कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
अभ्यागतोंसे बात ट्रापर बातें, विलीयमका तोता तोता नामा बुलबुल
सृष्टिकी रचना होती है, इसीसे, परलय-प्रलय होता है, सुख-आनन्द और दुःख-कष्ट, इसीमें हैं, फिर वारंवार, आवै-जन्म लेते हैं, फिर-वारंवार, जाहि-मरते हैं ।
एकही ब्रह्माण्डके भीतर अनेक तरहके प्राणी अपने २ सुखके लिये आप प्रयत्न कर रहे हैं । उत्पत्ति, प्रलय, सुख, दुःख, जन्म और मरण सब इसीमें हैं ॥ १९ ॥
तेहि पाछे हम आइया, सत्य शब्दके हेत ॥
आदि अन्तकी उत्पत्ती, सो तुमसो कहिदेत ॥ २० ॥
तेहि-उसके, पीछे-पीछे, हम-मैं, सत्य-साचे, शब्दके-रामनामके, हेत-कारन, आइया-आये । आदि अन्तकी सर्व प्रथम रामनामके जगत् मुख अर्थसे संसारकी तथा रामनामके यथार्थ अर्थ जानकर साहिबके लोकमें गमन की । उत्पत्ति-प्राप्ति, जैसे हुए, सो-वही, तुमसों-तुमसे, कहि-कहे, देत-देत है ।
उद्धारके लिये दिये गये रामनामका उलटा अर्थ देखकर हमें भगवान्ने भेजा जिस तरह जगत् हुआ एवं जैसे हमारे बताये हुए अर्थका अनुसंधान करनेसे साहिबके लोकको चला जाना होता है यह सब बात हम तुमसे कहे देते हैं ॥ २० ॥
सात सुरति सब मूल है, प्रलयहु इनहीं माहि ।
इनहीं मासे उपजे, इनहीं माहि समाहि ॥ २१ ॥
सब-सबका, मूल-मुख्य कारन, सात सुरति-पहिले बताई हुई सात सुरति हैं, प्रलयहु-प्रलय भी, इनहीं-इन्हींके, माहि-भीतर है, इनहीं-इन्हींके, मासे-भीतरसे, उपजे-उत्पन्न होता है, इनहीं-इन्हींके, माहि-भीतर, समाहि-लय हो जाते हैं ।
दोनों इच्छाएं तथा पांचही सबके मूल कारण हैं इन्हींसे उत्पत्ति होती है एवम् प्रलय भी इन्हींमें हो जाता है ॥ २१ ॥
सोई ख्याल समरथ कर, रहे सो अछप छपाई ॥
सोई संधि लै आइया, सोवत जगहि जगाई ॥ २२ ॥
सोई-वही यह समष्टि जीवने, समरथ-अपनेको समर्थका, ख्याल-ध्यान, कर-कर लिया । सो-वे, अछप-न छिपनेवाले, इसकी दृष्टिसे, छपाइ-छिप, रहे-गये । सोई-उसी, सन्धि-बीचके, समाधानको, लै-लेकर, आइया-आया, सोवत-सोते हुए, जगहि-संसारको, जगाइ-जगानेके लिये ।
समष्टि जीवने अपनेको सब कुछ मान लिया इस कारण व्यापक राम इसकी दृष्टिसे ओझल हो गये । जिस सन्देहमें जीव पड़ गया है मैं उसीका
बुलबुलोंकी मानुषी वाचा चण्डूल और सांप
समाधानको लेकर मैं आया हूँ कि, संसारी प्राणियोंको असली अर्थ बता दूँ जिससे सबका उद्धार हो जाय ॥ २२ ॥
सात सुरतिके बाहिर, सोरह संखिके पार ॥
तहैं समरथको बैठका, हंसन केर अधार ॥ २३ ॥
सात-सातों, सुरतिके-सुरतियोंके, बाहिर-बाहिर, और सोरह-सोलह, संखिके-संख्यक कलाओंके, पार-किनारेपर, तहैं-वहाँ, समरथको-समर्थ श्रीराम भगवान्का, बैठका-बैठनेकी जगह है, वही हंसनकेर-हंसोंका, अधार-आधार है ।
जहां सातों सुरति नहीं पहुँच सकती, जहां सोलहों कलाओंकी कोई कहानी नहीं है वहां भगवान् राम विराजते हैं वही भगवान्के हंसोंका आधार है ॥ २३ ॥
घर घर हम सबसों कही, शब्द न सुनै हमार ॥
ते भवसागर डूबहीं, लख चौरासी धार ॥ २४ ॥
हम-हमने, सबसों-सभीसे, घर घर-घर घर जाकर, कही-कह दी, पर, हमार-हमारा, शब्द-रामनामका अर्थ कोई, न-नहीं, सुने-सुनता, ते-वे, लख चौरासी-चौरासी लाखकी, धार-धारावाले, भवसागर-संसार सागरमें, डूबहीं-डूबेंगे ।
हमने घरघर जाकर रामनामका असली अर्थ बताया है पर हमारे कहेंको कोई नहीं सुनता इस कारण न सुननेवाले अज्ञानी चौरासी लाख योनियोंकी धारवाले संसार सागरमें अवश्य डूबेंगे ॥ २४ ॥
मंगल उत्पत्ति आदिका, सुनियो संत सुजान ॥
कह कबीर गुरु जाग्रत, समरथका फुरमान ॥ २५ ॥
इति आदि मंगल ।
उत्पत्ति आदिका-उत्पत्तिकी आदिके, मङ्गल-मङ्गलको, ऐ सुजान-ज्ञानवान, सन्त-महात्माओ, सुनियो-सुन लीजिये । कबीर-कबीर साहिब, कह-कहते हैं कि, गुरु-सबके गुरु, जाग्रत-निभ्रान्त, समरथ-समर्थ श्री राम-चंद्रजीका, फुरमान-कहन है ।
कबीरसाहिब कहते हैं कि, हे ज्ञानवान महात्माओ ! मैं उत्पत्तिकी आदिके मंगलको कहता हूँ यह कोई मेरी ओरसे बना हुआ नहीं है किन्तु मायारहित सबके गुरु श्रीरामचन्द्रजी महाराजका ही यह कथन है वही मैंने आपको सुना दिया है ॥ २५ ॥
सार-भगवान् रामने जीवोंके उद्धारके लिये समष्टि जीवको चैतन्यता दी पीछे उसे उपदेश दिया कि, तुम रामनामका अर्थ समझ लो इसीसे मेरे हंसोंमें हो जाओगे मैं तुम्हारा उद्धार कर दूंगा । राम शब्दके 'र' का जानकी 'र'
विचित्र कर्तव्य
का श्रीराम, 'आ' का भरत, 'म्' का लक्ष्मण, 'अ' का शत्रुघ्न, हंस यह असली अर्थ है पर समष्टि जीवमें जो कारणरूपा इच्छा थी, उससे इसने इन नामका कुछका कुछ अर्थ समझा । 'र' का परा आद्या योगमाया, 'अ' का अक्षर, 'आ' का नारायण 'म्' का संकर्षण और 'अ' का महाविष्णु अर्थ समझा । यही समस्तकर यह संसारी हो गया । वास्तवमें असली अर्थोंके भ्रामिक अर्थ अंश हैं जो अंशीके रूपमें समझे जा रहे हैं । कारणरूपा अविद्याने इतनाही कार्य नहीं किया किन्तु चित्त मन बुद्धि तथा मैं ब्रह्म हूँ इस अहङ्कार को भी पैदा किया, इसी अहङ्कारने एकसे अनेक होनेकी इच्छा प्रकट की । इस तमास बखेड़में दो इच्छाएं काम कर रही हैं, पहिली तो कारणरूपा इच्छा जिसे कह चुके हैं, दूसरी योगमाया है इसीने संसारको रच दिया यही प्रकाशित कर रही है । मैं ब्रह्म हूँ उस अनुभवसे होने वाला ब्रह्म समष्टि जीवके श्वासके पैदा हुआ । उसीने अष्ट सिद्धियाँ तथा काली आदि आठ ईश्वरोंको उत्पन्न किया । सत्यपुरुषने उद्धारके पथका जगत् मुख अर्थ देखकर मुझे भेजा कि, रामनामका सन्ध्या अर्थ बताकर संसारका कल्याण करूँ मैं रामनामका सन्ध्या अर्थ समझाकर लोगोंका कल्याण करने आया हूँ जो मेरा कहना मान लेगा उसका उद्धार हो जायगा जो न मनेगा वो संसारमें भटकता फिरेगा ॥ ॥ इति आदि मङ्गल ॥
जीव हत्या और मांस मदिराका निषेध ।
निकृष्ट घृणित पदार्थोंसे मन लगानेवालेको कभी भी प्रकाशका मार्ग न मिलेगा । जिस प्रकार कालिससे जल काला हो जाता है उसी प्रकार घृणित पदार्थोंके ग्रहणसे अन्तःकरण अशुद्ध एवं शुद्ध पदार्थोंके खानेसे स्वच्छ और ज्ञानमय हो जाता है । जो लोग अपने अन्दर घृणित वस्तुओंको डालते हैं, उनके अन्तःकरणकी शुद्धि होनी असम्भव है, वे कभी भी सत्यगुरुके मार्गको नहीं पा
१ इस आदि मंगलमें कबीर साहिबके अवतार धारण करनेका प्रयोजन एवं कबीर दर्शन अत्यन्त सावधानीके साथ कहा गया है तथा इतना गूढ़ कि, कबीर साहिबके आज्ञाकारी हंस श्री विश्वनाथजी देव महाराज रीवाँकी टीकाके बारम्बार पथ्यालोचन करनेसे भी जलदी ध्यानमें नहीं आता इस कारण अनुवादकने इसका अर्थ साथही साथ कर दिया है ।
यद्यपि अनुवादक कबीर साहिब तथा साहिबके हंसोंकी वाणीको समझनेकी कोई शक्ति नहीं रखता पर यह इस तुच्छ हृदयमें उन्हींकी प्रेरणा हुई है जिससे उक्त अर्थ किया गया है । यदि कोई चूक हो तो भी भक्तजन केवल श्रद्धापर ध्यान देकर क्षमा कर देंगे । केवल इतनाही लक्ष्य है कि, कबीर साहिब के अक्षरों की और कबीर पन्थी तथा दूसरों भावुकों का पूरा ध्यान हो ।
समझदार चिड़िया थसकी बोली, मुर्ख सीना, बड़ी आवाबील सांप निकालनेवाली, रेल
सकते, न उनका मनही कभी निश्चल हो सकता है। मनुष्यके खाने पीनेके लिये जो शुद्ध पदार्थ नियत किये गये हैं, उनको खाने पीनेसे अन्तःकरण शुद्ध होता है। यद्यपि जड़ और चैतन्यमें एकही आत्मा है तो भी अङ्गुरजका भक्षण शुद्ध है। पाशुविक भोजनसे मन शुद्ध नहीं हो सकता पशु और मनुष्य दोनों भाई हैं, इस कारण, अपने भाईका मांस मत खाओ, भाईको मत मारो, उसका रक्त पात न करो, उसको दुःख देनेसे नरककी राह खुलेगी, सुख शांतिका मार्ग एकदम बन्द हो जावेगा; सत्यगुरु कभी कृपा भी न करेंगे।
मांस खाना और शराब पीना, अपने भाइयोंके रक्तपात करनेके बराबर है इसका बदला अवश्य देना पड़ेगा। जिस प्रकार मां, बहन, बेटो और स्त्री चारोंका रूप एकही है पर उनमें अपनी विवाहिता स्त्रीहीसे सम्भोग करनेकी आज्ञा है। दूसरीकी ओर दृष्टि उठाना भी महापाप है तब जो कोई अपनी विवाहिता स्त्रीके अतिरिक्त दूसरोंपर दृष्टि करेगा, वह अवश्य घोर नरकका वासी होगा। इसी तरह मनुष्यके खाने योग्य अंकुरज पदार्थ, भक्षण किये जाय तो अन्तःकरण अशुद्ध नहीं हो सकता। क्योंकि, वे मनुष्यके मुख्य भोजन हैं, भोजन किये बिना कोई जीवित नहीं रह सकता। इस कारण भोजनको कुछ चाहिये। अशुभ कर्मोंका फल अवश्य भोगना पड़ेगा, फल भोगे बिना छुटकारा नहीं हो सकता। कबीर साहिबने कहा है कि
साखी—कबीर कमाई आपनी, कभी न निषफल जाय।
सात समुन्दर आडा पड़े, मिले अगाऊं धाय ॥
संस्कृतके अनेक योग्य पुरुषोंके वचन है कि—“अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्” किये कर्म अवश्य भोगने पड़ेंगे चाहे सात समुद्र बीचमें आजाय पर भोग नहीं टाल सकता।
बदलेपर दृष्टान्त—एक अङ्ग्रेजी समाचार पत्रके १८७९ के दिसम्बरके परचेमें लिखा था कि, अमेरिका देशका एक कसाई बहुत बीमार पड़ा, समस्त शरीरमें सूइयां चुभानेके समान कष्ट, होने लगा वह बहुत कुराने लगा। कष्टके मारे बहुत दुःखी हुआ, पर प्राण न निकले, उसी दशामें उसने जिनका बध किया, था, उन जीवधारियोंकी बहुत भयानक स्वरूपसे अपना बदला लेने उपस्थित देखा। उनके भयानक दृश्यको देखकर बहुत भयभीत हुआ. अनुमानकर लिया कि जिन जीवधारियोंका मैंने बध किया है वह मुझसे बदला लेने आये हैं।
वह उनसे बचनेका उपाय शोचने लगा. पर कोई न सूझा, अन्तमें अपने कमाईके दो लाख रुपयोंके नोटोंको इस विचारसे जला दिया कि, यह मेरे
पफन, कासबीक, भुजंगा
पापकी कमाई है। यदि इनको छोड़ जाऊगा वा किसीको दे जाऊगा तो भोगने-वाला भी मेरेही समान कष्टमें पड़ेगा, उस समय उसका प्राण निकल गया ।
अभक्ष्यपर कबीर साहिब ।
अभक्ष्य निषिद्ध एवं घृणित पदार्थोंके विषयमें कबीर साहबकी अनगिनित साखिया तथा अनन्त शब्द प्रचलित हैं उनमेंसे थोड़ासा यहां भी लिख देता हूँ जिससे लोग जान जायें कि, कबीर जैसे निष्पक्षपातीभी इसको कितनी बुरी दृष्टिसे देखते थे ।
कबीर— मांस अहारी मानवा, प्रत्यक्ष राक्षस जानि ।
ताकी सङ्गति मति करो, होय भगतिमें हानि ॥ १ ॥
कबीर— मांस खायते ढेर सब, मद पिये ते नीच ।
कुलकी दुरमति परिहरै, राम भजेतेँ ऊँच ॥ २ ॥
कबीर— मांस मछरिया खात हैं, सुरापानसे हेत ।
ते नर नरकहिं जायंगे, माता पिता समेत ॥ ३ ॥
कबीर— मांस मछरिया खात हैं, सुरापानसे हेत ।
ते नर जड़से जायँगे, ज्यों मूलीका खेत ॥ ४ ॥
कबीर— मांस खाय अरु मद पिये, धन विपसा जो खाय ।
जुआ खेल चोरी करे, अन्त समूला जाय ॥ ५ ॥
कबीर— मांस मांस सब एकही, मछली हिरनी गाय ।
आँख देखि जो खात हैं, सो नर नरके जाय ॥ ६ ॥
कबीर— ब्राह्मण राजा चार वरणके, और कौम छत्तीस ।
रोटी ऊपर माछली, सभी वरण गये खीस ॥ ७ ॥
कबीर— कलियुग केरे ब्रह्मणा, मांस मछरिया खाँय ।
पाय लगे सुख मानही, राम कहे मर जाँय ॥ ८ ॥
कबीर— पाँव पुजावैं वैठिके, भखें मांस मद दौय ।
तिनकी दीक्षा मुक्ति नहीं, कोट नरक फल होय ॥ ९ ॥
कबीर— सकल वर्ण एकत्र है, शक्ति पूजि मिलि खाहिं ।
हरिदासनकी भ्रान्ति कर, केवल यमपुर जाहिं ॥ १० ॥
कबीर— विष्ठाकी चोका दिये, हांडी सीझे हाड़ ।
छूत बरावे चामकी, इनहुँका गुरु रौड़ ॥ ११ ॥
कबीर— जिव हिंसा किये, प्रगट पाप शिर होय ।
निगम पुण्य स्थाप ते, देखि न आया कोय ॥ १२ ॥
गोड स्क्रिउ, कुंज, इनी
कबीर— जीव नहीं हिंसा करे, प्रगट पाप शिर होय ।
पाप सभी सो देखिया, पुण्य न देखा कोय ॥ १३ ॥
कबीर— तिलभर मछली खायके, कोटि गऊ दे दान ।
काशी करवट ले मरे, तौ भी नरक निधान ॥ १४ ॥
कबीर— हँसा हो सोही हँसे, गावे जान खजान ।
कर गहि चोटा तानसी, साहबके दीवान ॥ १५ ॥
कबीर— काटा कूटी जे करें, ते पखण्डको भेस ।
निश्चय राम न जानि हैं, कहैं कबीर सँदेस ॥ १६ ॥
कबीर— बकरी पाती खात है, ताकी काढ़ी खाल ।
जो बकरीको खात है, तिनको कौन हवाल ॥ १७ ॥
कबीर— आठ वाट बकरी गई, मांस मुल्ला गा खाय ।
अजहूँ खाल खटिक घर, विहिश्त कहाँ को जाय ॥ १८ ॥
कबीर— अण्डा किन बिसमिल किया, घुन कीस किया हलाल ।
मछली किन जब्बह किया, सब खाने क्या ख्याल ॥ १९ ॥
कबीर— काजी तुझे करीमका, कब आया परमान ।
घट फोरा घर घर किया, साहब केर निशान ॥ २० ॥
कबीर— काजीका बेटा मुआ, उरमें साले पीर ।
वह साहब सबका पिता, भला न माने बीर ॥ २१ ॥
कबीर— पीर सबनकी एकसी, काजी जाने नाहि ।
अपना गला कटायके, विहिश्त बसे क्यों नाहि ? ॥ २२ ॥
कबीर— मुरगी मुल्लासे कहे, जबह करत हैं मोहि ।
साहब लेखा मांगसी, शङ्कट परेगा तोहि ॥ २३ ॥
कबीर— काजी जीहू स्वाद वश, जीव हनत हैं, आय ।
चढ़ि मसजिद एके कहैं, क्यों दरगह सच होय ॥ २४ ॥
कबीर— काजी मुल्ला मरमियां, चले दुनीके साथ ।
दिलसे दीन निवारिया, करद लयी जब हाथ ॥ २५ ॥
कबीर— काला मुंह कर करदका, दिलसे दुई निवार ।
सब सूरत सुभानकी, अहमक मुल्ला मार ॥ २६ ॥
कबीर— जोर कर जो जबह करे, मुँहसे कहे हलाल ।
साहब लेखा मांगसी, तब होई कौन हवाल ॥ २७ ॥
कबीर— जोर किया सो जुलुम है, माँगे जबाब खुदाय ।
हजार दास्तान बुलबुल
खालिक दर खूनी खड़ा, मार मुंहे मुंह खाय ॥ २८ ॥
कबीर— गला काटि कलमा पढे, किया है कहै हलाल ।
साहब लेखा मांगिहै, तब हो कौन हवाल ॥ २९ ॥
कबीर— गला गुस्सेका काटिये, मियां कहको मार ।
जो पांचोंको बस करे, तो पावे दीदार ॥ ३० ॥
कबीर— यह सब झूठी बन्दगी, बेरिया पांच निमाज ।
सांचे मारे मुंहपर, काजी करै अकाज ॥ ३१ ॥
कबीर— दिनको रोजा धरत हैं, रातको हनत है गाय ।
यह खून वह बन्दगी, क्योंकर खुशी खुदाय ॥ ३२ ॥
कबीर— चाला जाय था, आगे मिले खुदाय ।
मारो तुझसे किन कही, किन फरमाई गाय ॥ ३३ ॥
कबीर— शेख सबूरी बाहिरा, हाँका यमपुर जाय ।
जिनका दिल साबित नहीं, तिनको कहाँ खुदाय ॥ ३४ ॥
कबीर— तेई पीर हैं, जो जाने पर पीर ।
जो पर पीर न जानहीं, ते काफिर बेपीर ॥ ३५ ॥
कबीर— खूब खाना है खीचड़ी, जामें अमृत लोन ।
मांस पराई खायके, गला कटावे कौन ॥ ३६ ॥
कबीर— कहता हूँ कह जात हूँ, कहा जो मान हमार ।
जिसका गला तु काटि है, सो फिर काटि तुम्हार ॥ ३७ ॥
कबीर— हिन्दूके दाय़ा नहीं, मेहर तुर्कको नाहिं ।
कह कबीर दोनों गये, लख चौरासी मांहि ॥ ३८ ॥
कबीर— मुसलमान मारे करदते, हिन्दू मारे तलवार ।
कहें कबीर दोनों मिले, जैहें यमके द्वार ॥ ३९ ॥
तात्पर्य—कबीर साहब चारों युगसे पुकारते आये हैं कि, हिंसा मत करो, मांस न खाओ, अभक्ष्य पदार्थोंको न खाओ, शराब न पियो, मादक पदार्थोंका सेवन न करो, यह सब महान् पाप हैं, इनका बदला न छूटेगा । महान् कष्टमय अधम अवस्थाकी प्राप्ति ही इनका फल है । इनसे अलग रहनेसेही तुमसे योग्य कर्म हो सकेंगे ।
इस विषयमें कबीर साहबकी बहुत वाणी है, मनुष्य पशु इत्यादि किसी प्रकारके प्राणधारीको दुःख देना, मारना पापके महान् परिणामको प्राप्त कराने-
जेकड़ा जे डेडुबर्ड, अनल पंख किंगा फिसर
वाला है। भक्ति मुक्ति चाहते हो तो जीवहत्या और घृणित पदार्थोंका त्याग कर दो, जो मान लेगा वह सुखी होगा जो न मानेगा दुःख पायेगा।
नज्रम—रहीमो खुदाबन्द रहमा वही। जुल्म जन्न न जिसके नफरमाँदही
सिफतसारी है उसकीही शानमें। जिसे देखिये इल्म उरफानमें ॥
मद्य मांसके निषेधमें कबीर साहिबकी आज्ञा लिखी है कि, वे इनके खानेवालोंको नर्कका पथिक बताते हैं।
वेद।
अब वेद शास्त्रको सुनो। वे भी स्वसंवेदके समानही मांस मदिरा आदि अभक्ष्यका ग्रहण तथा किसीके दुःख देनेको महापाप बतलाते हैं।
अथर्व—“अस्तितु तस्माद् ओ जीयो यद् विहव्ये न ईजिरे।” जीवहत्याके कर्म गन्दे हैं उनका उत्तम फल नहीं। बोही भगवान्की उपासना सर्वश्रेष्ठ है जिसमें जीवहत्या नहीं होती। “मुग्धा देवा उत शुना यजन्त उत गो रङ्गैः पुरुधा यजन्त” वे एक तरहके पागल हैं जो कुत्ते जैसे निकृष्ट प्राणियोंतकके मांसको भी नहीं छोड़ते तथा गऊओंके अङ्गोंको काट काटकर खाने खिलानेसे परमात्माको प्रसन्न हुआ मानते हैं। वो मार्ग उनके कल्याणका नहीं है, किन्तु नरक देनेवाला है। कोई कोई यह कहते हैं कि, यज्ञ आदिमें की गई हिंसा हत्या नहीं है, बाकी सब हत्याएं हैं। यदि विचार करके देखा जाय तो इसमें भी कोई सार नहीं है। क्योंकि, अथर्व वेदमें लिखा हुआ है कि, ‘इष्टापूर्तस्य व्यभजन्त यमस्य अभी षोडशं सभापदः’ यदि यज्ञ आदिमें भी हत्या करोगे तो तुमें पुण्य यज्ञका मिलनेवाला था उसमें सोलहवें हिस्सेका पाप भी भोगना पड़ेगा। स्वर्गके अमृत कुण्डोंमें स्नान करनेवालोंको अपनी जीव हत्याके पापोंके कारण भयंकर आगकी तपिस भी सहनी पड़ेगी इससे यह बात सिद्ध होजाती है कि, वेद हत्यामें कभी भी पुण्य नहीं मानता, यज्ञके नामकी हत्यामें भी पाप होता है पुण्य नहीं होता।
ऋग्वेद—स्तोमास स्त्वा विचारिणि, प्रतिष्ठोभन्त्यक्तुभिः।
प्रयावाजं न हेषन्तं पेरुमस्यस्यर्जुनि ॥
अर्थ—जो कोई मांस खाता है वह नरकी होता है सर्वदा दुःखमें पड़ा रहता है उसका देखना भी महा पाप है इस तरहके पापियोंके दर्शन करना ही महापाप है बहुत अच्छा हो कि, ऐसे पापी नारकी स्थानोंमें ही पड़ा रहें।
वेदमें एक स्थलमें लिखा है कि—घास चौपायोंके लिये बनाया गया है, और अनाज मनुष्योंके लिये है जैसे स्त्री पुरुषके लिये वैसेही पशु पशुके लिये हैं। मानुषी स्त्री पशुके लिये नहीं है, उसी प्रकार मांस मनुष्यके लिये नहीं है।
मृत्युकी सूचना देनेवाली, विशेष वक्तव्य
पुरुष सूक्त—यजुर्वेद पुरुष सूक्त उपनिषद पद्धो, लिखा है सर्व जीवधारी उस विराट् पुरुषके हाड़ चाम और मांस हैं, इस कारण मांस खानेवाले विराट् पुरुषके शत्रु हैं। क्योंकि, वे जीवधारियोंके ही मांसोंको खाते हैं। जो विराट् पुरुषके केशोंको खाते हैं वे उसके शत्रु नहीं हैं, क्योंकि बालोंको तोड़ने काटनेसे किसीको दुःख नहीं होता, किन्तु किसी अशमं सुखही होता है।
सूत्र—मद्यं न पिबेत् मांसं न भक्षयेत् असत्यं न वदेत् परदारान् न स्पृशेत् ॥
अर्थ—मदिरा मत पीओ मांस मत खाओ। झूठ मत बोलो। व्यभिचार न करो।
यज्जीर्वाहिंसायामनुवर्तते तस्य जीवस्य नरकं क्रीडते ॥
अर्थ—जो कोई जीर्वाहिंसाका विचार करता है, वह जरूर नर्कमें जाता है और नाना प्रकारके कष्टोंको प्राप्त होता है।
अहिंसाके विषयमें सर्व वैष्णव लोग और कबीर साहब सहमत हैं। जैन और बौद्धधर्म लोग तो अहिंसाको अपना परमधर्मही समझते हैं पातञ्जलिकी भी यही आज्ञा है। मीमांसा और न्याय भी यही कहता है।
ऊपर जो प्रमाण दिये थे वेद सूत्रादिकोंके थे उनमें परिष्कृत रूपसे जीव हिंसाका निषेध किया गया है, एवं इन कामोंके करनेवालोंको नरककी प्राप्ति बताई है तथा मनुष्यको क्या खाना चाहिये यह भी बता दिया है। अब स्मृतियों तथा ऋषीश्वरोंके वचन दिखाते हैं कि, स्मृतिकारोंने भी इसका निषेध किया है।
ऋषीश्वरोंके वचन ।
ब्रह्मा—ये भक्षयन्ति मांसानि सत्त्वानां जीवितैषिणाम् ।
तैदंयो भक्षितैः सर्वैरिति ब्रह्मात्रवीदृञ्ज ॥
अर्थ—जो जीव जीवनेकी इच्छावाले हैं उनके मांसको जो भक्षण करते हैं वे जीव भी परलोकमें अपने मांसके खानेवालोंके मांसको खाते हैं अर्थात् जो किसीका मांस खावेगा वह दूसरे जन्ममें अवश्य बदला देगा।
अहिंसा परमो धर्मः यतो धर्मस्ततो जयः ।
परम धर्महां अहिंसा है जहां यह अहिंसारूप है वहां अवश्यही जय होती है।
नारद—स्वमांसं परमांसेन यो वद्वयितुभिच्छति ।
नारदः प्राह धर्मात्मा नारकैः सह पच्यते ॥
अर्थ—जो कोई दूसरेके मांसको खाकर अपना मांस बढ़ाया चाहता है वह नरकमें अवश्य पड़ेगा।
मक्खियाँ, मक्खियों पर विश्व डाक्टर वाटयार्वी तथा फ्रानसिस हिउबर
व्यास—योऽहिंसकानि भूतानि हिनस्त्यात्मसुखेच्छया ।
कृष्णद्वैपायनः प्राह स्थावरत्वं स गच्छति ॥
अर्थ—जो अहिंसक पशु हिरन, शशा आदि इनको कोई अपने खानेके हेतु मारता है वह स्थावर योनिमें जावेगा ।
बृहस्पति—सन्तप्यते ततोऽजसं भजते च ददाति सः ।
मधुमांसनिवृत्तो यः प्रोवाचेदं बृहस्पतिः ॥
अर्थ—जो आदमी मांस नहीं खाता, वह सर्वदा तप करता है यज्ञ और दान भी करता रहता है ।
वसिष्ठ—यावज्जीवति यो मांसं विषवत्परिवर्ज्यं येत् ।
वसिष्ठो भगवानाह स्वर्गलोकं स गच्छति ॥
अर्थ—आदमी जबतक जीवे तबतक मांस न खावे, विष जान कर त्याग दे. उसको स्वर्गकी प्राप्ति अवश्य होगी ।
जमदग्नि—यो भक्षयित्वा मांसानि स्वतश्चापि निवर्तते ।
जमदग्निर्महाहैनं सोऽपि स्वर्गमवाप्नुयात् ॥
अथ—जो कोई मांस खाता हुआ स्वयं विचार कर अथवा किसीके कहनेसे मांस भक्षण छोड़ दे मृत्यु पर्यन्त न खावे, वह अवश्य स्वर्गको जावेगा ।
शुक्र—रूपमारोग्यमैश्वर्यं कान्तिं स्वर्यानमेव च ॥
प्राप्नोत्यहिंसः पुरुषः प्राहैवमुशना मुनिः ॥
अर्थ—जो हिंसा नहीं करता वह संसारमें सुन्दरता, लक्ष्मी, आरोग्यता, विद्या आदि शुभ गुणोंसे सम्पन्न होता है, मृत्युके बाद स्वर्गको जाता है ।
पराशर—सुवर्णदानं गोदानं भूमिदानं तथैव च ।
नोत्तमं प्राणदानाच्छ पराशरवचो यथा ॥
अर्थ—सोनादान, पृथिवीदान, गोदान ये सब श्रेष्ठ दान हैं, पर “जीवको न मारकर उसे प्राणदान देना” सबोंमें उत्कृष्ट है । यह पराशरजीका वचन है ।
इसी बातपर मार्कण्डेयजीकी भी साक्षी है —
स्वयंभू मनु—कर्मणा मनसा वाचा यो हंति न हि कश्चन ।
स मित्रं सर्वभूतानां मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥
अर्थ—जो कर्मसे, मनसे और वाणीसे किसी प्रकार हिंसा नहीं करता, वह सब प्राणियोंका मित्र कहलाता है ।
हत्याके दोषी—हन्ता' चैवनुमन्ता' च विश्वस्ता' 'कयविक्रयी' ।
संस्कर्ता' चोपहन्ता च खादकश्चाष्ट' घातकाः ॥
धनेन क्रियको हन्ति द्युभोगेन च खादकः ।
घातको वधबन्धाभ्यामित्येवं भवि धेनुषः ॥
अर्थ—'मारनेवाला, 'मारनेका विचार करनेवाला, मारनेकी 'सम्मती देनेवाला, मांसका' बेचनेवाला, मांसका' मौल लेनेवाला, मांसको' पकानेवाला पकेहुये मांसका' परोसनेवाला, और मांसका' खानेवाला ये आठ घातक हैं ।
विशेष, करके हिंसा तीन प्रकारसे होती है । १—जो मांस मौल लेता है । वह तो दाम देकर जीवोंको मराता है क्योंकि, यदि मौल लेनेवाला न होता तो जीव न मारे जाय इससे मौल लेनेवाला पूरा पापी है । २—खानेवाला, खानेके स्वादके लिये मारता है, यदि वह न चाहे न मांसको खावे तो, जीव हत्या कौन करे ? । ३—हत्यारे वह हैं जो स्वयं जीवधारीको बाँधकर अथवा हथियारसे मारते हैं, सब भी एकही बात है, चोर और चोरके साथी न्यायमें तुल्यही है ।
जैसे स्वयंभू मनु कइयोंको हत्याका दोषी बताया है उसी तरह कबीर साहिबने भी अपनी साखीमें कई दोषी बनाये हैं कि—
आठ बाट बकरी गई मांस मुल्ला गयो खाय ।
अजहूँ खाल खटीकघर, विहिश्त कहो क्या जाय ॥
बकरी उपरोक्त आठ राहमें गई, उसका मांस मुल्ला खा गया अब तक उसकी खाल खटीकके घर है । वह खटीक निरञ्जन है उसीके हाथ उसकी खाल है, उसके कर्म तो उसके घरही है जिस मारनेवालेको बकरीकी योनिमें आवागमन अवश्य होगा तो बकरीके मारनेवाली विहिश्त क्योंकर जायगी, अपने कर्म के बीजसे फिर फिर देह धरेगा, जबतक उसकी खाल खटीकके घर रहेगी तबतक उनका विहिश्त प्राप्त न होगा । मारनेवालोंको वह खाल ओढ़नी पड़ेगी ।
मांस त्यागका फल ।
शाकमूलफलैर्मध्येः योवाऽदन्नेव भोजनम् ।
न तत्फलमवाप्नोति यन्मांसपरिवर्ज्जनात् ॥
अर्थ—उपवास तथा शाक, कन्द, मूल, फल आदि भक्षोंके खानेसे इतना फल नहीं मिलता, जितना कि, मांसको छोड़ देनेसे होता है ।
मधु मांसं च ये नित्यं वर्ज्जयन्तीह मानवाः ।
जन्म प्रभृति मद्यं च सर्वं ते मुनयः स्मृताः ॥
अर्थ—जो लोग मांस और मदिरासे आयु भर बचे रहते हैं; वे साधुओंके तुल्य हैं। अवश्यही सद्गतिको पावेंगे ।
मधु मक्खियोंकी तीन जातियाँ हिउबर
शतं समा यः पुरुषः तपस्तेषु सुदारुणम् ।
न भक्षयन्ति ये मांसं सममेतदुदाहृतम् ।
अर्थ—जो सौ वर्ष अथवा उससे भी अधिक तपस्या करे, दूसरा मांसका निरंतर त्यागी ही दोनोंका एक समान फल है ।
यथा हृस्तिपदे यानि पदानि पदगामिनः ।
सर्वे धर्मास्त्वहिंसायां प्रविशन्ति तथा ध्रुवम् ॥ १ ॥
सर्ववेदाधिगमनं सर्वतीर्थविगाहनम् ।
सर्वयज्ञफलं चैव नैव तुल्यमहिंसया ॥ २ ॥
अहिंसा परमो यज्ञो अहिंसा परमं तपः ।
अहिंसा परमाक्षय्यमहिंसो यजते सदा ॥ ३ ॥
अहिंसा सर्वलोकस्य यथा माता पिता तथा ।
स्वमांसात्परमांसानि परिपाल्य दिवं गतः ॥ ४ ॥
तमेव परमं धर्ममहिंसां संप्रचक्षते ।
एवं परो महात्मा यो विष्णुलोकं स गच्छति ॥ ५ ॥
अर्थ—जैसे सब जीवधारियोंके पग हाथीके पगमें आजाते हैं उसी प्रकार अहिंसामें सर्वे धर्म समा जाते हैं ॥ १ ॥ अहिंसा अर्थात् किसी भी जीवधारियोंको दुःख न देना ही वेद पाठ है, तीर्थटन है, सर्वे यज्ञ, है, जीवधारियोंकी रक्षाके तुल्य कोई धर्म नहीं है ॥ २ ॥ अहिंसा परम यज्ञ है, जो हिंसा नहीं करता है वह यज्ञ और तप करता है ॥ ३ ॥ जो कोई जीव हिंसा नहीं करता, वह सबका ऐसा प्यारा होता है जैसे कि, माता पिता । जो अपने प्राणका लालच छोड़कर, अपना मांस देकर बच्चेकी जान बचाते हैं ऐसे परोपकारी लोग स्वर्ग जाते हैं ॥ ४ ॥ जिसमें जीव हिंसा न हो वही धर्म बड़ा है जो लोग इस धर्मको धारण करते हैं वे महात्मा लोग विष्णु लोकको चले जायेंगे ।
जग जाओ ।
आकाश और विष्णु सत्तोगुण रूप हैं, पृथिवी, और ब्रह्मा रजोगुण रूप हैं, पाताल और शिव तमोगुण रूप हैं । फारसीमें इनको तमीज शहवत और गजब कहते हैं । जो कोई सत्तोगुणका आश्रय करता है वह देवता है, जिसमें सत्तोगुण और रजोगुण हो वह मनुष्य है, जिसमें रजोगुण और तमोगुण हो वह राक्षस तथा नारकी जीव है, सत्तोगुण ऊपरको रजोगुण पृथिवीमें और तमोगुण नरकमें डालेगा । मांस खाना तमोगुणी है, अवश्य नरक ले जावेगा जीवकी जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति ये तीन अवस्था हैं, जाग्रत अवस्था मनुष्यकी, स्वप्न पशुकी
जलचर
और जड़ स्थावरकी सुषुप्ति है । सतोगुणी मनुष्य विवेकके लिये बनाया गया है, मनुष्योंका मुख्य लक्षण सारासार विवेक ही है । यदि विवेक न करे तो मनुष्य नहीं कहाया जा सकता, मांस खाना पूर्ण अविवेकका लक्षण है, मांस खानेवाला मनुष्य कैसे कहला सकता है ? जो पाप जानकर करता है वह विष खाता है वह अधिक दण्डका भागी होता है । स्वप्नमें सहस्रों प्रकारके पाप होते हैं पर उसका कुछ हिसाब नहीं होता, सुषुप्तिमें तो भले बुरेका ज्ञानही नहीं होता. वहां हिसाब किताब की बात ही क्या है. जो तुरियामें हैं वे ज्ञानी हैं वे तो विधि निषेधसे मुक्त शुभ कर्मके स्वरूपही हैं, पर मनुष्य जबतक जाग्रत अवस्थाको पूर्ण रीतिसे धारण न करे, तबतक तुरिया अवस्थाको नहीं प्राप्त कर सकता । इसी कारण जाग्रत अवस्था दीपक है । मनुष्य शरीर पाता है, सूर्य्यके समान प्रकाशमान होता है । आँखवालोंको प्रकाशमें भी अन्धोंके समान व्यवहार करना उचित नहीं, प्रकाशमें भलीप्राकर सब पदार्थ देखे जाते हैं, देख करके चलना सार्थक है, जाग्रत अवस्थाहीमें भजन हो सकता है । इसपर कबीर साहबका वचन है कि,
शब्द—जाग अब भी भोर बन्द, जाग अब भव भोर ॥ टेक ॥
है अल्लाल तो यार हमारा, सर्व जनका नाम अधारा ।
काया मसजिद खूब सँवारा, दुई खम्भ दश लगे किवारा ॥
उसमें पढ़ले बाज़ू निमाजा, हर दम हर दम हर दम साजा ।
पांचों पीर बसें एक थाना, घटमें अनहद हने निशाना ॥
पांच पीरकी करले खोजा, तब तालीम तोर तीसो रोजा ।
लैलाऊँ पल नाहिं विसाहूँ, घड़ि घड़ि चितवन दृष्टि पसाहूँ ॥
ज्ञान छुरी महरम गढ़ पकड़े, तब वस करले पांचो बकरे ।
कहे कबीर मैं हरिगुण गाऊँ, हिन्दू तुर्क दोऊ समुझाऊँ ॥
यथा—जाग अब भव भोर बन्द, जाग अब भव भोर ॥ टेक ॥
बहुत सोवे जन्म खोवे, कोई न होगा तोर ॥ जा० ॥
काम क्रोध लोभ तृष्णा, बांधली भर झोर ।
बहुत सोये जाग देखो, दशो द्वार शोर ॥ जा० ॥
पकड़के यम कैद करिहैं, जाव कौन ओर ।
जठराग्निके जोरमें, जिन रक्षा कीन्ही तोर ॥ जा० ॥
एक घड़ी हरनाम न लीन्हों, बड़ा हुरामी खोर ।
कहे कबीर अब क्यों न जागो, जब घर २ मूसे चोर ॥ जा० ॥
तात्पर्य—सत्यगुरु कहते हैं कि, ऐ मनुष्यों ! तुम बहुत सोये, अब जागो.
घडियाल बिल्वी और लोमड़ी घरेला घडियाल, मानुषी भोगी आगस्तसका मछलियोंसे शकुन
क्योंकि, यह मनुष्यका चोला चौरासी लाख योनिरूप रात्रिके प्रभातके समान है। अब क्यों सोते हो? चौरासी लाख शरीरमें तो सोतेही थे, अब तो बहुत सो चुके हानी दुःख बहुत उठा चुके, अब दुःख और हानियोंके निवारणका समय आया है। पर इस मनुष्यत्वरूपी धनको चुरानेवाले ठग और चोर भी तो बहुत पीछे लगे हुये हैं। जाग्रत होकर अपने धनकी रक्षा न करोगे तो दिन धाडे चोर डाकू डाँका मारकर ले जायेंगे। जीव दरिद्र होता है, पर इस शरीरमें तुम्हारे साथ अनन्त अमूल्य धन है, जिसके चुरानेके लिये चोरोंने पीछा किया है। यदि उनसे सचेत न रहोगे तो फिर कहीं ठिकाना न लगेगा, चौरासी लाख योनिरूप द्वारोंमें मँगलोंके समान भटकते फिरोगे, पर कुछ न पा सकोगे।"
हिंसा पुण्य नहीं — वेद जीवदयाको बहुत प्रकारसे वर्णन करता है, सहस्रों श्रुतियाँ अहिंसाकी स्तुतिमें पाई जाती हैं। अहिंसाके तुल्य दूसरा कोई धर्म नहीं माना है। यद्यपि नरमेध, अश्वमेध, गोमेध, अजामेध इत्यादि यज्ञोंकी विधियाँ भी लिखी हुई मिलती हैं, उत्पत्ति कालसे इनका प्रचार चला आता है, यद्यपि इस समय बहुत कम हो गया है क्योंकि, उन यज्ञोंके माननेवालोंमें द्रव्यका पूर्ण अभाव हो रहा है इस कारण कोई भी वेदानुसार यज्ञ नहीं कर सकता पर वेदोंने हिंसाको निष्पाप कभी नहीं बताया जो हिंसामें पाप नहीं मानते यह उनकी भूल है। अब यज्ञादिक विधानके विरुद्ध नाना प्रकारकी हिंसा और बलिदानकी परिपाटी चल पड़ी है। सर्वहिंसा महाघोर नरकको ले जानेवाली है।
इस बातपर लोगोंका कुछ भी ध्यान नहीं कि, वेद अहिंसा बतलाता है तो फिर हिंसा बतलानेकी क्या आवश्यकता है? हिंसा और अहिंसा दोनों एक साथ नहीं हो सकती। जीवहत्या करता है तो दया कहाँ? जहां दया है वहां जीवोंको दुःख देना कहाँ? यह कौसी धोखेबाजी है यह छल किसने किया, किस कारण ऐसा कपट किया गया। इसका कारण स्वसंवेद पढ़े बिना कोई नहीं जान सकता। सर्व श्राह्यण, साधू, ऋषि-मुनि, जो उस हिंसाके पक्षमें हैं, वे सब छल और धोकेसे भरे पड़े हैं, आप नष्ट होते हैं दूसरोंको भी नष्ट कर रहे हैं। जबतक पारख गुरु न मिलें तबतक इस कपट जालसे छूट नहीं सकता।
जिस ठगने सर्व आचार्य ऋषि मुनि आदिको उत्पत्तिके दिन ठगा वह अब भी मौजूद है। जो कोई इसको पहचानेगा अलग हो जावेगा धोखेसे बचता रहेगा वही मनुष्य है उसीकी मुक्ति हो सकती है उसके बिना सबको बंधनमेंही रहना पड़ेगा।
परवाली शैलानी, ऐङ्गलर फिश
पश्चिमकी पुस्तकें ।
मूसाकी पुस्तक — खून मत करो । तौरीतकी आज्ञा है कि, खून मत करो ।
समीक्षा — अब विचार करना चाहिये, जिसमें खून हो उसका खून न करना यदि ऐसी आज्ञा मिली तो इससे साबित हुआ कि खूनवालेके अतिरिक्त जिसमें कि, खून नहीं है उन्हें प्रयोगमें ला सकते हो जैसे साग, पात, फल फूल इत्यादि इससे उसके खानेकी आज्ञा साबित होती है रक्तवाले जितने जीवधारी हैं सब परस्परमें भाई हैं जो रक्तवाले नहीं हैं उनके बारेमें कोई ऐसा नहीं कहता कि, इनका खून मत करो क्योंकि, उनकी उत्पत्ति वीर्यसे नहीं, न उनमें लोहही है, उनकी उत्पत्ति मिट्टी और पानीसे है । इसीलिये वे सब मनुष्यके भक्ष्य हैं पर जो रक्तवाले हैं वे चाहे कहींसे हुए हों मनुष्यको न तो मारने चाहिये न खानेही चाहिये ।
मूसाके धर्मका नियम तो यही हुआ था कि, “खून मत करो” फिर कुर्बानीका प्रचारक उसे नहीं माना जा सकता ।
कुर्बानीके प्रचारक ।
सोखतनी कुर्बानी, खताकी कुर्बानी और इन्सानकी कुर्बानी करनेको किसने कहा । नूहने सोखतनी कुर्बानीकी पीछे दूसरोंने इब्राहीमको इन्सानकी कुर्बानी मनुष्यको बधकी आज्ञा हुई पर दया करके क्षमा कर दिया । इनका खुदा सर्वदास कुर्बानियोंका आदी है । पहिले कहता है कि खून मत करो, पीछे धोखा देकर कुर्बानी कराता है । इसके कपट जालसे हंस कबीरके सिवा दूसरा कोई नहीं बच सकता । प्रलयके पीछे नूह पृथिवीपर उतरा उसने पशुओंको जलाकर सोखतनी कुर्बानी की उसके सृष्टनेके वास्ते खुदा आसमानसे उतरा जलते हुये पशुओंकी सुगन्धी (दुर्गन्धि) को सृष्टकर खुश हुआ नूहको बरकत दी ।
समीक्षा — विचारवान् न्यायी लोग विचार करें कि, जब हाड, चाम, मांस, लोह जलता है तो सुगन्धी आती है अथवा दुर्गन्धी आती है । उसमें तो इतनी दुर्गन्धी आती है कि, उसको मनुष्य किसी प्रकार सहन नहीं कर सकता । ऐसी घृणित दुर्गन्धीको सुगन्धी जानकर सृष्टता एवं उससे प्रसन्न होता है, उस खुदासे ईश्वर रक्षा करे यह तो राक्षसोंके भी बाबा निकले । जिस धोखेमें इक्के दुक्के भारतवासी पड़े हैं उसी धोखेमें पश्चिम देशवाले भी पड़े हुए हैं । इसपर किसीने विचार किया है कि, हमारे धर्मकी जड़ अहिंसा है । हिंसा कभी भी धर्म नहीं हो सकता ।
खुदाने आदमको अपने रूपमें बनाया । तौरीतमें पेंदाइशकी किताबका
धोखेसे बचानेवाली
पहिला बाब (२७-२८) आयत तक देखो फिर कुरान मजीदकी गवाही देख लो कि, जानना चाहिये कि, खुदा जागृत है इसलिये मनुष्यके लिये भी जागृत (विवेकी) होना चाहिये। जो जागृत नहीं वह मनुष्य ही नहीं, जागृतके लिये बनाया गया यदि स्वप्नका काम करे तो वह कैसे मनुष्य कहा जा सकता है। अविवेकतासे उसको वह प्रकाश कदापि नहीं मिल सकता, जिसके द्वारा उत्कण्ठ पद प्राप्त हो सकता है।
दूसरी पुस्तक जबूर।
दाऊदका जबूर सरदार मुगनीके लिये ४ बाबकी ६ आयतमें देखो। जबीहा और हदीयाको तू नहीं चाहता, तूने मेरी खोलें चढ़ा दी तू खतीबका तालिब नहीं।
आसिफका जबूर ५० बाब, १३-से १५ आयत तक देखो - खुदा कहता है कि, क्या मैं बैलोंका मांस खाता हूँ? या बकरीका लोहू पीता हूँ? तू धन्यवादका बलिदान कर उसीको परमात्माके आगे भेंट चढ़ा।
आशिफकी जम्बूरका ५० वां बाब २३ आयतमें लिखा है कि, जो कोई धन्यवादका बलिदान चढ़ता है, मेरा प्रकाश प्रकट करता है उसको जो अपनी बोल चाल दुरस्त रखता है उसे खुदाकी निजात दिखलाऊंगा।
दाऊदका जबूर सरदार मुगनीके लिये ५१ बाब-१५ से १६ आयत तक लिखा है कि, ऐ खुदाबन्द! तू मेरी लबोंको खोल दे तो मेरा मुंह धन्यवाद करेगा। कहेगा कि, तू जीवहत्याके बलिदानसे खुश नहीं। नहीं तो मैं तेरी खुशनुदी देता नहीं! खुदाका बलिदान टूटा हुआ मन है। टूटा हुआ मन; ऐ खुदा! तू तुच्छ न जानेगा।
दाऊद गीत १०४ - तेरे कामका फल जो है उससे पृथ्वी आसूदः यानी (भरी हुई है)। चारपायोंके लिये घास और मनुष्योंके लिये शीक है।
दाऊद गीत मजमूर (५१) ऐ खुदा! तू खूनसे मुझे बचा ले मेरी सलामतीके लिये मेरी जबान तेरे रहमकी धन्यवाद करेगी। कुर्बानीसे तू राजी नहीं, न तो वह चढ़ाऊँ। कुर्बानीसे मालिक जरा भी खुश नहीं है।
दाऊद गीत मजमूर-४० देख। जबह और कुर्बानीसे तू रजामन्द नहीं था, एक जिस्म (शरीर) पाकको तूहीने मेरे वास्ते रखवा था, जब बशरसे कुर्बानी नहीं चाही बिलकुल।
जो कुछ मैंने पिछले प्रमाणमें लिखा, वही बात मूसाकी शरीअत और तौरतकी हुई, पैमाइशके १ बाब २९ से ४० आयत तक खुदाने कहा कि, प्रत्येक
पशु पक्षीके रूपमें ऋषिगण पशु पक्षी आदिका भजन
बीज और नवातात जो तमाम जमीनपर है हर एक दरख्तको जिसमें बीजदार फल है देता हूँ । यह तुम्हारे खानेके लिये होगा (६००) जमीनके सब चरनेवाले और आकाशके उड़नेवाले पक्षियोंको जो कि, पृथिवीपर रहते हैं जिनमें जिन्दगी का दम है, सबजी उनके खानेके लिये सब तरहकी देता हूँ और ऐसाही होगा ।
एसियाह नबीकी किताबका ६६ बाब १०५ आयत तक-खुदावन्द फरमाता है कि, आसमान मेरा तख्त है जमीन मेरे पांवकी चौकी है, वह घर कहाँ है जो मेरे वास्ते बनाते हो मेरा आरामगाह कहाँ हैं, ये सब चीजें तो मेरे हाथने बनाई यह सब मौजूद हैं ।
खुदावन्द कहता है लेकिन मैं उस मनुष्यपर निगाह कलूंगा जो गरीब और टूटा दिल है, जो मेरे वचनसे काँप जाता है । वह जो एक बैल जबह करता है, उसके समान है जिसने एक आदमीको मार डाला वह जो बकरा कुरबानी करता है, उसके समान है, जिसने एक कुत्तेका शिर काटा । जो बलिदान चढ़ाता है वह उसके समान है जिसने शूकरका लोह चढ़ाया हो । लोबानका जलानेवाला उसके समान है जिसने एक पत्थरकी मूर्तिको मुबारक कहा है । हां ! उन्होंने अपनी राहें पसन्द कीं ।
अमूस नबीका ६ बाब ३ आयतमें लिखा है । अफसोस है उन लोगोंपर अपनेसे जो बुरा दिन दूर किया चाहते हैं, अपने पास जुल्मकी चौकीको खींचते हैं । वे जो हाथीदांतके पलंगपर लेटते हैं, अपनी अपनी चारपाइयोंपर फँल २ के सोते हैं गल्लेके थानमेंसे बछरों और बकरोंको निकाल निकाल कर खाते हैं रब्बाब आवाजके साथ गाते हैं, दाऊदकी तरह अपने अपने बजानेके लिये नये नये बाजे ईजाद करते हैं, प्यालोंमेंसे शराब पीते हैं, अपने बदनपर खालिस अतर मलते हैं, लेकिन युसफके शिकस्ता हालीके लिये शोक नहीं करते ।
इंजीलका कथन-मतीकी इञ्जीलका २२ बाब ७ आयतमें लिखा है कि मैं कुरबानी नहीं चाहता, बल्कि रहम चाहता हूँ ।
पोलूसके पहले खत, रोमियोंके १४ बाब २१ आयतमें लिखा है, कि, खानेके सबबसे खुदाके कामको मत बिगाड़ । सब कुछ तो पाक है, पर उस आदमीके लिये जो ठोकरके साथ खाता है बुरा है । गोस्त न खाना और न शराब पीना, ऐसा कुछ न करना जिससे तेरा भाई धक्का खाय, यही तेरे लिये बेहतर है
कुरान और हदीस - कुरान सिपारे पहला सूर फातेहा - (बिसमिल्लाहीं-रंहामानिरंहीम) ।
यही सारे ईमान मोहमदीकी जड़ है । इसका अर्थ है कि-मैं शुरू करता हूँ अल्लाहके नामसे वह अल्लाह कैसा है कि, दयालू है (रहीम) और रहमान है ।
चीटियोंका भजन, मूसा और पक्षी बकरी, तोता, भेड़, बैल, चील्ह कलगीदार छोटी चिड़िया
समीक्षा — कृपालू जो खुदा रहीम है रहमान है, उस खुदाका हुकम जबह एवं कत्ल करनेका हरगिज नहीं हो सकता, नहीं तो रहीम और रहमान नह हो सकता. यह किसीको खबर नहीं कि, रहीम और रहमानके कौनसे गुण होते हैं वह खुदा कौन है। कत्ल (रक्तपात) करानेवाला खुदा कौन है। किसी जीवधारीके गलेपर छूरी चलाना ईमान और बुद्धिके विरुद्ध है। यह मानुषिक बुद्धिसे तो एक-दमही उलटा है। छूरी चलानेके समय, विसमिल्लाह जब्बारुल जब्बारही कहारुल कहार, कहना उचित है। क्योंकि, विसमिल्लाह हिरहेमानिरहीमकी यह जगह नहीं है। जिस समय हाथमें छूरी ली उसी समय रहीमुरहीमोंकी सिफत जाती रही। जिसके ऊपर विसमिल्लाह रहीमुरहीमोंके साथ कल्मा न पढ़ा जायगा तो वह बिलकुल हराम हो जायगा। जो कोई रहीमका नाम लेकर छूरी चलावेगा उसपर अलबत्त ईश्वरका कोप होगा, वह ईश्वरकी कृपाका पात्र कभी न होगा। जो कोई इस विसमिल्लाहके अर्थके ऊपर विचार न करेगा, चाहे कुरान हबीस फिकका आदि सब कुछ पढ़े पर सब निरर्थक है, अगर रहीमके नामसे जबह हुई तो भी हराम हुई। रहीमको छोड़कर दूसरा कुछ कहा तो भी हराम हुई, बस इससे साबित हुआ कि, जिसने मांस खाया हराम खाया वो मुसलमान नहीं है।
कत्ल पर गैरके यह विसमिल्लाह। होवे हरगिज न तुझपर रहम अल्लाह।
बाशरअ और तिहारतो तकवा। सब अबस होवे अन्दरू स्याह ॥
११४ सूरते कुरानमें हैं सब सूरतोंके माथेपर यही है दूसरा कुछ नहीं। जिस सूरतमें जबह और कत्लका हुकम उत्तरा वह हुकम रहीम और रहमान अल्लाह के तरफसे कभी नहीं माना जा सकता. क्योंकि, रहीम यानी दयालू हत्यापर कभी भी प्रसन्न नहीं हो सकता, इससे यह सिद्ध हुआ कि, रहीम और रहमान अल्लाह दूसरा है जब्बार (अत्याचारी) खुदा दूसरा है, जिसके तरफसे अत्याचार है प्रत्येक सूरतके माथेके ऊपर यही है। ऊपर रहीम रहमान रखकर नीचे अत्याचार की आज्ञा देना धोखा नहीं तो और क्या हो सकता है।
कुरान सूरे हज-३७ सिपारा ४ स्कूअ ३७ आयतमें लिखा है अल्लाहको नहीं पहुँचेगा, उसका गोस्त या लौह, लेकिन उसको पहुँचता है तुम्हारे दिलको अधीनता, इसी तरह उनको दिया मैं तुम्हें कि अल्लाहकी बड़ाई पढ़ो, इस पर कि, तुमको राह समझावे और खुशी सुनानेवालेको।
कुरान सूरेबकर २१ सिपारा स्कूअ ६९ आयत लोगो खाओ जमीनकी चीजों में से जो हलाल और सुथरी है न चलो कदमों शैतानके कि, वह तुम्हारा पक्का शत्रु है।
भजनानन्दी बछड़ा, समय
जमीनकी चीजोंमेंसे यहाँ आशय है साग, पात, अनाज, फल, फूल आदि। क्योंकि, पृथिवीमेंसे यही उगते हैं, जीवधारी नहीं उगते, पृथिवीको ही सुथरी और हलाल चीजें हैं दूसरी कोई नहीं है, यही मनुष्यका यथार्थ भी क्षण है ।
गुलजार आदममें लिखा है कि, हजरत आदमने खुदाके हुक्मको न माना, अपने आपको नंगा देख लज्जावान् हुये । वृक्षोंसे पत्ता मांगने लगे कि, मैं अपना परदा करूँ, स्वयं किसी वृक्षका पत्ता तोड़ा। जब स्वयं इंजीरके वृक्षके अपनी खुशीसे पत्ता दिया, तो उसके पत्तासे अपना परदा ढका । यह वही बात है कि, मुहम्मद साहबको वृक्ष दीवार और पत्थर आदि सब सलाम करते थे, उसको मुहम्मद साहबके सिवा दूसरा कोई भी मालूम न कर सका । जो कोई जैसा भला तथा किसी को दुख देनेकी इच्छा न रखता होगा, वही वृक्षोंकी बातचीत और आशयको समझ लेगा । दयालु ऐसे आदमकी सन्तान मुसलमान ऐसे अत्याचारी हो कि, जीवित जीवधारियोंको बलसे पकड़कर काटते हुए कहें कि, हजरत आदम मुसलमान थे तो क्या ? वे भी ऐसेही थे जैसे कि, अब हैं । वास्तविक बात तो यह है कि, ये लोग मुसलमानके अर्थ न समझते होंगे जिससे झूठा दावा करते होंगे ।
सिंहाका न्याय — हदीसोंसे प्रगट है कि, कयामतके दिन खुदा सबका न्याय करेगा, मनुष्यके अतिरिक्त दूसरे जीवधारियोंका भी हिसाब होगा, जो हिंसक पशु सींग और नखोंसे दूसरोंको कष्ट पहुँचाते हैं, उनको दण्ड मिलेगा, वे भी अपने २ पापके फलोंको भोगेंगे । सब अत्याचारी जीवधारी नरकमें डाले जावेंगे, शुभकर्मों पापरहित जीव स्वर्गको जावेंगे । जड़ जीवोंका भी हिसाब होगा, जैसे फलदार वृक्ष भले और काँटेवाले दुख पहुँचानेवाले वृक्ष क्रमशः स्वर्ग और नर्कको जावेंगे । जो हिंसक जीवधारी पशु कहलाते हैं तथा स्वप्नकी दशामें हैं। वे भी रक्तपातके कारण दोजखमें जावेंगे तो फिर जाग्रत और विवेकके लिये ही बनाया गया, मनुष्य जो कि, अपने कर्मोंका हिसाब देनेवाला है, वह पाप और अत्याचार से किस प्रकार छूट सकता है । उसे अपने कर्म अवश्य ही भोगने पड़ेंगे ।
गोहत्याका निषेध — महम्मद साहबने कहा है कि, चारकी सद्गति कभी न होगी । १—जाबिहुल बकर यानी गोहत्या करनेवाला, २—दायमुल खुमर यानी शराबका पीनेवाला, ३—बायेउल बशर यानी मनुष्य बेचनेवाला, ४—कातिउल शिजर यानी वृक्षका काटनेवाला गाय मारनेवाले क्रस्साई वगैरः नशा खानेवाले आदमी बेचनेवाले और वृक्षके काटनेवाले ये सब दोजकके जीव हैं ।
समीक्षा — मुसलमान कहते हैं कि, हमको कुरबानीका हुक्म है, यह उनको
सांप, शिवका, जपी, चिनगीबटेर बोलियोकै अर्थ स्यावर और जंगमोंकी एकता
किस प्रकारसे साबित हुआ कि, खुदा कुरबानीसे राजी है। कुरबानीके लिये कोई आयत उत्तरी ? आकाशवाणी हुई ? अथवा कोई फिरिश्ता प्रगट हुआ ? या स्वप्न देखा ? कि, यह उसी खुदाकी तरफसे है। या और ही कोई है कुरान ५० सूरात रकूअमें लिखा है कि, हम बहुत नजदीक हैं तरफ उसके (इनसानके शहरगसे)।
जो खुदा व्यापक और शहरगसे नजदीक हो फिर उसखुदाका बचन भी शहरगसे निकट होना चाहिये, न कि, खुदा तो मेरे पास हो उसका कलाम फिरिश्तों के द्वारा आकाशसे आवे। इन सब बातोंसे साबित होता है कि, खुदाको न पहचान करकेही नबियोंने जबह और क़त्लकी आज्ञा दी है। ऐसी आज्ञाएं उसकी ओरसे नहीं हैं।
हजका यम - महम्मदी लोग हजको जाते हैं मक्काके निकट पहुंचते हैं, किसी वृक्षका पत्ता नहीं तोड़ते, घास नहीं उखाड़ते किसी जीवधारीको किसी प्रकारका भी दुःख नहीं देते, वरन् जूँ भी नहीं मारते। जो कोई इसके विरुद्ध कुछ करता है तो उसका हज पूरा हुआ नहीं समझते। इन बातोंसे जाना जाता है कि, मुसलमानोंका खुदा व्यापक और सर्व दृष्टा नहीं है, इसीलिये केवल मक्कामेंही उसके नियमोंका पालन होता है। यदि व्यापक है तो वही नियम सब जगह होने चाहिये, यदि खुदा केवल मक्कामें ही है तो सब जगह निमाज पढ़ना और रोजा रखना व्यर्थ है। इस कारण यह स्वीकार करना पड़ेगा कि, हजके नियमोंका सर्वत्र पालन होना चाहिये।
अनुचितका विधाता - इब्राहीम और मूसा आदिकका खुदा प्रगटही खाता पीता था, पर मुहम्मदका खुदा जो बेचून और बेचारा है, छिपाकर खाता था परदेसे बातचीत भी करता था। यह सर्वदासे सभी नबियोंको भिन्न २ कानून और बातें बतलाकर छल कपटसे लड़ाता आता है। किसीको शराब पीना सिखलाया, तो किसीको मांस खाना बतलाया, किसीको जना (व्यभिचार) करनेकी आज्ञा दी, किसीको उत्तम खानेको भी मना कर दिया। किसीको जीवहत्या करने की आज्ञा देता है। खरकईल नबीको विष्ठाकी पकी रोटी खिलाता है। यह बात खरकईल नबीकी किताबका बाब - १२ आयत-ईसाके शिष्य पितरसको डोंगर ढोर. कीड़े, मकोड़े आदि खानेकी आज्ञा दी। देखो रसूलोंका अमाल- ११ बाब ५१३ आयत-इसियाह नबीको जनाकार (व्यभिचारिणी) औरतसे मित्रता रखनेकी और व्यभिचारकी लड़कीसे विवाह करनेका आदेश दिया।
समीक्षा - इन नबियोंमेंसे किसीसे दरियापत किया जावे कि, आप कभी