भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

उल्लूके रूपमें डायन बिल्लीके रूपमें, घात स्त्रीकी हत्या

तोडेकी चोरीपर आश्चर्य — इसने एक स्त्रीको कहते सुना कि, मेरा रुपयों का तोड़ा अथवा न्योली जाती रही । यह बात सुनकर तोता उच्च स्वरसे बोला कि कैसे आश्चर्यकी बात है ।

सरायका तोता — एक प्रसिद्ध तोता नारफोकोंकी सरायमें रहता था यह अपने स्वामी तथा उसकी स्त्रीसे विशेष अनुराग रखता था । वह उसके समस्त मित्रों तथा भृत्योंको पहचानता था । उनका नाम लेकर उनको पुकारता था उनको भीतर बुलाता कितनोंको कह देता कि दूर हो अपनी जगहपर जा ।

एक दिन एक मनुष्य उसके स्वामीकी स्त्रीसे पैसे कौड़ीकी बातें कर रहा था । मनुष्य बातचीत करनेमें कुछ गर्म हुआ । तोता उच्च स्वरसे बोला कि, ऐ महाशय ! आप इसको रख दीजिये आप इस विषयसे पूर्ण अनभिज्ञ हैं ।

अभ्यागतोंसे बात — इसी स्त्रीने हरे रङ्गका एक तोता पाला । वह अभ्यागतोंसे बातें किया करता था पूछता था कि, आप प्रसन्न तो हैं ? खाना पीना कीजिये । सीटी बजाइये नाचिये यह तोता बीस वर्षतक जीवित रहकर मृत्युको प्राप्त हो गया ।

द्वारपर बातें — व्यापारीके पास दो तोते थे एक हरा और दूसरा श्वेत रङ्गका था । श्वेतरङ्गके तोतेको सिखाया था कि, जब कोई घण्टा बजाये तो वह यह कहता कि द्वार पर कौन है ? एक मनुष्यने आकर द्वार खटखटाया । हरे रङ्गके तोतेने कहा कि, कौन है ? मनुष्यने उत्तर दिया कि, मैं वह मनुष्य हूँ जो चर्म लेकर आया हूँ । तोता बाह बाह करके चुप हो रहा । जब द्वार नहीं खुला तो उसने फिर द्वार खटखटाया । फिर हरे तोतेने कहा कि, कौन है ? वह रुष्ट होकर कहने लगा कि, तुम यहाँ क्यों नहीं आते । तोता फिर बाह बाह कहकर चुप हो रहा । उस मनुष्यने झुंझलाकर घण्टा बजाया । श्वेत तोतेने कहा कि, द्वारपर जाओ । जब श्वेत तोतेने उच्चस्वरसे कहा द्वार पर जाओ तो मनुष्य द्वारपर गया द्वार खुला न पाया तो उसने कहा कि, तुम मुझसे क्यों दुष्टता करते हो ? अत्यन्त क्रोधित हुआ । उसने मकानमें पीछे जाकर देखा तो जान लिया कि, जो उत्तर देते थे वो दोनों तोते हैं ।

विलियमका तोता — हिउम साहबके इङ्ग्लैण्डके इतिहासमें मैंने पढ़ा था कि, इङ्ग्लिस्तानी बादशाह चौथे विलियमका तोता किसी कारण टेम्स नदीमें गिरकर डूबने लगा । उस समय उसने पुकार कर कहा कि, नाव ! नाव !! एक नाव जल्दी लाओ, जो कोई शीघ्र नाव लायेगा सो दो सौ रुपया पारितोषिक पायेगा । एक मनुष्य दौड़कर गया, तोतेको पकड़के बाहर निकाल लाया ।

चीलके रूपमें बूढ़ी डायन बगुलेके रूपमें मारा निष्कर्ष, अन्तर्धान होना, विज्जू

नियमानुसार दो सौ रुपये भोगने लगा । बादशाहने कहा कि, यदि तोता कहे तो विश्वास करूं । बादशाहने पूछा कि, ऐ तोता ! इस मनुष्यको क्या दिया जाय ? तोता बोला कि, इस ठगको एक कूट दे दो । (कूट एक प्रकारका सिक्का है, जो एक अधेलेके बराबर होता है (यह बात सुनकर सारे दरबारी अचम्भमें हुये । बादशाहने हँसकर कहा कि, बहुत अच्छा, यही दिया जायगा ।

तोता नामा — एक बहुत प्रसिद्ध पुस्तक है जिसको कि, तोता नामा कहते हैं । तोता नामा फारसी तथा अङ्गरेजीमें भी मैंने देखा था । इसमें बहत्तर कहानियाँ हैं । इस पुस्तकको शुक्बहत्तरी भी कहते हैं । यह पुस्तक पहले संस्कृतमें थी । इसके पीछे फारसी तथा अंगरेजीमें हुई है । एक मनुष्य परदेशमें भ्रमणके लिये गया था । घरपर उसकी युवती स्त्री थी । एक मैना एक तोता रह गया था । तोता तथा मैना दोनों मनुष्योंकी तरह बातें किया करते थे । पुरुषके चले जानेके कुछ दिवसोंके पीछे स्त्रीको काम कामनाने पीड़ित किया । वह एक पुरुषके पास जानेको तैयार हुई । पहले उसने मैनासे पूछा कि, मैं अमुक मनुष्यके पास जाया चाहती हूँ, तू क्या कहती है । इस बात पर मैना ने उसको शिक्षा दी । कड़ी २ बातें कहीं, उस स्त्रीने उसको मार डाला । मैना भर गई, तोता देखता रहा इससे वह इस आपत्तिसे सचेत हो गया । उस दिन तो वह स्त्री ठहर गई, आगे दूसरे दिन अच्छे वस्त्राभूषण पहरे कर चलनेको तैयार हुई । तोतेसे पूछा कि, मैं अमुक पुरुषके निकट जाया चाहती हूँ तू मुझको आज्ञा दे, तोता उस विपत्तिसे सूचित था । उसने कहानी आरम्भ की, ऐसी बुद्धिमानी तथा चातुरीसे समझाने लगा । जिसे कि सुनकर स्त्री हर्षित हुई । अपने घर बैठ रही । दूसरे दिन प्रस्तुत होकर स्त्रीने आज्ञा माँगी तोतेने दूसरी कहानी आरम्भ की जिसको सुनकर वह स्त्री दूसरे दिन भी ठहर गई । इसी प्रकार उस तोतेने बहत्तर दिनों तक बहत्तर कहानियाँ सुनाई बहत्तरवें दिन उसका पति पलट आया । स्त्री व्यभिचारके महापापसे बच रही । वह पुस्तक शुक् बहत्तरी है ।

तोतेनामेके नामसे भी प्रसिद्ध पुस्तक है । पुस्तकोंमें तोता मैनाओंकी ही बातें लिखी हैं ।

बुलबुल ।

उर्दू साहित्यमें प्रेमके अकंटक पुजारियोंकी रसमयी गोष्ठीमें जो स्थान बुलबुलोंको मिला है वह दूसरे किसीको नहीं मिला । जहाँ कहीं प्रेमकी उत्कट प्रशंसाकी जाती है वहाँ बुलबुलको सबसे अगाड़ी रखा जाता है । शृंगारके कवियोंने तो इसके गुण गाये सो गाये ही हैं, पर स्वामी रामतीर्थजी जैसे त्यागी विरक्तों ने

विज्जूओंका परस्पर प्रेम उपसम, चूहा, श्वेत चूहा

भी इसकी प्रेम कहानी कह ही डाली है कि, "बुलबुलोंकी कबर बागहीमें बनती हैं" उर्दूका साहित्य तो इससे भरा ही पड़ा है।

बुलबुलोंकी मानुषी वाचा - डाक्टर गोल्डस्मिथ साहबकी नेचरल हिस्ट्री में लिखा है कि, एक पथिक पथमें चला जाता था। सांझ होते ही सरायमें उत्तर पड़ा। वहाँ बुलबुलके तीन पिंजरे लटकते थे। पथिकको बीमारीके कारण रातको नींद नहीं आई। बेचैनीकी अवस्थामें पड़ा करवटें लेता रहा चुपचाप था। आधी रात बीत गई चारों ओर सन्नाटा छा गया। मनुष्य अचेत होकर सो गया। समान अन्तर पर लटकाई हुई तीनों बुलबुलें आपसमें मनुष्योंकी भाषामें बातें करने लगीं। तीनोंने मनुष्योंकी भाषामें तीन कहानियां कहीं पहिली बढईकी कहानी थी दो और दूसरी कहानियां थीं उन बुलबुलोंकी कहानियां पथिक सुनता रहा। वे चुप होगई। सबेरा हुआ सरायका स्वामी उठा। पथिकने पूछा कि, तुमने इन बुलबुलोंको बातें करना सिखाया है? उसने उत्तर दिया कि, नहीं। मुसाफिरने कहा कि, ये तीनों बुलबुलें ठीक मनुष्योंके समान बातें करती हैं। इन्होंने आपसमें बहुत हँसी मसखरीकी तीन कहानियां कही हैं। मैं चुपचाप पड़ा सुनता रहा। क्योंकि, रोगकी वेदनासे मुझको रात भर नींद नहीं आई।

यह बात सुनकर सरायवाला अचंभा करने लगा कि, ये तो मेरे सामने कभी नहीं बोलीं न मैंने इनको बोलनाही सिखाया है। वे आपही बोलती होंगी, मैंने इनको कभी बातचीत करते नहीं देखा।

चण्डूल ।

चण्डूल बहुत चालाक पक्षी है बहुत सतर्कतासे अपना घोंसला बनाता है। बहुत युक्ति सहित घास फूसका घोंसला ऊंचे खजूरके वृक्षपर बनाता है वह बहुत बारीकीसे कोठडियां तैयार करता है नीचेकी ओर घोंसलोंका मुँह रखता है कैसी ही वृष्टि क्यों न हो उसके घोंसलेमें एक भी बूँद नहीं जाती उसके भीतर ओस इत्यादि भी नहीं घुस सकते। धूपकी गरमी जाड़ेकी सरदीका प्रवेश भी नहीं हो सकता।

चण्डूल और सांप - चण्डूलने वृक्ष पर अपना घोंसला बनाया। उसमें सांप घुस गया। चण्डूलके बच्चोंको खाकर उसीमें बैठ रहा। चण्डूल आया विपत्ति से सूचित हुआ। सांपको बैठे देख जान लिया कि, उसने मेरे बच्चोंको खा लिया है। दोनों चण्डूलोंने यह युक्ति की कि, जल्दी जल्दी घास फूस लाकर घोंसलेके द्वारको बन्द कर दिया उसमेंसे सर्प बाहर न निकल सका घोंसलेका मुँह बन्द हो चुका तब उन्होंने घोंसलेकी जड़ काट कर पृथिवीपर डाल दिया। उसको हिलते डोलते

देख कर लोगोंने जाना कि, इस खोतेके भीतर कुछ है जिसके कारण यह हिलता है । फड़ाके देखा तो सांप निकल पड़ा लोगोंने उसको मार डाला । इस युक्तिसे चण्डूलने सांपको अपने बच्चोंके बदलेमें मार लिया ।

विचित्र कर्तव्य — फिरोजपुरमें एक मनुष्यने चण्डूलको विचित्र कर्तव्य सिखाया था । उसके पास सोने चाँदीकी दो अँगूठियाँ थीं, वह दोनों अँगूठियोंको दूर रख कर कहता कि, चाँदीकी अँगूठी ला वह चाँदीकी अँगूठी लाता । जब वह कहता कि, सोनेकी अँगूठी ला तो सोनेकी लाता कुछ भी फर्क न पड़ता था ।

समझदार चिड़िया — फिरोजपुरके दूधगांवमें साहूकारके चौबारे पर एक साधू रहता था एक छोटी चिड़िया उसके समीप आकर अत्यन्त मधुर स्वरमें बोला और गाया करती थी । एक दिन वहाँ मुसलमान आ बैठे उस समय भी वहाँ चिड़िया आकर बोलने लगी । मुसलमानने कहा कि, मैं इसको फँसाऊंगा । चिड़ियाने यह बात सुनली । वह उस दिनसे उस जगह आना छोड़ दिया । दूर दूर बोलती पर उस जगह कभी न आती थी ।

थसकी बोली — एक प्रकारकी चिड़िया होती है उसका प्राकृतिक गुण यह है कि, बहुत मधुर भाषी होती है । भांति भांतिके मोठे राग गाया करती है नाना प्रकारकी बोलियाँ बोलती है । वह कुत्तोंकी तरह भूकती और बिल्लीकी तरह म्याँव २ भी करती है । मनुष्यके स्वरमें स्वच्छ बोलती है । बोरडरप साहबने स्वयम् अपने मित्रों सहित सुना था कि, वह बोलती थी । 'मेरी प्यारी । मेरी सुन्दरी प्यारी । मेरी छोटी सुन्दरी प्यारी ।'

सुर्खसीना ।

एक पक्षी होता है इसका खोता पुष्पके बरतनोंके पास था उसी जगह एक सांपने आकर उसका घोंसला घेर लिया । चिड़िया बागवानके मोड़े पर बैठ कर उच्च स्वरसे बोलने लगी । अपने खोतेकी ओर दौड़ती । पहले तो मालीने उस चिड़ियाके इशारेको न समझा । चिड़िया उसके मोड़े पर आबैठी उसी प्रकार बोलने लगी । मालीने बिचारा कि, यह निडर चिड़िया मेरे मोड़े पर आकर शब्द करके फिर अपने घोंसलेकी ओर दौड़ जाती है इसका कोई अवश्य कारण है, यह कुछ कहती है । उसने जाकर देखा त्हे उसका खोता सर्प द्वारा घिरा हुआ था । तब तक उसके बच्चोंको किसी प्रकारका कष्ट नहीं पहुँचा था । मालीने सर्पको मार डाला धन्यवाद देनेके बदले चिड़िया मधुर गाना गाने लगी ।

बड़ीआबाबील ।

कप्तान ब्राउन साहब कहते हैं कि, बड़ी जातिकी एक आबाबील थी उसके

सर्प सर्पोंके राजा, सर्प सभा

नरको शिकारीने बन्दूकसे मार डाला । वह सदाही अत्यन्त क्रुद्ध होकर अपने नरका परिशोध शिकारीसे लेती, उसपर अत्यन्त क्रुद्ध हो उसके माथेपर चोंचे मारा करती उसके चारों ओर चिल्लाती फिरती जहाँ कहीं उस शिकारीको देखती वहीं वह उसपर आक्रमण करती । रविवारके दिन आखेट करनेवाला अपना वस्त्र बदल के दूसरे प्रकारका वस्त्र पहनता उस समय वह पहचान न सकती थी इसी प्रकार उसपर आक्रमण करती थी ।

एक बहुतही मिष्टभाषी चिड़िया बहुत मीठा आवाजसे गाया करती थी । उसको प्रायः खिड़कीके बाहर रख देते थे । वह उच्च स्वरसे भली प्रकार गाया करती थी । एकदिन ऐसी घटना हुई कि, उसका पिंजरा मकानके बाहर वृक्षोंके पास धरा हुआ था उसके निकट एक अबाबील आकर पिंजरेके चोंगिंदे फिरेने लगी उस पिंजरेके ऊपर बैठके अपनी बोलीमें पिंजरेके भीतरवाली चिड़ियासे बोलने लगी कुछ काल तक दोनों आपसमें बातें करती रहीं कुछ कालके पीछे चिड़िया उड़ गई । क्षणोंमें एक कीड़ा मुहमें दबाकर लौट आई कीड़ेको गानेवाली चिड़ियाके पिंजरेमें डालकर चली गई । उस दिनसे वह नित्य अपने मित्र अबाबील के लिये एक कीड़ा लाया करती भेंट करके चली जाया करती । दोनों अबाबीलोंमें बहुत मैत्री होगई । आसपासके लोग इनका कौतुक देखनेके लिये उस चिड़ियाका पिंजरा रोज बाहर धर दिया करते । वह अबाबील पूर्वानुसार अपने मित्रकी सुधि लिया करती । जब कोई मनुष्य समीप आता तो दूर भाग जाती अकेलेमें आकर अपने मित्रसे मिला करती । सरदी का मौसम आया तो उड़ गई फिर कभी दिखाई नहीं दी ।

सांप निकाल लेनेवाली — सींगके समान चोंचवाली एक चिड़िया होती है । जिसे अङ्गरेजी भाषामें हार्न बिल कहते हैं वह कुरुप्पा होती है । उसका यह नियम है कि, पृथिवीमें जहाँ कहीं सांप छिपा हो खोदकर निकाल लेती है ।

रेल ।

रेल एक प्रकारकी चिड़ियाको कहते हैं । वह हरी घास तथा अनाजके खेतोंमें रहती है । बहुत दुष्ठा तथा धोखेबाज होती है जब कोई उसको पकड़ लेता है उसको भागनेकी कोई राह नहीं मिलती तो मरनेका बहाना करती है इतना स्वांस बन्द करती है कि, मानों उसमें तनिक भी प्राण नहीं रहा है ।

एक बार एक कुत्ता इसी जातिकी चिड़िया पकड़के एक मनुष्यके पास ले गया । उस समय जान पड़ा कि, वह निर्जीव है तब उस मनुष्यने उसको अलग धर दिया स्वयम् उसके पास खड़ा रहा । चिड़ियाने जान लिया कि, अब यहाँ कोई नहीं

तो कुछ कालके पीछे अपनी एक आंख खोली । मनुष्यने चिड़ियाकी धूर्तता जानके उसको उठा लिया । उसी समय उसका शिर तथा पांव लटक पड़ा, मानो वह मर गई हो मनुष्यने अपनी जेबमें रख लिया । कुछ कालके बाद भागने तड़फने लगी । उसने बाहर निकाला फिर उसी प्रकार मुर्दा होने लगी । उसने उसको फिर एक जगह रख दिया आप अलग खड़ा हुआ । पांच मिनटोंके पीछे अपना शिर उठाया इधर उधर देखकर भाग गई ।

पफन ।

एक प्रकारकी चिड़िया होती है । अङ्गरेजी भाषाका इसका नाम पफन है आइलैण्डकी भूमिमें होती है । लोग उसको बंसी लगाके फँसाते हैं जब एक चिड़िया फँस जाती है तो उसके साथी तीन चार मिल कर उसे अपनी ओर खींचते हैं । इस तरह कितनेही बच जाते हैं ।

क्रासबीक ।

बोर्डरिप साहबका कथन है कि, यह एक प्रकारका पक्षी होता है जिसको अङ्गरेजीमें क्रासबीक कहते हैं क्रासबीकका अर्थ टेढ़ी चोंचवाली चिड़िया है यह पक्षी थोरड़िया देशमें होता है वहाँके पहाड़ी लोग इसके विषयमें ऐसा ध्यान करते हैं कि जिसके घर यह पक्षी होता है वह अपने स्वामी की बीमारीको अपने ऊपर ले लेता है उसका स्वामी आरोग्य लाभ करता है । लोग इसी कारण इस चिड़ियाको अपने घरमें रखते हैं लोगोंका ऐसा भी विश्वास है कि यदि इस पक्षी का टेढ़ा चोंच दाहिनी ओर झुका हो तो मर्दकी देहसे सदी तथा गठिया आदिकका रोगभी दूर होता है । यदि बाये ओरको झुके तो स्त्रियोंके शरीरकी बीमारियोंको दूर कर दे यह प्रायः मिरगीकी बीमारी दूर हो जाती है । वहाँके लोग इसका जूठा पानी पीते हैं उनका ऐसा ध्यान है उसका जूठा जल रोगोंके लिये अच्छा है ।

भुजंगा ।

कप्तान ब्राउन साहब लिखते हैं कि, एक दिन एक बहुत ठट्ठेकी बात हुई विलियनसेनरेट नाम का एक मनुष्य एडनबर्गके पास कर्मर्टन नामके स्थानमें रहता था उसने भजैंटा पाला था । अङ्गरेजीमें इसको डा कहते हैं । हिन्दीमें भोजैंटा अथवा भुजङ्ग कहते हैं । एक दिनकी बात है कि, टेबुलपर ह्विस्की मदिराका आधा गिलास भरा रखवा था । भुजङ्ग उस जगह बैठ गया उसे पीलिया शराबीकी तरह मस्त हो गया । उसने पर तथा पांव लटक दिया । अपने मुँहके बल पृथिवी पर गिर पड़ा । उसके पांव ऊपरको उठ गये । ऐसा जान पड़ा कि, मानों वह मर गया । पानी उसके मुँहमें डाला गया पर पी न सका । वह लफानेलेके कपड़ेमें लपेट

ढोसी पर्वतका नागराज

कर धर दिया गया। लोगोंको निश्चय होगया कि, मर गया दूसरे दिन छः बजे द्वार खुला तो लोगोंने उसको लफानेके कपड़ेसे बाहर निकाला; तब वह उड़कर बाहर चला गया जिसमें चिड़िया पानी पीया करती हैं उसमें खूब पानी पीकर अपनी प्यास बुझाई। पीछे तो इतना चेतता कि, मदिराके सभीप कभी भी नहीं जाता इस विचारसे सदैव भयभीत होता रहा कि, इसके पीनेसे मेरी बुरी गति हुई थी।

गोडस्किउ ।

एक प्रकारका पक्षी है यह अङ्गरेजी भाषाका नाम है इसका हिन्दीमें अर्थ दूध चूसनेवाला होता है। यों कहते हैं, कि वह रातको बकरियों और हरिणियोंके स्तनमें लगकर दूध चूस लिया करता है। पतङ्गे मार मार कर भी खा जाता है उसकी आँखें बड़ी २ और पर मुलायम सुन्दर एवं रङ्ग-बरङ्ग होते हैं उसका चोंच बहुत खुला हुआ होता है ये पृथिवीके सभी देशोंमें पाये जाते हैं।

कुञ्ज ।

कुञ्ज एक प्रकारका पक्षी होता है। अङ्गरेजीमें उसको बोअरबड कहते हैं इसकी अनेक जातियां हैं आष्ट्रेलियाके टापूमें रहते हैं। कुञ्ज इस कारण कहते हैं कि, वे सब वृक्षोंकी टहिनियां लेकर कुञ्ज बनाते हैं उनमें खेलते और कौतुक करते हैं। कुञ्ज वृक्षोंकी टहिनियोंसे चौड़ा रकाबीदारगुनके बनाते हैं। उनके बीच सिलसिलावार दोहरी महराबकी श्रेणी बनाते हैं वह कई फीटका लम्बा चौड़ा होता है। उसके भीतरसे सब चिड़ियां प्रसन्नतापूर्वक इधर उधर उड़ती फिरती हैं। महराबकी शोभा बढ़ानेको कौड़ियां चीथड़े टूटे बर्तन और पर इत्यादि लगाती हैं। यदि उनमेंसे कोई वस्तु खोजाय तो जिस चिड़िया अथवा जिसके कारणसे खोजाय वही दूँढ़कर फिर उसी जगह उपस्थित करदे, दूसरा नहीं ला सकता। जैसे मनुष्य चौसर तथा शतरञ्ज इत्यादि खेलते हैं वैसेही इन चिड़ियोंके मनोरंजनका एक मजेदार खेल है।

इनी ।

एक प्रकारका पक्षी कोकिलके समान होता है। अङ्गरेजीमें उसको इनी कहते हैं। जहां कहीं वे मधुका छत्ता देखते हैं चिल्लाकर पथिकको सचेत कर देते हैं कि, इस जगह शहदका छत्ता है। पथिक उस बातको समझ जाता है। मधुके छत्तेसे मधु निकाल लाता है। थोड़ा मधु उसको भी दे देता है। इसी कारण उसे इनी गाइड अर्थात् मधुतक लेजाने वाला कहते हैं।

हार्नबिल ।

एक प्रकारका पक्षी है, अङ्गरेजीमें जिसको हार्नबिल कहते हैं। यह एक

ग्रन्थकारका मत बाल रूपीका वीन प्रेम साँड़ बननेवाला सांप

प्रकारका काग है । इसको प्रायः कीड़े मकोड़े खानेसे अधिक प्रेम है । इस कारण लोग उसको पालते हैं जिसमें उनका घर कीड़े मकोड़ोंसे स्वच्छ रहा करे । उसको अत्यन्त पवित्र तथा स्वच्छ पक्षी समझकर इसका पूजन किया करते हैं । उसकी रक्षा किया करते हैं जिससे उसे कोई न मार सके । वे समझते हैं कि, यदि एक हार्न बिलभी मारा जायगा तो देशमें आपत्तियां तथा अशान्ति आदि उपद्रव उत्पन्न हो जायेंगे ।

कोकिला ।

कोकिला एक होशियार चिड़िया है । वह अपने रङ्ग ढङ्गकी चिड़ियोंके साथ यह सलूक करती है कि, जब अण्डे देती है तो अपने स्वरूपको चिड़ियोंके घोंसलेको दृढ़ती है । उनके अण्डेको कहीं इधर उधर फेंककर उसी स्थानमें अपना अण्डा धरकर चली आती है । पक्षी उसके अण्डोंको पालते हैं । बच्चेका पोषण करते हैं, उसकी सेवा करके बड़ा करते हैं । वे बच्चे बड़े होते ही कोकिलके बच्चे हो जाते हैं ।

हजार दास्तान बुलबुल ।

एक पक्षी होता है जिसको हजार दास्तान बुलबुल कहते हैं । उसकी चाँचमें सहस्र छेद होते हैं । वह ऐसे सुरसे गाता है कि, उसके सामने किसी भी गवैया मनुष्य की गीत गानेकी सामर्थ्य नहीं है । इसकी उमर बहुत होती है । इसको भविष्यका हाल मालूम रहता है, जिससे जान लेता है कि, मैं अमुक समयमें मरूँगा । इस पक्षीकी आयु सहस्र वर्षकी होती है । जब यह राग छोड़ता है तो अत्यन्त मनोहरता से गाता है । प्रत्येक छिद्रसे ऐसे ऐसे बाजोंकी आवाज निकालती है कि, गानेवाला उसके सामने क्या वस्तु है, यदि सुनता तो बीजू बावरा भी उसके आगे लज्जित होता । जब उसकी मृत्यु निकट होती है तो जान लेता है कि, अब मेरे कूच के दिन निकट आगये हैं । वह बहुतसी लकड़ियां एकत्रित करता है । उसपर बैठकर दीपक राग गाना आरम्भ करता है । दीपकराग गानेसे आपसे आप आग लग जाती है । उसी आगसे लकड़ियां जलने लगती हैं और उनके साथ आप भी जलकर ढेर हो जाता है । आग ठण्डी हो जाती है तो उसके ढेरसे वँसाही एक दूसरा पक्षी उत्पन्न हो जाता है । जैसा पहला पक्षी होता है ठीक वैसेही गुण उस दूसरे पक्षीमें भी होते हैं ।

जेकड़ा ।

जेकड़ा एक अङ्ग्रेजी पक्षी है यह कागकी जातिमेंसे है । लोग उसे पालते हैं वह मनुष्यकी बोलीका अनुकरण करने लगता है । मेंडकोंके ऊपर बोला करता

स्त्री बननेवाली नागिन, यमदूत

है। अपने घोंसलेके लिये पशम (रोंआ) इकट्ठा करता है यह सुविख्यात पक्षी है। चौर होता है। रुपया इत्यादि जिस किसी चमकती वस्तुको देखता है चुरा लेता है। खाने पीनेकी वस्तु चुराता है। कभी नढनेवालोंका ऐनक लेकर भाग जाता है। लोग उसकी चोरीसे अनभिन्न रहते हैं। व्यर्थही आपसके मनुष्योंपर चोरीके दोषका आरोप करते हैं।

जे।

एक प्रकारकी चिड़िया जिसका फीका लाल रङ्ग होता है। तेरह इंच लम्बी होती है। इसे अङ्ग्रेजीमें जे कहते हैं, यह अन्यान्य चिड़ियोंकी नकल किया करती है। घोंड़ेकी तरह आवाज करती है। तिसके सुननेसे जान पड़ता है कि, बछेड़ा हिन हिनाता है। यदि कोई इस चिड़ियाको न देखे तो उसको बछेड़ेका हिन-हिनानाही निश्चय हो यह अत्यन्त मीठे सुरोंमें गाने गाया करती है।

हुडेबर्ड।

पूरबी हन्शमें एक अत्यन्त सुन्दर चिड़िया होती है। उसको अङ्ग्रेजीमें हुडे बर्ड कहते हैं। लोग उसको पिंजरेमें रखकर पालते हैं। वह बहुत समझदार होती है। क्योंकि, जब उसके बाल डुम और पर ठीक ठीक रहते हैं तो फुरतीला जान पड़ती है। पर जिस ऋतुमें उसकी डुम और पर झर जाते हैं तो अत्यन्त लज्जित और सुस्त हो जाती है। जैसे कि एक धनी निर्धन होकर लज्जित हुआ करता है।

अनल पंख।

यह एक पक्षी है आकाशमें उड़ताही रहता है, एक क्षण भी नहीं ठहरता, नर मादियोंका पारस्परिक दृष्टि संभोगही होता है इसीसे गर्भ रह जाता है नियत समय पर अंडा देनेसे वह भी पृथ्वीकी ओर गिरता है। मार्गसे ही पक जाता है बच्चे पैदा होजाते हैं एवं पृथिवीमें आनेसे पहिले बेही ऊपरको उड़ जाते हैं। कबीर साहिबने अपने हंसोंके विषयमें इसका दृष्टान्त दिया है कि सत्यगुरुके हंस कर्मोंसे नीचे गिराये जाकर भी फिर ऊपरकोही आते हैं उनका नितान्त पतन नहीं होता।

किंगाफिसर।

सेण्ट जान साहिब कहते हैं। यह एक पक्षी होता है। इस शब्दका अर्थ मछलियोंका बादशाह है। यह बड़ी बुद्धिमानोंके साथ मछलियोंको पकड़ता है। यह समुद्रके ऊपर अनलपक्षीके समान उड़ा करता है। जब किनारेपर तुन्द अँधेरी वायु चलती है उसी समय नर मादेका संग होनेसे गर्भ रहता है वह अँधेरेमें अण्डे डाल देती है। १५ दिनतक वायु बन्द रहती है सात दिनमें अण्डा पकता तथा

मानुषीके गर्भसे बाबा घासीराम सांप

उतनेही समयमें बच्चा पूरे उड़ने योग्य हो जाता था । यूरोपके लोग इस पक्षीके इस दिनको हिलसेन डेस कहते हैं । बच्चेके उड़नेपर वायु फिर पूर्वके समान उड़ता है ।

मृत्युकी सूचना देनेवाली ।

उत्तरी एफ्रिकामें बकरीका दूध पीनेवाली चिड़ियोंमें एक ऐसी चिड़िया है जो कि, शुद्ध अंग्रेजी भाषामें कहती है कि, (WHIP POOR WILL) चाबुक मारो, विचारको मारैगा । यह बात मनुष्यकी बोलीमें बोलती है । प्रत्येक मनुष्य इन तीनों शब्दोंको अलग अलग समझता है ? जो कोई इस बातसे अनभिज्ञ हो वह अवश्यही जान सकेगा कि, आदमी बोल रहा है । वहाँके रहनेवाले कहते हैं कि, ये शहीदोंकी आत्माएं हैं जो पक्षियोंके स्वरूपमें प्रगट होती हैं । यदि पक्षी किसीके घरपर बैठकर आवाज करें तो जाना जाता है कि, अवश्यही इस घरका कोई मनुष्य मर जायगा ।

विशेष वक्तव्य — सहस्रों प्रकारके पक्षी हैं जिनकी बुद्धिमानीका विवरण असम्भव है । बड़े बड़े तथा छोटे छोटे अनगिनित हैं । चार खान चौरासी लाख योनिके सारे जीव बुद्धिमानीमें मनुष्योंके समान हैं कितनेही उनसे भी अधिक हैं । उनका हिसाब कौन लगा सकता है ।

पक्षियोंके बाद सहस्रों प्रकारके पतङ्ग और भँवरे इत्यादि भी बुद्धि सावधानीसे भरे हुये हैं । कहाँतक कौन लिख सकता है । इङ्ग्लैण्डवासियोंमें से कितनों हीने इसकी जाँचमें अपनी सारी आयु बितादी है । फिर भी ठीक ठीक पता नहीं लगा । वेभी परमेश्वरी कौतुकोंका यथार्थ भेद नहीं पासके । हां, उन लोगोंने अपने परिश्रमानुसार बहुत कुछ जान लिया है अङ्ग्रेजी भाषामें ऐसी अनेक पुस्तकें हैं जिनसे मनुष्य पशुओं तथा कीड़े मकोड़ोंकी बाबतमें बहुत कुछ जानकारी हासिल कर सकता है ।

मखियाँ ।

इन मखियोंकी दो सौ पचास जातियां निश्चित की गई हैं । इनके दो विभाग हैं । एक प्रकारकी मखियां हैं जो भूमिमें छिद्र बनाके रहती हैं, दूसरी वे हैं जो मधु एकत्रित किया करती हैं । वे छत्ते बनाकर इधर उधर मधु ढूँढ़ा करती हैं । फूलोंके रसको अपने पाँवोंमें लाती हैं उनके पिछले पाँवोंपर बड़े बड़े बाल होते हैं । वे जिन कोठरियोंको बनाती हैं उनमें फूलोंका रस भरती हैं । उनके समीप और स्थान होता है दूसरी कोठरियोंमें वे अण्डे देती हैं । उन्हीं रसोंको खाती पीती हैं ।

मक्खियों पर विज्ञ ।

प्टामेक्स नामक एक बहुत बड़ा विद्वान् हुआ है जो कि, बराबर छप्पन वर्षतक मक्खियोंकी चाल ढालको देखकर भली भाँति निश्चय करता रहा । किलिक्स नामक एक बहुत बड़ा तत्ववेत्ता हुआ है जिसकी सारी उमर यही सब जाननेमें बीती । पोरों देशके कितनेही वैज्ञानिक इनका स्वभाव देखकर उनकी जाँच करते हुए इनकी बातें लिखते रहे थे ।

डाक्टर वाटथार्वी तथा फ्रानसिस हिउबर — प्राचीन कालके वैज्ञानिक जैसे डाक्टर वाट थार्वी—फ्रानसिस हिउबर इत्यादि सन् १२५२ ई० तक जाँचते देखते रहे ।

मधुमक्खियोंकी तीन जातियां — उन्होंने जान लिया कि मधुमक्खियोंके छत्तेमें तीन जातिकी मक्खियां बसती हैं । प्रथम तो परिश्रमी मक्खियां हैं । दूसरी सुस्त तथा निकम्मी मक्खियां हैं । तीसरी राजकुमारी तथा बेगमें हैं । जो बेगम मक्खियां हैं वे अण्डे देती हैं जो बेकाम तथा सुस्त नर मक्खियां हैं उनके सम्भोगसे अण्डे उत्पन्न होते हैं । परिश्रमी मक्खियां प्रत्येक दौड़ धूपके काय्यं किया करती हैं, मधु इकट्ठा करना उन्हींका कार्य है ।

इनके अग्रमें एक विचित्र प्रकारका सूँड होता है । जिसमें मधु भर लाती हैं । सूँडमें चालीस पेच होते हैं, उनके चारों ओर बहुत सुन्दर बाल उगे होते हैं । सूँडोंके पाँच भाग होते हैं, वे भाग इस प्रकार होते हैं कि, दो भाग तो उनके दोनों ओर और एक भाग उनके बीचमें होता है । बीचके भागमें मधु इकट्ठा होता है । सूँडके चारों ओरके बाल जिह्वाके समान हैं जिससे मधु चाटा जाता है । सूँड जो कुछ अपनी ओर खींचे उसको सुरक्षित रीतिसे लाकर मधुके खजानेमें एकत्रित कर देती हैं । इसके सुन्दर मुँह अनेक कार्यके लिये बने हुये हैं । इसकी छः टाँगें होती हैं । दो बिचली टाँगें छोटी होती हैं, शेषकी चार टाँगें बहुत लम्बी होती हैं अगली टाँगोंमें प्यालेके समान कुछ गड़हे मधु एकत्रित करनेके लिये बने होते हैं । इसके एक पांवमें कॅटियांसी लगी होती है । जिससे मधुके छत्तेपर सरलतापूर्वक घूम फिर सकती हैं । इसके पेटमें तीन भाग होते हैं—एक तो मधु एकत्रित करनेकी थैली, एक मोमकी थैली और तीसरी विषकी थैली होती है, जो थैली मधु एकत्रित करनेके लिये है सूँडसे मधु लेकर उसमें रख छोड़ती है । यह उसके आगे और नीचे बनी रहती हैं । उसके आगे एक थैली बनी है । उसकी राहसे उसमें मधु पड़ता है, वह मधुमक्खीका भोजन है, वह पेटमें जाकर हजम हो जाता है उसीसे उसका जीवन है जो भोजन करती है, उसको जब वह बाहर निकालती है तो मोम हो जाता है ।

सांप और बालक

उसी पेटके पास एक हथियार है जिसको डंक कहते हैं वह भी बहुत विचित्र गुणके साथ बना है । दूरबीनसे देखा गया है कि, उसकी बनावट बहुत विचित्र है । उस हथियारमें दो डंक बने हुए हैं । दोनों डंकोंके लिये एक नेयाम बनी हुई है । वह डंक मारा चाहती है तो डंकको नेयामसे बाहर निकालती है डंक मार चुकनेके बाद नेयामसे विष खींचकर डंकमें भर देती है । डंककी जड़में दश बाल होते हैं, जिनके बलसे डंक बहुत पुष्ट है शीघ्र निकल नहीं सकता. हलाहल विष उनमेंसे निकलनेका मार्ग रखता है जिसके जोरसे दूसरे जीवको मृतक कर देती हैं । इस मक्खीकी पांच आंखें होती हैं, तीन आंखें तो उसके शिर पर होती हैं दो आंखें दोनों ओर होती हैं । दोनों आंखोंके बीचसे दो नलियां निकलती हैं वे दोनों ओर टेढ़ी होती हैं वे छूनेकी तीक्ष्ण इन्द्रिय हैं । वस्तुतः ये दोनों यन्त्र मक्खीके अत्यन्त उपयोगी हैं इन्हींसे अपनी कोठरियां बनाती हैं, अपने बच्चोंको खिलाती हैं, अपने खजानेको इकट्ठा करती है इसीसे वह अपने सजातीयको पहचानती है इस मक्खीके छत्तेकी कोठरियां छः पहले होती हैं उनमें मधु रक्खा जाता है, उससे बच्चोंका लालन पालन होता है, छत्तेमें दो दो मधु घर एक दूसरेकी ओर पीठ किये हुये होते हैं बहुत सिलसिलेवार बराबर होते हैं । इन दोनों कोठरियोंके बीच जो स्थान होता है उसमें दो मक्खियां स्वतंत्रतापूर्वक रह सकती हैं । चाहे एक दूसरेके निकट अथवा पृथक् पृथक् रहें । प्रत्येक कोठरी बहुत सुन्दर बनी हुई होती हैं, एक दूसरेसे तनिक भी बड़ी अथवा छोटी नहीं होती हैं । इस कारण थोडेही व्ययमें कोठरी बनानेका काम हो जाता है इसी प्रकार गृहकी बनावट बराबर बनती चली जाती है जैसेही एक मधुगृह युक्तिपूर्वक निर्मित किया जा चुका कुछ कोठरियां बन चुकीं उसी समय दूसरा और तीसरा बनना आरम्भ होता है । इसी प्रकार सब युक्तिपूर्वक बनता चला जाता है । जब तक छत्तेका कार्य सम्पूर्ण न हो ले मक्खियोंमेंसे केवल एक मक्खी मधुगृहकी नींव डालती है । नींव डालनेवाली मक्खी मोटे मोमको कुछ अपने कुछ दूसरेसे लेकर मिलाती है । उस मोमको अपने छिल्ले पावोंसे खींचकर अगले पावसे पकड़ ले आती है अपने मुँहकी तरीसे नरम तथा तर करती है जो मोम अन्यान्य मक्खियां उस गृह बनानेवाली मक्खीको देती हैं, उसको लेकर मकान बनानेवाली मक्खी अपने मधुगृहको बनाती जाती है । इस प्रकार एक दूसरीकी सहायक हुआ करती हैं जो कोठरियां सुस्त तथा निकम्मी मक्खियोंके लिये बनती हैं वे कुछ बड़ी होती हैं अन्यान्य कोठरियोंकी अपेक्षा सुदृढ़ और मधु-गृहके नीचे होती हैं । सबसे पीछे शाही महल होते हैं इनमें रानी रहती हैं । ये रानीके रहनेकी कोठरियां शहदखानेके बीचोबीच होती हैं । गिनतीमें तीनसे

मानुषी भाषापर तीरीत हदीस मुहम्मदी खुदाका शाप आदमका दश दण्ड होवाको पंद्रह दण्ड, निष्कर्ष विरोध

बारह कोठरियां प्रस्तुत हो चुकनेके बाद बेगम अण्डा देने लगती है। बेगमोंके बच्चा देनेकी विचित्र युक्ति है। वे सब घरोंमें सुस्त नर मक्खियोंसे कुछ सम्बन्ध नहीं रखतीं। पर जब बाहर फिरती हैं तो नर मक्खीसे मिलती हैं।

हिउबर - बहुत बड़ा विद्वान् था उसने इस विषयको बहुत जांचकर लिखा है। वह कहता है कि, वे छत्तेके बाहर संयुक्त होते हैं एक बारके सम्भोगसे मक्खियां दो मौसम तक बच्चा देती रहती हैं। एकही मौसममें लाख बच्चे देती हैं जिन अण्डोंसे परिश्रमी मक्खियां उत्पन्न होती हैं उनकी बहुत रक्षा की जाती है उन बच्चोंका लालन पालन फूलोंके रस तथा मधुसे होता है, दाई मक्खी उनको पालती है। दाई मक्खीका यही काम है कि, सदैव बच्चोंकी रक्षा तथा सेवा किया करे, बराबर ग्यारह मास भी परिश्रमी मक्खियोंके अण्डे देते नहीं बीतते कि, रानी मक्खियां फिर राजकुमारियोंका अण्डा देने लगती हैं इसी सेवामें संलग्न रहती हैं। शाहजादी मक्खियां फूलके रस अथवा खराब मधुको अच्छा नहीं समझतीं उनके लिये अवश्यही उत्तम मधुका प्रयोजन होता है। मधुमक्खियां बहुत नमक-हलाल होती हैं। अण्डेकी अवस्थासे लेकर जबतक रानी मक्खीका पूरा स्वरूप होता है उसमें कुल सोलह दिन लगते हैं। सोलह दिनोंके बाद मक्खीका पूरा स्वरूप बन जाता है। इनको एक समयमें एक रानीका प्रयोजन होता है। वस्तुतः बादशाह होनेमें एकसे अधिक अधिकारी होनेसे बहुत कष्ट होता है। इस कारण जब तक सिंहासन खाली न हो तबतक रानी मक्खी एक घरमें बन्द रहती है। इसमें बहुत बड़ा कारण यह है कि, जिसके लिये एकसे अधिक रानी निकाली नहीं जाती क्योंकि, एकही समयमें दो रानी बाहर निकाली जाने पर एककी मृत्यु निश्चित है। मक्खियोंकी सैन्य चलती है तो अगवानीके लिये केवल एक मलका होती है। मक्खियोंकी मुखिया वह आगे होती है। प्रायः अनेक रानी मक्खी होती हैं जब दो रानी मक्खियोंमें साक्षात् होता है तो भयंकर युद्ध उपस्थित होता है। उनकी गिनती पहचानी जाती है। मक्खियोंके नियत होनेमें एक विचित्र कौतुक होता है। यदि कभी उनका बादशाह खो जाय कोई दूसरा वारिस न बचे तो बहुत आयोजन होता है। इस कारण एक मजदूरको चुनकर शाही महलमें प्रवेश कर देते हैं इसको राजसी भोजन कराते हैं। अन्तमें वही उनकी मलका होती है। इस प्रकार लिखा है कि, अच्छे भोजनके कारण वह मक्खी मोटी ताजी और तेजस्वी हो जाती है। केवल इस भोजनमेंही यह गुण है उसीकी यह प्रशंसा है कि, मजदूरको रानीके स्वरूपका बना देती है। अगस्तके आरम्भमें यह अधिक अण्डे देती है, जब अण्डोंका आधिक्य हो जाता है तो निकम्मी मक्ख-

हीरा पुत्र होनेका आशीर्वाद विषैला सांप, बिच्छू मरानेवाला अजगर

याँकी कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। परिश्रमी मक्खियोंके लिये जाड़ेका कड़ाका असाध्य है। वे सब मिलकर सुस्त मक्खियोंसे यह सलूक करती हैं कि, वह मेहनती मक्खियां निकम्मी मक्खियोंको मार डालती हैं। मधु गूह भन-भनाहटके शब्दसे भर जाता है। सुस्त भरी मक्खियां और चालाक मक्खियां आपसमें लड़ाई करती हैं। परिश्रमी मक्खियां सुस्त मक्खियोंको मार डालती हैं, सुस्त मक्खियोंका उद्योग व्यर्थ होता है। परिश्रमी मक्खियोंके डंक उनके शरीरसे छिदकर पार हो जाते हैं मरे हुओंके पृथिवीपर ढेर हो जाते हैं। बेलकटन साहबके कथनानुसार यह क्रीड़ा स्वभावतः बनैला है।

यह सारा हाल बीटन साहबकी नेचरल डिक्शनरी और दूसरी अङ्गरेजी पुस्तकोंमें पूर्ण रूपसे लिखा हुआ है, यहाँ तो संक्षेपसे लिखा गया है।

जलचर ।

मैं जलके जीवोंकी बुद्धिका वर्णन क्या करूँ, इनकी बुद्धिमानोकी बहु-तेरी बातें लिखी हैं परमेश्वरने इनका खाना पीना पानीही बनाया है यद्यपि वे आखेट भी करते हैं तो भी पानीके भोजनसे पानीही होकर रहते हैं। इनकी बुद्धि स्थलके जीवोंसे कम नहीं है।

घड़ियाल बिल्ली और लोमड़ी—ली साहबने लिखा है कि, एक मनुष्यने अमेरिका देशका भ्रमण करते हुये घड़ियालके बच्चेको पकड़ लिया उसने उसको भली प्रकार पाला। यहाँतक कि, घड़ियाल कुत्तेकी तरह उसके पीछे २ फ़िरा करता था। एक बिल्लीके बच्चेसे उसकी दोस्ती हो गई। न्यूयार्क नगरमें बिल्ली आगके सामने तापनेको बैठती तो घड़ियाल भी उसके समीप जाता उसपर अपना शिर धर कर सो जाता। इस बिल्लीकी जुदाईसे घड़ियाल बहुत बेचैन हो जाता आपसमें साथ रहनेसे प्रसन्न रहते। एक लोमड़ी थी उससे घड़ियाल अप्रसन्न रहा करता था। क्योंकि, लोमड़ी कुछ ऐसे खेल किया करती थी जो घड़ियालको नापसन्द थे इसी कारण उससे रुष्ट रहता था रुष्ट होकर लोमड़ीको दण्ड दिया करता था। पर दण्डदेनेमें अपने मुँहको काममें नहीं लाता था केवल अपनी पूछद्दारा उसको थोड़ा सा दण्ड दे देता था क्योंकि, यदि जोरसे लगाता तो लोमड़ी उसी समय मर जाती।

घरेला घड़ियाल—आक्सफोर्डकी सड़कके पास एक स्त्री रहती थी। उसने एक घड़ियाल पाला था मुँह खोलकर उसको खिलाया करती थी। उस घड़ियालको वह बहुत प्यार किया करती थी उसको वह आगके सामने ठोंकती वह भी घरैला होकर उसके साथ उसके घरमें रहा करता था।

भैंसके यनको पीनेवाला

मानुषी भोगी—मैंने सुना था कि, किसी स्त्रीको एक घड़ियाल नहानेके समय पकड़ ले गया। उसका बस्त्र खुलकर जलमें बह गया वह नङ्गी रह गई। उस घड़ियालने लेजाकर एक जगह किनारे रख दिया। वह स्थान परदे में था वहाँ नदीका किनारा ऊँचा था। दिखाई नहीं दे सकता था घड़ियालने उस स्त्रीके साथ सम्भोग किया। उसको खाया नहीं, वह ऐसा ही किया करता। ऐसा करनेके पीछे वह नदीमें सँर करनेको जाया करता मछली लाकर उसको दिया करता, स्त्री बहुत विवश थी एक सप्ताहके पीछे कई मनुष्योंका शब्द नदी किनारे आने लगा स्त्रीने चिल्लाकर कहा कि, मैं इस दुःखावस्थामें फँसी हूँ, यहाँ आकर मुझको निकालो। उन मनुष्योंने ऊपरसे नीचेको रस्सीके छोरसे इसको कपड़ा दिया वह अपनी जान लेकर अपने घर पहुँची। जिस समय स्त्रीको निकाला गया उस समय मगर नदीकी सँर कर रहा था वहाँ नहीं था।

अगस्तका मछलियोंसे शकुन—प्राचीन कालमें मछलियोंसे शकुन जाना जाता था और यह अनुमान किया जाता था कि, मछलियाँ त्रिकालज्ञ होती हैं। जिस समय सिसली टापूके लोगोंसे लड़ाई होरही थी, उस समय अगस्तस बादशाह समुद्रके किनारे टहल रहा था। उसी समय समुद्रसे एक मछली निकलकर उसके पैर पर गिर पड़ी। उस समय सेकैसे प्राम्पीस बादशाह समुद्री विजयोंसे बहुत घमण्डी हो रहा था अपनेको पेंचिओन देवताका पुत्र मानता था। अगस्तसने ज्योतिषियोंसे पूछा कि, पैरपर मछली गिरनेका क्या मतलब हो सकता है। तो उन्होंने उत्तर दिया कि, समुद्रोंका राजा आपके चरणोंपर गिर पड़ेगा ठीक वैसाही हुआ इस राजाने सेकैसे प्राम्पीस पर विजय पाई।

भूचर मछली—कितने प्रकारकी मछलियाँ घोंसलें बनाती और वृक्षपर चढ़ जाती हैं नदीसे निलककर इतनी दूर २ तक यात्रा करती हैं कि, लोग समझते हैं कि वह आकाशसे गिर पड़ी हैं। इतना हिल मिल जाती हैं कि, लोग अपने हाथसे चारा देते हैं वह भी मनुष्यके हाथमें आजाती हैं। अपने रहनेके लिये अच्छी जगह ढूँढ़ती हैं। उनमें कितनीही बातें बुद्धिमानोंकी पाई जाती हैं।

तूरा—एक प्रकारकी मछली है, लोग जिसको अन्तर््यामिनी समझते हैं। क्योंकि आंधी आती है। जहाज डूबता है तो वह जहाजके पास होती है। डूबते हुये मनुष्यको अपनी पीठपर लादकर स्थलमें बैठकर चली आती है। यह बहुत भली मछली है। मनुष्योंका प्राण बचाती है। मछलियाँ रातको दूर २ की यात्रा करती हैं कभी २ कण्टके समय दिनमेंभी सफर किया करती हैं।

कटल फिश या ईङ्गुफिश—डीवर्डसके टापूमें एक प्रकारकी मछली

होती है । जिसको कटलफिश तथा ईङ्कफिश (स्याही मछली) भी कहते हैं । ईङ्कफिश अथवा स्याही मछली इस कारण कहते हैं कि, उसके गलेके नीचे स्याहीकी एक थैली होती है । उसमें एक मसाला स्याह स्याहीसे भी बहुत काला भरा रहता है । जब मछुये इस मछलीको मारनेके लिये पीछा करते हैं, वह जान लेती है कि, अब मेरा बचना किसी भी प्रकार नहीं हो सकता तो थैलीसे स्याही निकालकर पानीमें फेंक देती है, जिससे सारा जल काला हो जाता है । पानीके काले होनेके कारण मछुओंको नहीं सूझता कि, मछली किधर गई । इस युक्तिसे मछली मछुओंके हाथसे बचकर अपने घर पहुँच जाती है । इसमें चेमेलियन सोंपकी तरह एक और भी गुण है कि, अपना स्वरूप बदल लेती है । क्योंकि, उस स्याहीमें यह छिप जाती है । स्थिर हो जाती है । कुछ कालके बाद जैसे चूहेके पीछे बिल्ली दौड़ती है । इसी प्रकार शिर निकालकर अपनी राह लेती है । वह अपने पीछे स्याही छोड़ती जाती है जिसमें पानी काला होनेसे उसको कोई देख नहीं सकता । उनमें कोई २ तो इतनी बलिष्ठ होती हैं कि, मनुष्यकी बाँह तोड़ देती हैं ।

परवाली शैलानी—एक प्रकारकी परवाली मछली है । वह सोंझको नदीसे निकलकर सारी रात स्थलकी सेंर किया करती है । सबेरा होनेके पहलेही नदीमें घुस जाती है ।

एक और मछली है जिसकी उड़ान इतनी नहीं है । वह थोड़ी देरतकही स्थलकी सेंर कर सकती है ।

ऐङ्गलरफिश या सीडे बिल—एक प्रकारकी मछली है ऐङ्गलर नाम मछुवा और फिश नाम मछली । यह इङ्गलिस्तान और योरोपके समुद्रोंमें होती है । तीन फीटसे भी अधिक लम्बी होती है उसका शिर बहुत बड़ा होता है । उसके मुंहपर दो शाखें होती हैं जिसको वह इच्छानुसार हिलाती है । यह खाती अधिक है पर परिश्रम नहीं कर सकती सुस्त है, खाना तो बहुत है पर परिश्रम किया नहीं चाहती, फिर पेट कैसे भरे । इस कारण कपटको काममें लाती है । ऐसी युक्ति करती है कि, जहाँ वह रहती है वहाँसे कुछ मिट्टी निकालकर पानीमें घोल देती है, जो मिट्टी पानीको गँदला कर देती है । इस गँदले तथा अन्धकार-मय पानीके भीतर वह छिपकर बैठती है कि, किसी मछलीको दिखाई नहीं देती । उसको कोई देख नहीं सकता, पानीके ऊपर उसके पाखोंका नोक थोड़ा थोड़ा २ दिखाई देता है जलपर ऐसा जान पड़ता है कि, मानों छोटी २ मछलियाँ फिरती हों । धूर्तताके इस जालको फँलाकर बैठती है प्रतीक्षा किया करती है कि,

सांपसे खेल चेमर लेन चमर लेन रंगपर मत, विच्छू

कोई मछली उसकी चालमें आवे । कोई दूसरी मछली आई । देखा कि, पानी-पर छोटे २ कीड़े फिरते हैं, वह उनको खाने दौड़ती है बस । उसी समय यह ऐंझलर मछली पानीके नीचेसे निकलकर उस मछलीको चट कर जाती है । इस छलसे अनेक मछलियोंको फँसाया करती है । इस युक्तिसे उसका पेट नहीं भरता तो वीरताको काममें लाती है । मछलियोंको बलपूर्वक पकड़ती है । उसकी पकड़का छूटना कठिन हो जाता है । इसको शरीरका आधा शिर होता है।

धोखेसे बचानेवाली—हनुमानजी सञ्जीवन बूटी लेने गये थे कालनेमि राक्षस रावणकी ओरसे हनुमानजीको धोखा देने मुनि वन मार्गमें बैठ गया हनुमानजीने कालनेमिसे पानी मांगा उसने तालाब बता दिया वहाँ उनका पेर एक मछलीसे छू गया वो अप्सरा होकर स्वर्ग चली गई । उसने हनुमानजीसे कहा कि, महाराज ! मुझे ऋषिने मछली होनेका शाप दिया था, मेरी नम्रता देखकर निवृत्ति भी बतला दी थी कि, राम दूतका चरण स्पर्श होतेही मुक्त हो जायगी । आपके चरण लगजानेसे मेरा शाप चला गया । जिसे आप मुनि मान रहे हैं । यह कालनेमि है आपको धोखा दिया चाहता है । आप इससे सावधान हो जाइये । इतना कहकर अप्सरा चली गई, हनुमानजीने कालनेमिको मार डाला ।

पशु पक्षीके रूपमें ऋषि गण ।

अनेकों सन्त महात्मा ऋषि मुनि पशु पक्षीका रूप धरकर भूमण्डल पर विचरा करते हैं । उनका पशु पक्षीका शरीर इच्छाकृत होता है वो किसीका किया हुआ नहीं होता न ऐसाही है कि, पूर्वके देहको त्यागकर उक्त देह ग्रहण किया हो किन्तु वही देह पशु पक्षीके देहके रूपमें परिणत हो जाता है जब इच्छा नहीं रहती । बहुतसे उच्च कोटिके व्यक्ति भी कर्म वश पशु पक्षियोंकी योनिमें गमन करते रहते हैं पर पूर्वके अभ्यासके बलसे उन्हें स्मरण बना रहता है हृदय प्रकाशित रहता है पर बाहिर नहीं दीखता । इन बातोंके देखनेसे यही विदित होता है कि, “साईके सब जीव हैं कीरी कुंजर होय” सभी भगवानके हैं उसके लिये सब एक समान प्यारे हैं । राजर्षि भरतजीके आवागमनको लेकर कबीर साहिबने भी कहा है कि,

एक मोहके कारणे, भरत धरे दो देह ।

सो नर कैसे छूटि हैं, जिनके बहुत सनेह ॥

यानी एक मोहके कारण भरत दो देह धारण करता है तो वे मनुष्य कैसे छूटेंगे जिनके अनेकों मोहें मौजूद हैं अर्थात् अनेकों मोहँवाले मनुष्य अवश्यही

बादशाह का जहर रेशमका कीड़ा

अनेकों देह धरेंगे । ऋषिही क्यों ? देवगण भी पशुपक्षी तथा जलचर आदिके रूपमें मृत्युलोकमें विचरते हैं तथा कर्म वश आवागमन करते रहते हैं जो जाने सो । दूसरे अज्ञानियोंको क्या पता हो सकता है । ऋषिमुनि ही क्यों, अनेकों मनुष्य देहधारी प्राणियोंके स्वभाव पशुओं जैसे हैं । गोल्डस्मिथ साहिबने लिखा है कि, एक कुटुम्बके सब मनुष्य उगाल किया करते थे । बिना इसके खाना भी हजम न होता था ।

पशु पक्षी आदि जीव धारियोंका भजन ।

सहस्रों ऐसे जीव हैं कि, पशुका रूप पाया है उनकी श्रेष्ठताका वर्णन करना अत्यन्त कठिन है । सहीह बुखारी व मुसल्लभमें रवायत अबूरीरासे है कि—

चींटियोंका भजन—एक बार हजरत मूसाने खुदासे अर्ज की कि—“ऐ परव रदिगार ! तू गुनहगारोंके गॉवको नष्ट करता है पर उसके साथ कितने अच्छे भी होते हैं, वह भी बिना अपराध उसके साथ नष्ट हों जाते हैं ।” उस समय खुदाके पाससे कुछ उत्तर नहीं आया । एक दिन मूसाको गर्मी मालूम हुई जिसको सहन न कर सके, एक हवादार वृक्षके नीचे जाकर बैठ गये । वहाँ एक चींटीने काट लिया मूसाने क्रोधमें आकर सब चींटियोंको आग लगाकर जला दिया उस समय खुदाने कहा कि हे मूसा ! तू अपनी ओर नहीं देखता कि, एक चींटीके अपराधके कारण सब चींटियोंको जला दिया । यद्यपि ये सब चींटियाँ भजनमें निमग्न हो रही थीं ।

मूसा और पक्षी—किसी दूसरी किताबमें देखा था कि, मूसाको अपने भजनका बड़ा अहंकार था, एक साँसमें चारसौ नाम जपता था । एक दिन जंगलने वृक्षके नीचे बैठा था झरना बह रहा था । मूसाकी दृष्टि वृक्ष पर गई । देखा कि, एक पक्षी बैठा है, वह एक स्वासमें चार हजार नाम लेता है, उसको देखतेही मूसाका अभिमान जाता रहा उस पक्षीसे कहा कि, कुछ सेवा बतलाओ ? पक्षीने कहा कि पानी पिलाओ मूसाने नीचे चशममें पानी दिखा दिया । पक्षीने पानीके ऊपर दृष्टि डाली पर भजनसे निवृत्त हुए बिना पानी पीनेको न उतरा । सामवेद सम्बन्धी किसी पुस्तकमें पशुओंके भजनके विषयमें जो सुना था । वो यहाँ लिखे देता हूँ—

बकरी—भजन करती है कि, हे प्रभु ! मुझको मेरे शत्रुओंसे बचा, मेरा कल्याण कर । वारम्बार उसका यही भजन और आशीर्वाद है ।

तोता—वह भजन करता हुआ कहता है कि, हे प्रभु ! मैं तेरा कृतज्ञ

हूँ, क्योंकि तूने मेरा रंग हरा और चौंचे लाल बनायी है, माधव २ कहके मैं तेरा भजन करता हूँ।

भेड़—वीर २ कहकर पुकारती हैं कि, हे परमेश्वर ! मैंने क्या अपराध किया है कि, मैं विष्ठा खाती हूँ, हे प्रभु ! मुझको बचा ।

बैल—भजन करता है कि, ऐ मेरे उत्पन्न करनेवाले ! ऐ मेरे उत्पन्न करनेवाले परमेश्वर !! मुझको इस योनिसे मुक्त कर ।

चील्ह—भजन करती है कि, परमेश्वर ! न तेरा जन्म है न मरण, न तू कभी जाता है न आता है, तू सबका कल्याण कर्ता है । यह निरङ्कार निरङ्कार करके भजन करता है ।

पशुओंके भजनका वर्णन कौनकर सकता है ? सब गुप्तमें ईश्वरके भजनमें लगे रहते हैं, प्रगट भी उन लोगोंकी बोलीसे जान पड़ता है कि, सब भजन कर रहे हैं । जैसे तोता बोलता है तूही तुही तुही । पण्डुक बोलती है तू तू तू । मोर बोलता है या कयूम । सारस बोलती है या अजीज ।

कलगीदार छोटी चिड़या —जो गौरयेंसे भी छोटी होती है, उसके शिर-पर कलगी होती है और जहाँ आदमी कम आते जाते हैं, उजाड़ होती है वहाँ रहा करती है । उसका मुख्य भोजन सूखी और नरम मिट्टी है । कभी कभी खरबूजा आदिकका बीज मिलजाय तो उसे भी खाती है । यह पक्षी ऐसी निर्भय होती है कि, मनुष्य उसके निकट फिरा करे तो भी नहीं डरती, यह रात-भर भजन किया करती है । उसका शब्द है—तुही तुही निरङ्कार-तुही तुही निरङ्कार, पहर रात शेष रह जाती है ब्रह्म मूहूर्तका समय होता है । तो पृथ्वी और वृक्षको छोड़कर आकाशमें उड़ा करती है और “तुही निरङ्कार तुही निरङ्कार” ऐसा शब्द सूर्य निकलने तक किया करती है । दिन निकल आता है, थककर पृथ्वीपर गिर पड़ती है बहुत देर तक अचेत पड़ी रहती है, मुर्दोंके समान शरीरका कुछ भी चेत नहीं रहता, यहाँ तक कि, यदि किसी मनुष्य अथवा पशुके पगके तरे दब जाय अथवा कोई हिंसक पशु खा जाय तो भी कुछ चेत नहीं करती । कहते हैं कि, यदि कुत्ता उसको खाजाय तो पागल हो जाता है । वह अचेतसे सचेत होती है तब फिर अपने नित्यके भजनमें लग जाती है । ऐसे भजनानन्दीके समक्ष मनुष्योंका तपस्या कुछ नहीं है । यह पक्षी उजाड़में छोटे २ जलके डबरोंके किनारे रहती है उसका जल सूख जाता है तो उसकी नरम २ मिट्टी खाती है ऐसे समयमें भजन करती है कि, जिस समय तपस्वी और ताधु लोग नींदके वशमें पड़के अचेत सोये होते हैं । यह सत्य पुरुषकी ओरसे भजना-

गिरगिट, मकड़ी चींटी, परवालियोंमें बादशाह और बेगम

नन्दियोंके भजनके अभिमानका नष्ट करनेके लियेही उत्पन्न की गई है । कबीर साहिबने नींदको यमकी दासी बताया है कि—

साखी— निन्द कहे मैं यमकी दासी ।

एक हाथ मुँगरा एक हाथ फाँसी ॥

भजनानन्दी बछड़ा—मैंने सुना था कि, पञ्जाब जिला रोहतक बाँगर देशमें संवत् १९३६ में गायका बच्चा पैदा हुआ वह । उगाल भी करता था । राम राम भी कहता था, उसके राम रामके कहनेको सुनकर लोग बहुत भेंट चढ़ाते थे ।

समय—जब एक पहर रात रह जाती है, तब सब जीवधारी परमात्माके भजनमें लग जाते हैं । कोई आधी रात कोई कोई सारी रात भजनमें लगे रहते हैं, परमेश्वरके अनन्त नाम हैं, उनमेंसे कोई न कोई नाम जपते रहते हैं ।

सोप—कभी २ देखा गया है कि, सोप सूर्य निकलने पर छतरीको फैलाकर हिलाता है ।

शिवका जपी—एक पक्षी गौरैयाके बराबर होता है वह दिनरात उच्च शब्दसे शिव २ कहा करता है ।

चिनगीबटेर—एक दूसरा पक्षी बटेरसेभी छोटा होता है वह भी शिव २ कहता अनुमान किया गया है इसको चिन्गीबटेर कहते हैं, यह उत्तर पहाड़में हुआ करती है । एक समय पहाड़से उसको कोई फिरोजपुरमें लाया पिंजड़ेमें रक्खा, उसकी बोलीपर बहुत लोग मोहित हो गये, उसको सब लोग प्यार करने लगे, जिसके पास वह पक्षी था उसको बड़े विनयके साथ अपने घरको ले जाया करते पक्षीकी मीठी २ बोली सुना करते । यह भजन करनेवाला पक्षी सबको प्यारा लगता था । मैं सर्वदा इस पक्षीकी बोली सुना करता था । दिनमें तो उसकी बोली सुनाई नहीं देती । शर्दीके दिनोंमें भी यह विशेष नहीं बोलती, शेष दिनोंमें जोर २ से शिवजी शिवजी पुकारा करती थी । यह पक्षी मेरे निवास स्थानसे पचास कदम की दूरी पर रहती है उसका नाम जपनेका सुनकर मुझे बड़ा आनन्द प्राप्त होता था । इस पक्षीको परमात्माने जैसा अनुराग भजनका प्रदान किया है वैसे बहुत कम भजनीक मिलेंगे ।

ऐसी एक दूसरी पक्षीको सुना कि, वह शिव शब्दको बड़े लम्बे और ऊँचे शब्दसे कहा करती थी ।

बोलियोंके अर्थ—एक पक्षी बोलती है—या बटूह ! या बटूह ! एक बोलती है, पिता पिता । एक पक्षी कहती है अजीज ! अजीज ! बाढ़ बुला