कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 374, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंअवतार हुआ। यद्यपि वहाँ कौशल्यका वर पाना अतिही सुगम था तो भी उन्होंने वात्सल्य भक्तिसे प्रेरित होकर भगवान् को पुत्र बनने काही वर माँगा क्योंकि, बिना अपने ध्येयके आगे विश्वके साक्षाज्यको, नरककी भयंकरका तपत साधन समझते हैं। येही भगवान् रामचन्द्रजी महाराज कबीर जी साहिबके परम इष्ट थे। स्वामी रामानन्दजीसे ये ही दो अक्षर कानमें पड़नेके बाद मंत्रका रूप आपसे पूछा तो आपने परिस्फुट शब्दोंमें समझाते हुए कह दिया कि, 'राम न कह्यो खुदाई' ऐ मुसलमानों! तुम रामका महत्त्व नहीं समझ सकते, किन्तु तुमभी भूलके साथ इस खुदा शब्दसे भी रामको ही याद कर रहे हो।
इसी बातको शब्द चारमें कह दिया है कि—'हिन्दू कहै मोहि राम पियारा, तुरक कहै रहिमाना। आपसमें दोउ लरि लरि मूये, मर्म कोई नहि जाना' हिन्दू कहते हैं कि, हमें राम प्यारा है तथा तुरक रहमानका प्यारा बताते हैं। दोनों आपसमें लड २ कर मर गये पर मर्मका पता न चला कि, रामको ही वो दयालु कहकर याद कर रहे हैं। इन्होंने और भी कितनी ही स्थलोंपर भगवान् रामका गुण गाया है जिसमें से कुछ एक यहीं उद्धृत करते हैं।
शब्द १३—राम तेरी माया दुन्दि मचावे ॥
गति मति वाकी समझि परे नहिं, सुरनर मुनिहिं नचावे ॥ १ ॥
कबीर साहिब कहते हैं कि, हे राम! तेरी माया ऊधम मचा रही है। या मैं तू का भेद कर रही है यदि यह न हो, तो मैं तू का भेद न रहे। उसकी चाल तथा ज्ञान विचार जाने नहीं जाते यह सुर नर मुनि सबको नचा रही है।
शब्द ८—वे रघुनाथ एकके सुमिरै जो सुमिरै सो अन्धा ॥ ७ ॥
बिना एक सत्यपुरुष रघुनाथके सुमिरन किये जो किसी दूसरेका स्मरण करता है वो अन्धा है भगवान् रामको छोड़कर किसीका भी स्मरण न करना चाहिये।
१—दो शब्द—प्रायःभमें कबीर मंशूरका अर्थ कबीर साहिबकी ज्योतिर्या कहा गया है। इस कारण इस ग्रन्थमें कबीर दर्शन या उससे सम्बन्ध रखनेवाले एवम् उसके परिपोषक विषयोंका ही संग्रह होना चाहिये। कबीर साहिबका जीवन चरित्र भक्तभालमें है। सनातन धर्मों उन्हें इस कराल कलिकालके भक्तोंमें एक उच्च कोटिका मानते हैं। इस नातेसे वे भी उनपर उतनीही श्रद्धा रखते हैं जितनी कि, उनके सम्प्रदायके लोग उनपर रखते हैं वे परम भक्त थे। इस कारण उनका महत्त्व ईश्वरसे भी अधिक वर्णन किया जाय तो सनातनियोंकी तो आनन्दकी ही बात है। क्योंकि उनके यहाँ तो "दासानुदासो भवितास्मि भूयः" का अधिक महत्त्व है।
ईश्वरके दास होनेसे पहले ईश्वरके दासोंमें अपना नाम लिखाना सबसे उत्तम मानते हैं। इस कारण उनका महत्त्व वर्णन तो सुखका ही कारण होगा किन्तु जो बात उनके वचनों तथा उनके मान्य साम्प्रदायिक ग्रन्थोंसे बिल्कुल विभिन्न हो उस बातको उनके प्रकाशमें मिश्रित करना सर्वथा अनुचित प्रतीत होता है।