥ १ ॥

जो राम के उपासक नहीं हैं उनकी संशय की गांठ नहीं छूटती इस कारण सबको यह पकड़ २ कर लूटता है । इन दोनों शब्दोंसे कबीर साहिबने स्पष्ट शब्दोंमें कह दिया है कि, रामको छोड़ दूसरेका स्मरण करना अन्धोंका काम है, बिना उसका स्मरण किये संशयकी गांठ नहीं छूटती । हृदयकी कुन्डी नहीं खुलती रामका अनुभव या यथार्थ ज्ञान क्यों नहीं होती । इस पर कबीर साहेब कहते हैं कि—

स्मृति वेद पुराण पढ़ै सब, अनभव भाव न दरशै ।

लोहो हिरण्य होय धों कौसे, जो नहिं पारस परसै ॥

चाहे वेद स्मृति पुराण एवम् अनेक तरहके सम्प्रदायिक पोथा पढलो पर बिना अविचल प्रेम दृढ़ विश्वास और सच्चे गुरु रामका अनुभव हो नहीं सकता । वो सीताके लिये बन २ फिरनेवाला रावणका संहारक ही दीखेगा । पर जब पारसरूप गुरु मिल जायेंगे तो परसकर लोहे को पारसकर सोना बना लेंगे ।

उसी रामने सुप्रीवकी सख्य भक्तिके वश हो उसके बडे भाई बालिपर छलसे प्रहारकरके अपने बनाये कर्म नियमको, भी मर्यादा पुरुषोत्तमने अटल दिया कि, ए अंगद ! तू बापके बदलेके लिये उतावला न हो मैं तेरे बापका बदला स्वयं चुकाऊंगा । हुआ भी ऐसा ही । कृष्णावतारमें मर्यादा पुरुषोत्तमने कर्मफलकी मर्यादाको अनिवार्य दिखलाते हुए बालिके हाथके तीर से ही इच्छामय लीलाविग्रहका संवरण किया । भिलनी केवल निषादराज राक्षसराज और गीधराज आदि अनन्तोंको अपनाकर अपना नित्यधाम दिया जिसके रहनेवाले भगवानकी आज्ञासे संसारमें लोक कल्याणके लिये आकर भी निर्द्वन्द्व रहते हैं जैसे वहाँ अनुभव करते थे वैसाही यहाँ पर भी करते रहते हैं । श्रीकबीर साहेब बडे भी अपनानेवाले आप थे, कबीर साहिबमें जो भी कुछ कबीरपंथा था वो सब आपकी कृपाकाही फल था ।

पूर्णब्रह्म भगवान् कृष्ण ।

अब हम भगवान् कृष्णचन्द्रजीके कुछ वात्सल्य पूर्ण गुणोंको सुनाना चाहते हैं जो कि, अवतार लेकर एक भक्तिको देखते हैं, दूसरे वहाँ कुछ भी भेद भाव नहीं होते । कश्यप ऋषिके दिति अदिति नामकी दो स्त्रियाँ थीं । अदितिसे राजा इन्द्र उत्पन्न हुआ । वह देवतोंका बड़ा बलिष्ठ राजा हुवा । तब दितिने कश्यपजीसे निवेदन किया कि महाराज ! मेरे ऊपर भी दया करो कि, मेरा