कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 383, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंछठवाँ अध्याय—तब महामाया मुसकराकर बोलीं, कि ऐ देवताओ ! तुममें और मुझमें कुछभी विभिन्नता नहीं, जो विभिन्नता मानता है वह नरकमें जायगा, ब्रह्मा और विष्णु और शिव सब मैं हूँ अन्य कोई नहीं, इस समस्त जगत्का कारण मैं हूँ । मैंने भिन्न भिन्न कार्योंके निमित्त अपने पृथक् २ नाम रखे हैं । समस्त वेद तथा शास्त्रोंमें मेरे पृथक् पृथक् नाम हैं । मेरीही कामनासे उत्पत्ति स्थिति और प्रलय सब कुछ है । ब्रह्माने महामायाकी स्तुति करके नवार्ण मन्त्र पाया । ब्रह्मा विष्णु और शिव तीनोंको उत्पत्ति स्थिति और विनाशके मन्त्र बतलाकर, महालक्ष्मी महाकाली और महासरस्वती विमानारूढ होकर अन्तर्धान हो गईं । ब्रह्माजीने नारदजीसे कहा कि, ए पुत्र ? तू समझ ।
सातवें अध्यायमें—ब्रह्माने नारदको निर्गुण और सगुणका समस्त रहस्य बतलाया । यह ब्रह्मा मायासे उत्पन्न हुवा । मायाही ब्रह्माका गुरु और पथदर्शक है । महामायाका उपदेश ब्रह्माको मिला ब्रह्माका उपदेश ऋषीश्वरोंको मिला । ऋषीश्वरोंका उपदेश समस्त जगत्को मिला । यह जगत् मायाका बन्धन है । काम क्रोधादिकी कामनाओंसे कलुषित हुआ है । ब्रह्मलोक कैलास आदिक सभीमें मायाका कौतुक है । अन्धा मनुष्य इसीमें भूल रहा है, यथार्थकी ढुढ़ाई कौन करे कि, वह क्या है ? जब ब्रह्माही बेसुध हुआ तो दूसरा कैसा सूचना पावे ? प्रत्येक मनुष्य बड़ोंसे सूचनाएँ पाते हैं । हमारा प्रपिता अति अज्ञानवश मायाके चक्करमें पड़ा डुबकियाँ खारहा है । मायाको समस्त संसारका बीज समझकर उसकी पूजामें संलग्न है तो अपनी सन्तानोंको क्यों न बही पथ बतावे । ब्रह्मा वेद पढ़ २ करभी मायाकी नदीमें डुबकियाँ खारहा है । इसी कारण मनुष्योंका हाथ पकड़नेके निमित्त तथा उनको मुक्तिपथ बतलानेके अर्थ किसी दूसरे गुरु तथा पथदर्शककी आवश्यकता है । ब्रह्मा तथा कर्मकी पथदर्शकताही अज्ञानी हम लोगोंके लिये बहुत नहीं है । ब्रह्मा बेचारा मुक्तिमार्गको क्या जाने उसकी पहुँच तो वेद ही पर्यन्त है । महामाया यथार्थ रहस्यको ब्रह्मासे कदापि न बतलाती । अपने भीतरसे बाहर न निकालती । पर ब्रह्मा इस भेदसे नितान्त ही अनभिज्ञ था, इस कारण माया उन सबोंसे श्रेष्ठ है । ब्रह्मा उसके अधीन है, सदैव उसको इस संसारके प्रबन्धका सोच करता है । जैसे प्रत्येक गृहस्थ अपने बाल बच्चोंके सोचमें रहता है वैसेही ब्रह्मा इस जगत्के विचारोंमें रहा करता है । यदि वह जानता कि, मैं क्या हूँ अथवा जगत् क्या है तो समस्त शंकाओंसे निवृत्त होकर अपने यथार्थ अंशकी ओर ध्यान देता । जब उसको अपने यथार्थ अंशसे मिलनेका ध्यान होगा तब वह निश्चय जगत्को तुच्छ मानेगा । फिर उसकी ओर वह दृष्टिपात भी नहीं करेगा । यह बात नहीं है,