कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 985, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंऔर जड़ स्थावरकी सुषुप्ति है । सतोगुणी मनुष्य विवेकके लिये बनाया गया है, मनुष्योंका मुख्य लक्षण सारासार विवेक ही है । यदि विवेक न करे तो मनुष्य नहीं कहाया जा सकता, मांस खाना पूर्ण अविवेकका लक्षण है, मांस खानेवाला मनुष्य कैसे कहला सकता है ? जो पाप जानकर करता है वह विष खाता है वह अधिक दण्डका भागी होता है । स्वप्नमें सहस्रों प्रकारके पाप होते हैं पर उसका कुछ हिसाब नहीं होता, सुषुप्तिमें तो भले बुरेका ज्ञानही नहीं होता. वहां हिसाब किताब की बात ही क्या है. जो तुरियामें हैं वे ज्ञानी हैं वे तो विधि निषेधसे मुक्त शुभ कर्मके स्वरूपही हैं, पर मनुष्य जबतक जाग्रत अवस्थाको पूर्ण रीतिसे धारण न करे, तबतक तुरिया अवस्थाको नहीं प्राप्त कर सकता । इसी कारण जाग्रत अवस्था दीपक है । मनुष्य शरीर पाता है, सूर्य्यके समान प्रकाशमान होता है । आँखवालोंको प्रकाशमें भी अन्धोंके समान व्यवहार करना उचित नहीं, प्रकाशमें भलीप्राकर सब पदार्थ देखे जाते हैं, देख करके चलना सार्थक है, जाग्रत अवस्थाहीमें भजन हो सकता है । इसपर कबीर साहबका वचन है कि,
शब्द—जाग अब भी भोर बन्द, जाग अब भव भोर ॥ टेक ॥
है अल्लाल तो यार हमारा, सर्व जनका नाम अधारा ।
काया मसजिद खूब सँवारा, दुई खम्भ दश लगे किवारा ॥
उसमें पढ़ले बाज़ू निमाजा, हर दम हर दम हर दम साजा ।
पांचों पीर बसें एक थाना, घटमें अनहद हने निशाना ॥
पांच पीरकी करले खोजा, तब तालीम तोर तीसो रोजा ।
लैलाऊँ पल नाहिं विसाहूँ, घड़ि घड़ि चितवन दृष्टि पसाहूँ ॥
ज्ञान छुरी महरम गढ़ पकड़े, तब वस करले पांचो बकरे ।
कहे कबीर मैं हरिगुण गाऊँ, हिन्दू तुर्क दोऊ समुझाऊँ ॥
यथा—जाग अब भव भोर बन्द, जाग अब भव भोर ॥ टेक ॥
बहुत सोवे जन्म खोवे, कोई न होगा तोर ॥ जा० ॥
काम क्रोध लोभ तृष्णा, बांधली भर झोर ।
बहुत सोये जाग देखो, दशो द्वार शोर ॥ जा० ॥
पकड़के यम कैद करिहैं, जाव कौन ओर ।
जठराग्निके जोरमें, जिन रक्षा कीन्ही तोर ॥ जा० ॥
एक घड़ी हरनाम न लीन्हों, बड़ा हुरामी खोर ।
कहे कबीर अब क्यों न जागो, जब घर २ मूसे चोर ॥ जा० ॥
तात्पर्य—सत्यगुरु कहते हैं कि, ऐ मनुष्यों ! तुम बहुत सोये, अब जागो.