भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 389

इस सृष्टिकी दृष्टि व्यर्थ और बिलकुल रूढ़ी हुई है । इस कारण यह यथार्थ परमेश्वरको पहचान नहीं सकता ।

जैसे—एक पिपीलिका जो कागज पर फिरती अथवा बँठी हो वह देखती है कि, कागजपर अक्षर बनते जाते हैं । वह केवल लेखनीको देख सकती है विशेष दृष्टि उठावे तो उँगलियोंपर्यन्त देखे । तीन उँगलियोंको उसका कारण जाने । इसमें विशेष देखनेका सामर्थ्य नहीं । कोई बड़ा जीव बाजूपर्यन्त देख सकता है, कोई समस्त शरीर देखता है । कोई आत्माको देखता है, कोई अपने यथार्थ-तत्वसे विज्ञ है ।

कर खाब अपना दूर तू ग़फ़लतको छोड़ जाग ।

हर सिस्त हर मक़ामें लगी देखलीजे आग ॥

आँखोंको खोल आजिज़ उठ जल्द जाव भाग ।

है कामशशीशः एक फ़क़त दूरवीनका ॥

देखो जिधरको जाके तमाशा है तीनका ॥

मनु स्वायम्भूकी कथा ।

देवीभागवतके दशमस्कंधके प्रथम अध्यायमें लिखा है कि, विष्णुकी नाभि-कमलसे ब्रह्मा उत्पन्न हुवा, ब्रह्मासे मनु स्वायम्भू उत्पन्न हुवा । मनु स्वायम्भू क्षीर समुद्रके किनारेपर जा श्रीभगवतीजीकी मिट्टीकी मूर्ति बनाकर एक चरणसे खड़ा हो और बिना अन्नजलके बंदना करते हुए वाक्यबीजमंत्र पढ़ता रहा । अपने श्वास को रोककर वृक्षके सदृश खड़ा रहा । तब श्रीभगवतीजी सौ वर्षके उपरान्त प्रसन्न हो कहने लगीं कि, वरदान माँगो । तब मनुजीने निवेदन किया कि, मेरी इस बंदना में कुछ बिगाड़ न हो । इस बंदनासे मेरी कामना पूरी हो । भगवतीने कहा कि, तथास्तु । इसी मंत्रसे मनुने जगत्की रचना की ।

दशवें स्कंधके नववें तथा दशवें अध्यायमें देखो कि, सब मनु श्रीभगवतजी की पूजा करते रहे और देवीसे वरदान पाकर सांसारिककांक्षाओंको प्राप्त करते रहे यही मानवी सृष्टिके आदि प्रवर्तक हैं ।

राजा इन्द्रकी कथा ।

समस्त देवताओंका राजा इन्द्र है । यह बड़ा ज्ञानी है । समस्त देवता उसकी आज्ञामें रहते हुए सेवा करते हैं । यह इन्द्र कहता है कि, मैं समस्त संसारका सृजन करता हूँ, मुझसे ही उत्पत्ति स्थिति और मृत्यु सब कुछ है । सुतरां ऋग्वेदमें सकलोपनिषदमें लिखा है कि, यद्वात्थ नामक एक ऋषिको राजा इन्द्र वैकुण्ठमें उठा ले गया । तब उस ऋषिने पूछा कि, तू कौन है ? तब इन्द्रने उत्तर दिया कि, तू जप तप