भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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क्योंकि, यह मनुष्यका चोला चौरासी लाख योनिरूप रात्रिके प्रभातके समान है। अब क्यों सोते हो? चौरासी लाख शरीरमें तो सोतेही थे, अब तो बहुत सो चुके हानी दुःख बहुत उठा चुके, अब दुःख और हानियोंके निवारणका समय आया है। पर इस मनुष्यत्वरूपी धनको चुरानेवाले ठग और चोर भी तो बहुत पीछे लगे हुये हैं। जाग्रत होकर अपने धनकी रक्षा न करोगे तो दिन धाडे चोर डाकू डाँका मारकर ले जायेंगे। जीव दरिद्र होता है, पर इस शरीरमें तुम्हारे साथ अनन्त अमूल्य धन है, जिसके चुरानेके लिये चोरोंने पीछा किया है। यदि उनसे सचेत न रहोगे तो फिर कहीं ठिकाना न लगेगा, चौरासी लाख योनिरूप द्वारोंमें मँगलोंके समान भटकते फिरोगे, पर कुछ न पा सकोगे।"

हिंसा पुण्य नहीं — वेद जीवदयाको बहुत प्रकारसे वर्णन करता है, सहस्रों श्रुतियाँ अहिंसाकी स्तुतिमें पाई जाती हैं। अहिंसाके तुल्य दूसरा कोई धर्म नहीं माना है। यद्यपि नरमेध, अश्वमेध, गोमेध, अजामेध इत्यादि यज्ञोंकी विधियाँ भी लिखी हुई मिलती हैं, उत्पत्ति कालसे इनका प्रचार चला आता है, यद्यपि इस समय बहुत कम हो गया है क्योंकि, उन यज्ञोंके माननेवालोंमें द्रव्यका पूर्ण अभाव हो रहा है इस कारण कोई भी वेदानुसार यज्ञ नहीं कर सकता पर वेदोंने हिंसाको निष्पाप कभी नहीं बताया जो हिंसामें पाप नहीं मानते यह उनकी भूल है। अब यज्ञादिक विधानके विरुद्ध नाना प्रकारकी हिंसा और बलिदानकी परिपाटी चल पड़ी है। सर्वहिंसा महाघोर नरकको ले जानेवाली है।

इस बातपर लोगोंका कुछ भी ध्यान नहीं कि, वेद अहिंसा बतलाता है तो फिर हिंसा बतलानेकी क्या आवश्यकता है? हिंसा और अहिंसा दोनों एक साथ नहीं हो सकती। जीवहत्या करता है तो दया कहाँ? जहां दया है वहां जीवोंको दुःख देना कहाँ? यह कौसी धोखेबाजी है यह छल किसने किया, किस कारण ऐसा कपट किया गया। इसका कारण स्वसंवेद पढ़े बिना कोई नहीं जान सकता। सर्व श्राह्यण, साधू, ऋषि-मुनि, जो उस हिंसाके पक्षमें हैं, वे सब छल और धोकेसे भरे पड़े हैं, आप नष्ट होते हैं दूसरोंको भी नष्ट कर रहे हैं। जबतक पारख गुरु न मिलें तबतक इस कपट जालसे छूट नहीं सकता।

जिस ठगने सर्व आचार्य ऋषि मुनि आदिको उत्पत्तिके दिन ठगा वह अब भी मौजूद है। जो कोई इसको पहचानेगा अलग हो जावेगा धोखेसे बचता रहेगा वही मनुष्य है उसीकी मुक्ति हो सकती है उसके बिना सबको बंधनमेंही रहना पड़ेगा।