कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंहोती है । जिसको कटलफिश तथा ईङ्कफिश (स्याही मछली) भी कहते हैं । ईङ्कफिश अथवा स्याही मछली इस कारण कहते हैं कि, उसके गलेके नीचे स्याहीकी एक थैली होती है । उसमें एक मसाला स्याह स्याहीसे भी बहुत काला भरा रहता है । जब मछुये इस मछलीको मारनेके लिये पीछा करते हैं, वह जान लेती है कि, अब मेरा बचना किसी भी प्रकार नहीं हो सकता तो थैलीसे स्याही निकालकर पानीमें फेंक देती है, जिससे सारा जल काला हो जाता है । पानीके काले होनेके कारण मछुओंको नहीं सूझता कि, मछली किधर गई । इस युक्तिसे मछली मछुओंके हाथसे बचकर अपने घर पहुँच जाती है । इसमें चेमेलियन सोंपकी तरह एक और भी गुण है कि, अपना स्वरूप बदल लेती है । क्योंकि, उस स्याहीमें यह छिप जाती है । स्थिर हो जाती है । कुछ कालके बाद जैसे चूहेके पीछे बिल्ली दौड़ती है । इसी प्रकार शिर निकालकर अपनी राह लेती है । वह अपने पीछे स्याही छोड़ती जाती है जिसमें पानी काला होनेसे उसको कोई देख नहीं सकता । उनमें कोई २ तो इतनी बलिष्ठ होती हैं कि, मनुष्यकी बाँह तोड़ देती हैं ।
परवाली शैलानी—एक प्रकारकी परवाली मछली है । वह सोंझको नदीसे निकलकर सारी रात स्थलकी सेंर किया करती है । सबेरा होनेके पहलेही नदीमें घुस जाती है ।
एक और मछली है जिसकी उड़ान इतनी नहीं है । वह थोड़ी देरतकही स्थलकी सेंर कर सकती है ।
ऐङ्गलरफिश या सीडे बिल—एक प्रकारकी मछली है ऐङ्गलर नाम मछुवा और फिश नाम मछली । यह इङ्गलिस्तान और योरोपके समुद्रोंमें होती है । तीन फीटसे भी अधिक लम्बी होती है उसका शिर बहुत बड़ा होता है । उसके मुंहपर दो शाखें होती हैं जिसको वह इच्छानुसार हिलाती है । यह खाती अधिक है पर परिश्रम नहीं कर सकती सुस्त है, खाना तो बहुत है पर परिश्रम किया नहीं चाहती, फिर पेट कैसे भरे । इस कारण कपटको काममें लाती है । ऐसी युक्ति करती है कि, जहाँ वह रहती है वहाँसे कुछ मिट्टी निकालकर पानीमें घोल देती है, जो मिट्टी पानीको गँदला कर देती है । इस गँदले तथा अन्धकार-मय पानीके भीतर वह छिपकर बैठती है कि, किसी मछलीको दिखाई नहीं देती । उसको कोई देख नहीं सकता, पानीके ऊपर उसके पाखोंका नोक थोड़ा थोड़ा २ दिखाई देता है जलपर ऐसा जान पड़ता है कि, मानों छोटी २ मछलियाँ फिरती हों । धूर्तताके इस जालको फँलाकर बैठती है प्रतीक्षा किया करती है कि,