कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 390, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंदेवताओंके प्रसन्न करनेको किया करता है। वे तो कुछ भी नहीं हैं, यदि उनमें कुछभी सामर्थ्य होती तो तुझको वे मेरे हाथसे छुडा लेते। (१) जो कर्मोंका फल देता है सो मैं हूँ, मेरे गुण संसारको पालनेवाले हैं। ब्रह्माके चारों मुँहसे यह तात्पर्य समझो कि, मेरे मुँह चारों ओर हैं। निदान तुझको चाहिये कि, किसी ओर ध्यान न कर सब मरनेवाले और मैं अमर हूँ, सबोंकी स्थिति दूसरोंके द्वारा है। मैं अपनेहीसे स्थिर हूँ, यज्ञका फलभी मैं हूँ, वह दूध जो यज्ञको शुद्ध करता है मैं हूँ। (२) वह अग्नि जो यज्ञके द्रव्योंको जलाती है मैं हूँ, समस्त संसारमें मैं हूँ, स्वसे पृथक् मैं हूँ, वर्नर जो सर्पस्वरूप है, पर्वतोंमें रहता है शौतान कहलाता है, नबको भयभीत करता तथा बहकाता है उसका मारनेवाला भी मैं ही हूँ। (३) तुझे उचित है कि, जैसा मेरे जाननेका धर्म है वैसा मुझे पहचान कि, मैं अद्वितीय और एक हूँ, मायाके कारण मेरी भिन्न भिन्न मूर्तियाँ दिखलाई देती हैं। (४) मैं निभंय हूँ, सबके हृदयमें बैठकर जो चाहता हूँ करता हूँ। (५) कोई मेरे यथार्थको नहीं जानता, मैं पृथ्वीमें हूँ आकाशमें हूँ और सबके प्रतिपालनका कारण हूँ, कर्म और यज्ञका करानेवाला मैं हूँ और सृष्टिको उत्पन्न करनेवाला मैं हूँ, समस्त सृष्टिका पिता मैं हूँ, जो ओसकी बूँदे गिरती हैं मैं हूँ, वेद तथा वेदका जानने वाला मैं हूँ। (६) वह अग्नि जो समुद्रमें है मैं हूँ, सूर्य जो बारहों मास यात्रा करता रहता है, वह और चन्द्र भी मैं हूँ। (७) जो कुछ देखने सुनने और बोलनेमें और ध्यान तथा सिद्धान्तमें आता है, अथवा इससे पृथक् है वो मैं हूँ, (८) मुझे अपने मनके गृहमें दूढे तो तू भी निभंय हो जावेगा मैं पाँच और दश और सहस्र प्रकारकी मूर्ति रखता हूँ, जो मुझे समझता है वो मुझसा होजाता है। (९) जो झूठ जानता है, झूठ बोलता है और पाप करता है वो यद्यपि वह सहस्र यज्ञ और जीवनपर्यन्त बंदना करे, अन्न जल शयन इत्यादि सभी त्याग दे, दान पुण्य भी करता रहे, तो भी वह मेरे समीप आने नहीं पाता है। (१०) मैं सबको खाता हूँ, मुझको कोई नहीं खा सकता है। (११) तूने जो बंदना किया और तात्पर्य मुझसे रक्खा, इस कारण मैं तुझको उठा लाया। अब जो मैं हूँ वही तू है। इसमें कोई संदेह न कर। पूर्वकालमें तू अज्ञानी था इस कारण मुझसे पृथक् था, अब तू ज्ञानी है और मुझसा होगया। समस्त संसारका रचयिता तथा पालन कर्ता मेरे गण हैं और भी कितनी ही जगह इन्द्रके ऐसे वाक्य आते हैं—‘मैं ब्रह्म हूँ’ इस भावसे सत्यपुरुषको याद करता हुआही अपने कार्यमें रहता है।
बृहस्पति और शुक।
देवोंके गुरु बृहस्पति तथा असुरोंके गुरु शुक महाराज हैं। वाणीको