भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 376

भी इन्द्रके समान बलिष्ठ तथा प्रतापी पुत्र उत्पन्न हो तब कश्यपजीने कहा कि, तूभले कार्य कर तो तेरा पुत्र भी वैंसाही होगा और दिति भी सुकर्म करने लगी। तब दिति गर्भवती हुई जब उसको गर्भ रहा तब दितिका चेहरा तेजमय हो गया। यह स्वरूप देखकर अदितिने ईर्षा की और अपने पुत्रसे कहा कि, ए पुत्र। तेरा बैरी दितिके गर्भसे उत्पन्न हुवा चाहता है जो तुमसे सामना करेगा। तब इन्द्रने कहा कि, माता ! तू कोई चिंता न कर, मैं भली भाँति युक्ति करूँगा, तब इन्द्र एक छोटा अस्त्र लेकर और बहुत छोटा रूप धारण करके अपने योगबलसे दितिके पेटमें पैंठ गया, उस गर्भके बालकके सात टुकड़े किए और फिर उन सातमें भी और सात २ टुकड़े किए। जब उस बच्चेको दुःख हुआ तब रोने लगा। तब इन्द्रने कहा कि, ए भाई ! तुम मत रोओ, तुम सब उनचास मरुत् हो गए। जब दितिको मालूम हुवा कि, आदितिके कहनेसे इन्द्रने मेरे साथ ऐसा व्यवहार किया और मेरे गर्भके पुत्रके उनचास टुकड़े किए, तब उसने अदितिको शाप दिया कि, जैसे तेरे पुत्रने मेरे पुत्रको मारा काटा है उसी प्रकार तेरे पुत्रोंका भी विनाश हो और तू बंधनमें पड़े। जैसे बंधन तथा गर्भमें मेरे बच्चेको मारा तैसे बंधनमें तेरे बच्चे मारे जावें। वही अदिति देवकी हुई और कश्यप ऋषि वसुदेव हुए।

उन्हींके घर जब कि, पृथ्वीने जाकर पुकार किया कि, मेरे ऊपर पापी राक्षस और अनेक दैत्य इत्यादि होगए हैं मैं दुःखी हूँ। इस कारण इनके मारनेके निमित्त कृष्णावतार हुवा। समस्त राक्षसों तथा दैत्योंका विनाश किया। इसी प्रकार विष्णु अवतार पृथ्वीपर हुवा करता है और अवतार धरकर राक्षसोंका नाश करते हैं।

इन्होंने मुमुक्षुजनोंके कल्याणके लिये गीता जैसे शास्त्रका निर्माण किया जिसके छोटेसे रहस्यकी चिनगारियोंके सोले, मात्र ही सारे संप्रदायके रहस्य हैं। कबीर साहिबने इस गीता काही अनुवाद उग्रगीताके नामसे करके धर्मदासजी को सुनाया है। सौलभ्य गुण, जितना इस अवतारमें मिलता है उतना किसीभी में नहीं मिलता। उग्र गीतामें कहा है कि —सर्वव्यापक मैं हों भाई, मोहि बिन दूजा और न कोई” मैं सर्वव्यापक सत्य पुरुष हूँ, मैं ही एक हूँ मेरे बिना और कोई नहीं है। ये ही सत्य लोकके अधिपति हैं, राम आदि इन्हीके अनन्त नाम हैं, हंस कबीर इन्हींके लोकसे आते जाते हैं।

क्या इस रहस्यसे ईसाई अनभिज्ञ हैं ? अथवा मुहम्मद साहबके ग्रन्थोंका वृत्तान्त मुसलमान लोग नहीं जानते हैं ? सब जानते हैं। परन्तु इस मनुष्यके