भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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हैं । प्रत्येक जिह्वाद्वारा परमेश्वरका गुणानुवाद करता है । प्रत्येक जिह्वासे एक दममें दश लाख नाम लेता है । प्रत्येक मालासे दशलाख देवता उत्पन्न होते हैं । वह भी परमेश्वरके गुणानुवादमें संलग्न होते हैं । उन समस्त फ़रिस्तोंकी सूरत इसराफ़ीलकी तरह है । उन समस्त फ़रिस्तोंका नाम परमेश्वरने मुकर्रंब रक्खा है ।

करामन कातबीनकी पुस्तकमें लिखा है कि, इसराफ़ील सदैव दुःखी रहता है । उसके नेत्रोंसे सदैव अश्रुधारा प्रवाहित रहती है और इतने आँसू चलते हैं कि, यदि वह समस्त जल एकत्रित किया जाता तो समस्त सृष्टि डूब मरती । इसराफ़ीलका क्रद इतना बड़ा है कि, यदि नूहके समयकी बाढ़का समस्त जल उसकी पीठपर डाला जावे तो वह समस्त जल उसकी पीठपरही सूख जावे और पृथ्वीपर न पहुँचे ।

इसराफ़ीलकी उत्पत्तिके पांच सौ वर्ष उपरान्त मेकाईल उत्पन्न हुवा । मेकाईलके दश लाख नेत्र हैं । परमेश्वरके भयसे सदैव रोया करता है । उसके प्रत्येक नेत्रसे सत्तर २ सहस्र धाराएँ आँसुओंकी बहती हैं जितनी बूँदें होती हैं, प्रत्येक बूँदसे परमेश्वर दश २ फ़रिश्ते उत्पन्न करता है । और वे समस्त फ़रिश्ते मेकाईलकी सूरतके होते हैं । वे सब सदैव परमेश्वरकी वंदनामें लगे रहा करते हैं । उन समस्त फ़रिस्तोंका नाम करीबी है उन समस्त फ़रिस्तोंका यह कार्य है कि, सबको रोजी पहुँचाया करें । पृथ्वीपर जितने अनाज और फल हैं प्रत्येकपर मेकाइलका एक चौकीदार फ़रिश्तः रहता है । ऐसे वृक्षका फल कोई नहीं जिस पर कि, मेकाईलका एक फ़रिश्तः न हो ।

जब पाँच सौ वर्षका वय मेकाइलका होचुका तब परमेश्वरने जिबराईल को उत्पन्न किया । और छः लाख डहने आपने जिबराईलको प्रदान किए । तीनसौ साठ बार प्रत्येक दिवस वह तेजकी नदीमें डुबकी मारा करता है । जब जब वह गोता मारता है जितनी बूँदें तेजकी उसकी शरीरसे गिरती हैं परमेश्वर उस प्रत्येक बूँदसे एक एक दूत उत्पन्न करता है । वे समस्त फ़रिश्ते जिबराईलकी प्रतिमूर्ति हैं । जिबराईलके आधीन रहते हैं । महाप्रलयपर्यन्त परमेश्वरकी प्रशंसा करते हुए उसीके शोचमें रहते हैं ।

जिबराईलके पांचसौ वर्ष उपरान्त परमेश्वरने इज़राईलको उत्पन्न किया । इज़राईलके उत्पन्न होनेके उपरान्त परमेश्वरने मृत्युको उत्पन्न किया । मृत्युका शरीर बहुत बड़ा पृथ्वीसे आकाशपर्यन्त था । बड़ाही भयानक था । जब पहले फ़रिश्तोंने मृत्युको देखा तो भयभीत होकर अचेत हो गए । सहस्र वर्षपर्यन्त चुपचाप