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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

तीसरी किताब इजीलका वृत्तान्त

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धर्मदास वचन— चौपाई ।

हाथ जोरिके टेकेउ पाऊ । साहब कहौ तहवौ कर भाऊ ॥
कहौ लोककी बात बिचारी । जहैलौ दीप करी विसतारी ॥
बरनौ दीप गुप्त अनुसार । बरनौ जहैललिग सकल पसारा ॥
बरनौ सोरह सुतकर भाऊ । तिनको फिर कैसे निरमाऊ ॥
पुरुष स्वास जेता अनुसार । ताकर कहो सकल विसतारा ॥
केहि विधि सोरह सुत परगासा । कहो केही कहाँ रहिवासा ॥
कहो बिस्तार सकल अस्थाना । सत्यलोक और जमके थाना ॥
कैसे निरगुन परभुहि कीन्हा । कैसे पांच तत्वको चीन्हा ॥
कैसे आदि अन्त प्रभु कीन्ही । कैसे रची देहकर चीन्ही ॥
कैसे भय निरंजन राया । कैसे तीन लोक निरमाया ॥
कैसे उपजन विनशन कीन्हा । काह जान बाजी जम दीन्हा ॥
कैसे चित्त अचित्त तन दीना । कैसे जीव सीव कर लीना ॥
कैसे इन्द्दी देह बनाई । कैसे जीव परा बसि आई ॥
कैसे जीव अपन पौ दरसे । कैसे जीव पुरुष पग परसे ॥

सयय—काया मध्ये स्वास है, स्वासा मध्ये सार ।

सार शब्द बिचारिके, साहब कहो सुधार ॥

सतगुरु वचन— चौपाई ।

कहै कबीर सुनो धर्म दासा । अहंकार जस कीन तमासा ॥
अहंकार कीन यकं थाती । तासे होय दिवस अरु राती ॥
बाजीगर यह जाल पसारा । धंधे लाय दियो संसारा ॥
काम क्रोध लालच अरु मोषा । जाल पसार सगरो ये धोखा ॥
एती जाल पास संसारा । विरला गुरु मुख उतरे पारा ॥
धरमदास जो पूछेहु आई । आदि अंत सब कहों बुझाई ॥
कहों लोक लोककी बानी । कहों पुरुष सुतकी उत्पानी ॥
कहों संदेश दया करि तोही । भुक्ति जानि जो पूछहु मोही ॥
सुनहुँ संदेश आदि निरबाना । जाके सुनत काल छै माना ॥
सुमिरहु आदि पुरुष दरबारा । सुमिरत आप हंस होय पारा ॥
समय—तीन लोकके भीतरे, रोकि रहो जम द्वार ।
वेद शास्त्र अगुवा कियो, मोह्यो सकल संसार ॥

चौथी किताब कुरानका वृत्तान्त आठ वेदोंका वर्णन, निरञ्जनका पंथ

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चौपाई ।

धरमदास चित्त चेतहु जानी । कहों बुझाय अगरकी खानी ॥
पुरुष अजावन रहे विदेहा । तत्त्व बिहीन सुरति सनेहा ॥
चारि करी सिंहासन जोरा । पांचऐँ आप मध्य अंजोरा ॥
चारि करी चारिउ परवाना । स्वाती युक्त भीतर अकुलाना ॥
समय-करी करी महा परिमल, वास सुवासकी खानि ।
तेज करीन परगट भई, चिता आनि समानि ॥

चौपाई ।

पुरुष आंचित चिता जब कीन्हा । उपज्योशब्द सुरतिको चीन्हा ॥
रहे गुप्त परगट भई काया । स्वासा सार शब्द निरमाया ॥
शब्दहिते है पुरुष अस्थूला । शब्दहिते है सबको मूला ॥
शब्दहिते बहु शब्द उचारा । शब्दै शब्द भया उजियारा ॥
शब्दहिं पारस शब्द अधारा । शब्दहिते भौ सकल पसारा ॥
शब्दहिं रूप गुरु कर धारा । सोई शब्द जिवके रखवारा ॥
प्रथम शब्द भया अनुसार । निहतत्त्वी यक कमल सुधारा ॥
नीहतत्त्वीपर आसन कीन्हौ । रचना रची सकल तब लीन्हौ ॥
रच्यौ पुहुप रचना मनि भारी । सहस्र अठासी दीप सुधारी ॥
अच्छै वृक्ष एक रचा बनाई । अग्रवास तहैं रही समाई ॥
समय-पेड पात रस फूलमें, प्रगटी वास अनूप ।

पारस गिहतत्त्वहि पुरुष, सुरति हंसको रूप ॥

पेड पात फल फूलमें, प्रगटी वास अनूप ।

प्रसन्न होत निहतत्त्व पुरुष, सुरति हंसको रूप ॥

चौपाई

जब पारस सुरति भये स्थाना । अगर प्रताप निमिष उरआना ॥
पुहुप प्रसन्न होत उजियारा । स्वासा पारस बचन सुधारा ॥
पुरुष प्रसन्न नाम उच्चार । श्वासापर सब रचनि सुधारा ॥
स्वासा पार शब्द गुँजारा । पांच अमीको भयो बिस्तारा ॥
पांच अमीको जो विसतारा । ताहि अमी सब लोक सुधारा ॥
स्वासा पुहुप अगरकी खानी । सोलह सुतकी भई उत्पानी ॥
पांच अमी साहबके अंगा । पांचों तत्त्व ताहि परसंगा ॥
स्वासा नेह सबै उपजाया । बानी बानी बरन बनाया ॥

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सत्य सार सबहिनको मूला । भयऊ सत्य सो सब अस्थूला ॥
स्वासासार सत्य कर भाऊ । अमी आदि उपजी तेहि नाऊ ॥
सत्यसार स्वासा संभारी । अमी आदि पारस तहैं धारी ॥
स्वासा आदि सुरङ्ग बखाना । रंग अमीकर भा बंधाना ॥
स्वासा अजर नाम अनुमाना । परगट अमी सो कहों सुजाना ॥
अदल नाम स्वासा परकाशा । उपजी अमी अमान सुबासा ॥
स्वासा निरञ्जन भया अनुसार । अधर अमीका भा विस्तारा ॥
स्वासा पांच परगट विस्तारा । पांच अमीको भयो पसारा ॥
पांच अमी पांचों अधिकारा । पांचों तत्व तेहि संग सुधारा ॥
पांच अमी सब लोक पसारा । पांचों तत्व गुप्त अनुसार ॥
समय-पांच अमीते पांच भये, पांच नाम अधिकार ।
सनै सनैही सब भया, अमी तत्व विस्तार ॥

चौपाई

सोरह स्वासा सार सुहाया । सोरह सुतकी प्रगटी काया ॥
सोरह सुतकी सोरह नाला । एकते एक अमान रिसाला ॥
पुहुप नाम स्वासा अनुसारि । उपजी सुरति हंसपति भारी ॥
सुरति समानी प्रभुकी देहा । बाहर भीतर एक सनेहा ॥
पांच अमीकी प्रकटी देहा । सुरति कीन्ह तेहि मांहि सनेहा ॥
जेतिक पुरुष खान निरमाया । पांच अमीते सबकी काया ॥
पांचों अमी सुरतिके अंगा । नाल सात उपजी तेहि संग ॥
सात नाल संग एकै भाऊ । सातो सुरत पुरुष परगटाऊ ॥
सात नालकर एके भाऊ । सातौं रहै पुरुषके ठाऊ ॥
पुरुष सुरति कहैं अगुवा कीन्हा । सातौं नाल सौंप तेहो दीना ॥
सातौं नाल सुरति जब पाई । ताहि नालमों रही समाई ॥
छिन बाहर छिन भीतर आवै । देह विदेह दोऊ दरसावै ॥
अमरतार निःअच्छर कियेऊ । सोऊ पुरुष सुरति कह दियेऊ ॥
सत्तपुरुष निज सुरति सनेही । पारस आदि रची सबदेही ॥
समय-अधर निहछर संग लिये, सेत ध्वजा फहराय ।
पलटि समानि सुरति पुरुष, रहि सो अछप छिपाय ॥

सोलह सुतकी उत्पत्ति-चौपाई ।

सुरत सनेह प्रभु इच्छा कीन्हीं । सोरह सुत उपजावे लीन्हीं ॥

आदि भवानी आद्याका पन्थ ब्रह्माका पंथ, विष्णु और शिवकापंथ

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सत्यसार स्वासा अनुमाना । सुकृत अंस भये अगुआना ॥
दुसरी स्वासा बाहर आई । उपजे सहज सून्य तिनह पाई ॥
तिसरी स्वासा पुहुप सनेही । तेहिंते भई हमारी देही ॥
चौथी स्वासा तेज सनेहा । तेहिंते भई धरमकी देहा ॥
पांचें स्वासा नाम खुमारी । उपजी कन्या आदि कुमारी ॥
शील नाम स्वासा निरमयऊ । छठयें अंसं सुजन जन भयऊ ॥
सतमें स्वासा नाम अनंगा । उपजे अंश भृंगीमुनि संगा ॥
अठवें स्वासा नाम सुहेली । उपजे कूर्म सीस उर मेली ॥
नवमें स्वासा नाम सोहंगी । जाते उपजे सुत सरवंगी ॥
दसएँ स्वासा नाम रसीला । जाते उपजे सरवन लीला ॥
ग्यारहें स्वासा नाम सुरंगा । सुत स्वभाव उपजे तेहि संगा ॥
बारहें स्वासा नाम सुमाहा । भाव नाम सुत उपजे ताहां ॥
तेरहें स्वासा अछय सुभाऊ । उपजे सुत विवेक तेहि नाऊँ ॥
चौदह स्वासा अमर बंधाना । उपजे सुत संतोष सुजाना ॥
पंद्रहे स्वासा प्रेम सनेहा । उपजी कदल ब्रह्मकी देहा ॥
षोडशे स्वासा नाम जलरङ्गी । उपजे दयापालना सङ्गी ॥
षोडश स्वासा षोडश बानी । उपजे जोगसंतायन ज्ञानी ॥
सोलह स्वासा नाम बखाना । उपजे सोलह सुत निरवाना ॥
सोरह सुत कर एकै मूला । भिन्न भिन्न प्रगटी अस्थूला ॥
एके प्रीति एकै व्यवहारा । सबही रहैं पुरुष दरबारा ॥
एक पाँवते सेवा करहीं । पुरुष वचन शीशपर धरहीं ॥
सेवा करें रहैं लौलीना । पुरुषलोकते होहि न भीना ॥
सेवा करें समाधि लगावैं । पुरुष लोक तजि अनतन जावैं ॥
कहैं कबीर सुनो धर्म दासा । यहि विधि सोलह सुत परगासा ॥
समय-सोरह सुतकी एक मति, एकत एक अधीन ।
कर जोरें सेवा करें, प्रेम प्रगति लौलीन ॥


१ पाठभेद=तेरहें स्वासा अछय सुधारा । ताते सुत विवेक औतारा ॥

२ भाव यह है कि-सोलहों मिलकर जोग संतायन हुए । कहीं कहीं “सतरहें स्वासा अदल सुवानी । उपजे योग संतायन ज्ञानी ॥” लिखा है-किन्तु जब पूर्वापर सब जगह “सोलह सुत” बराबर लिखते जाते हैं तब सत्रवाँ लिखना असंगत है । इसके अतिरिक्त जब स्पष्ट लिखा है “षोडस स्वासा षोडश बानी । उपजे जोगसंतायन ज्ञानी” तब तो सत्रहवें सुतकी कल्पनाकी जड़ मिटकर स्पष्ट सिद्ध होता है कि, सोलहोंके समूहका नाम है “योगसंतायन” और है भी ऐसाही-योगसंतायनमें सबकेही लक्षण पाये जाते हैं । स्पष्टीकरण कबीर धर्मदर्शनमें होगा ।

३ किसी किसी प्रतिमें “वचन” के बदले “चरन” लिखा है, यद्यपि उससेभी आज्ञाकारिता का भाव निकलता है किन्तु “वचन” से विशेष गूढार्थ प्रकट होता है ॥ - श्री युगलानन्द विहारी ॥

विष्णुका पंथ प्रथम श्री सम्प्रदायके धाम क्षेत्रका वृत्तान्त ब्रह्म संप्रदायके धामक्षेत्रका वृत्तान्त

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चौपाई ।

सेवा करत बहुत दिन गयऊ । पुरुष अवाज अधर धुनि भयऊ ॥
अधर अवाज भई जब बानी । निकसी अगर बासकी खानी ॥
सबतर लोक दीप रहि छाई । बिमल बास भरपूर समाई ॥
अगर बास सब हंसन पाई । निर्मल बास सदा सुखदाई ॥
पीय अमृत सबै अधाने । अपने अपने लोक सिधाने ॥
और पुत्र सब अच्छप छिपाये । धरम धीर सबते बरियाये ॥
धरमराय सेवा अधिकाने । सो सब तोहि कहौं सहिदाने ॥
छलके बचन पुरुष सो लीन्हा । पाछे दुदैं लोक महैं कीन्हा ॥

समय—और सबै सुत बैठे, अपने अपने थान ।

धरम रोष सबते कियो, ठाँम ठाँम विगरान ॥

धर्मदास बचन—चौपाई ।

धर्मदास बिनवै कर जोरी । साहब संसय मेटहु मोरी ॥
और सब सुत अच्छप छिपाने । धरमराय कस भये बिगाने ॥
कैसे और सबे सुत भारी । धरमराय कस भये विकारी ॥

सतगुरु बचन ।

धर्मदास सुनहुँ चितलाई । कहौं सँदेश आदि समझाई ॥
जब प्रगटे प्रभु अम्मर तारा । निकसी अधर निअच्छर धारा ॥
भई अवाज अधरसे बानी । निकसी अगर वासकी खानी ॥
पारस परिमल महक बसाई । सोई परिमल सुरति दुराई ॥
अगर छिपाय आप महैं राषा । सुरति सनेह मुख प्रगटी भाषा ॥
प्रथम पुरुष मुख भाषा आई । भाषा अग्र पारस निरमाई ॥
भाषा बचन भया अधिकांश । भाषहिंते सकलो विस्तारा ॥
भाषा बचन पुरुष उच्चार । भाषा ते सकलो व्यवहारा ॥
भाषा बोल पुरुष उच्चार । सेवहु सत्यलोक के द्वारा ॥
स्वैसा सार तार जुरियाना । अधर अमान ध्वजा फहराना ॥
भाषा स्वर बानी अनुमाना । बचन समान शब्द बन्धाना ॥
निमिष माहिं अनेक संचारा । बचन समान सबै जग सारा ॥
नाम सनेह शब्द मँझारा । बचन समान स्वास गुञ्जारा ॥
स्वासा नेह देह भइ जबही । भाषा सहज बचन भा तबही ॥

चौथे सनकादिक संप्रदायका वृत्तान्त चारों भाईके धाम क्षेत्रका वृत्तान्त वैष्णव धर्मकी श्रेष्ठता शांकरी संप्रदायका वृत्तान्त

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आगेकी उत्पत्ति ।

प्रथम श्वासकी निकसी खानी । उपजे सुक्रित सीतल बानी ॥
निमिष नेह प्रसन्न सुर धारे । नाम मूल टकसार उचारे ॥
भो बिस्तार निमष गड़ छूटी । दुह चित मूल अवस्था लूटी ॥
मूल गुप्त मस्तक नहिं देखा । आदि नाम अमर घर लेखा ॥
पेड़के गहे मूल धुन जागा । सोई मूल फूल फल लागा ॥
पेड़हिं गहे मूल और साखा । मूल मिले तर्वाहिं रस नाखा ॥
गुप्त मूलते प्रगटी साखा । पल्लव मूल पेड़ गहिं राखा ॥
पेड़ देखि पल्लव फँलावै । पल्लव फँल अंत नहिं पावै ॥
पल्लव चढे पेड़ चित राखा । मिले मूल तब फल रस चाखा ॥
आदि अन्त दुइ पेड़ समाना । आपहिं राख आप पहिचाना ॥
जागी सुरति पुनि पेड़ निहारा । फल रस चाख बीज गहिं डारा ॥
बीजहिं ते सो फल होई । फल रस लेइ मूल तजि छोई ॥
जागि सुरति सपन मिटि गयऊ । दुई चित मेटि एकचित भयऊ ॥
दूजे स्वासा प्रभुकी देहा । उपजे सहज समाधि सनेहा ॥
तिसरे स्वासा फूल सनेही । जाते भई हमारी देही ॥
स्वास सार संग गुप्त सनेही । देही माँही रहे विदेही ॥
काया अविहर अविहर वासा । सोई परगट गुप्त निवासा ॥
कायामे काया रहिवासा । तब चौथे स्वासा परकासा ॥
चौथे स्वासा निकरे चाहा । तब चिता उपजी मनमाहा ॥
चिता प्रकट भई दिल जबहीं । आपते आप भूलाने तबहीं ॥
आपु शरीर आपु तब झाँका । विमल प्रकाश उदित तनताका ॥
कायारूप भई उजियारी । निरमल देह विमल तन भारी ॥
विमल प्रकाश किरन जब देखा । बरतन बनै न तनको लेखा ॥
विमल प्रकाश किरन जब फँला । का बरने कोई ताकर सैला ॥
कला अनंत अंत नहिं पावा । बरतन जिह्वा लच्छ न आवा ॥
देखत रूप लीला अधिकारी । आप अपन पौ कीन्ह बिचारी ॥
कमल करी महँ भा उजियारा । देखा आदि अंत विस्तारा ॥
आपु बरन सब देखा जबहीं । दुबिधा रूप झाँइ भइ तबहीं ॥
कमल झांक प्रभु देखा जबहीं । हमर रूप को दोसर अबहीं ॥
इतना कहत बार नहिं लाये । निकसि कमलते बाहर आये ॥
छाड़ि कमल प्रभु भये निनारा । तबहीं कमल भया अंधियारा ॥

शांकरी संप्रदायसे मिलते और पन्थ

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कमल झोंकि देख्यो सब न्यारा । भये तिमिर तन तेज अपारा ॥
अंधकार प्रभु देखा जबहीं । काया जोति मलिन भई तबहीं ॥
निमिष एक चित संसय आवा । निमिष एक आनंद समावा ॥
पल सनेह चित संसे आवा । निमिष एक चित हरष समावा ॥
मूल समाधि निमिष ठरि गयउ । जागी सुरत सुपन मिट गयऊ ॥
विस्मय हरष दोऊ एक ठाऊँ । एक पुरुष कर दोऊ सुभाऊ ॥
आपु आपहिं भया अतिचारा । तेही औसर बचन उचारा ॥
उठि अवाज शब्द सतभाऊ । कमल मध्य कस सून्य रहाऊ ॥
घटही वचन आप संधाना । तब चौथी स्वासा बंधाना ॥
तेज पुंज भी गरभ सरीरा । फूँकी नाल देह बल बीरा ॥
कमलनाल धरि फूँका जबहीं । चौथा स्वासा निकसा तबहीं ॥
फूँका कमल तेजके नेहा । चला प्रसेव पुरुषको देहा ॥
फूँकत कमल बार नहिं लागा । भया उजियार तिमिर सबभागा ॥
कारन काल कपट यह धोखा । दुइ चित मूल तेजमैंह रोखा ॥
चौथा स्वासा विषय सनेही । मोह विकार धरमकी देही ॥
मोह विकार तिमर अधिकारा । ता संग भये धरम औतारा ॥
तिसरा स्वासा गुप्तहिं राखा । जाते जोर निरंजन भाखा ॥
फूँकत कमल तेज झरि गयऊ । तेहिंते काल ज्योति धरिभयऊ ॥
जोति जहाँ लगिज्वालाभाखा । तेहिं ते नाम निरंजन राखा ॥
महाबली देही धरिके बैठा । जाने धरममहीं हौं जेठा ॥
तेज लगन स्वासा अनुसार । ताते धरमराय बरियारा ॥
तेज तिमिर संग शून्य निवासा । सबतर भयो काल परगासा ॥
निराकार आकार धराये । जोति काल बहु नाम कहाये ॥
चौदह द्वार काल जो भाखै । सुनि सों सबै नाम मन राखै ॥
सांकित अंड भयो प्रचंडा । फूटत अंड भयो कहु खंडा ॥
चौदह बुन्द अमि ठरि गयऊ । चौदह अंस ताहिंते भयऊ ॥
चौदह पौरिया द्वार बैठारा । इन चौदह बहु ज्ञान पसारा ॥
आप समान सबै रचि राखे । चौदह कोटि ज्ञान तिन भाखे ॥
चौदह अंस धरम तहैं पाये । ते चौदह विद्या पौ लाये ॥
वही चौदहो अगम अपारा । तापर काल धरम बटपारा ॥

भवसागर

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धरम समाधि चितही जम धारा । चौदह मांहि चोर कुतवारा ॥
ताकी कला कहै को पारा । जेहिंके सुत कोटिन उजियारा ॥
कोटिन कला करै बहु भारी । आपहिं पुरुष आपहीं नारी ॥
आपहिं वेद आपही बानी । आपहिं कोटिन ज्ञान बखानी ॥
आदि अजर अवगाह कहावै । मूल नाम गहि धोख लगावै ॥
नाना ज्ञान कथे बहु बानी । प्रकटो आदि आप गुन जानी ॥
कहाँ लगि कहीं कालके भाऊ । वहतो काल बहु नाम धराऊ ॥
मुरति सरोतर जागे नाहीं । मनमथ पवन चंचला ताहीं ॥

धर्मदास बचन—चौपाई ।

धरमदास विनवै चित लाई । समरथ मोहि कहो समुझाई ॥
अहाँ दास विनवौं कर जोरी । दया करो प्रभु बन्दी छोरी ॥
धरमराइ उत्पनि जस पाई । तेज पाइ भया वरियाई ॥
ऊपजै तस भये कसाई । उपज्यो चित चंचल दुखदाई ॥
पुरुष तेज जब शून्य संचारा । ता संग भया धरम औतारा ॥
शील विकार सहित तन पाई । प्रथमें भक्ति दूजे अन्याई ॥
भक्ति कियसि जब रहा अकेला । अधाके संग भया अपेला ॥
सो अधा उन कैसे पाई । कहि विधि पुरुष ताहि निरमाई ॥
साहब कहौ भेद समुझाई । कैसे कन्या पुरुष बनाई ॥
कैसे धरमराय तिहिं पाई । तौन भेद तुम कहो गुसाई ॥
कहौ विचारि दोऊ कर भाऊ । दुइ कर जोरिके बन्दों पाँऊ ॥

सतगुरु बचन ।

धरमदास मैं तुम्हे लाखावों । आदि अन्त सब भेद बतावों ॥
चौथे स्वासा संग अधिकारी । सून्यते जगो भई उजियारी ॥
पुरुष कमलपर बैठे आई । गई गरम उपजी शितलाई ॥
पुरुष कमलपर बैठे जबहीं । परिमल उदित भया तन तबहीं ॥
शीतल पवन सोहागन खानी । मूल कमलपर आसन ठानी ॥
सिंहासनपर सो सत्य विराजे । पारस नेह देह महाँ गाजे ॥
पारस तेज भया तन माही । पँचऐं स्वासा उपजा ताही ॥
उपजत स्वासा देह निहारा । तन परसेव भौ मैल निनारा ॥
काया मैल पुरुष जब जाना । मीजी मैल अबला बलठाना ॥
गएउ तेज भा अबल शरीरा । पाछैं भयो स्वास गंभीरा ॥

बन्धन प्रथम भागके प्रथम अध्यायका उपसंहार

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तेहि स्वासा सँग पारस भारी । कायाते मथि मैल निकारी ॥
तनते मैल काढ़ि प्रभु लीन्हा । सोई मैल रचि पुत्री कीन्हा ॥
करि पुत्री कर ऊपर लीन्हा । उपज्यो प्रेम सहजका चीन्हा ॥
भई पुत्री प्रभु देखा जबहीं । सुरत कीन्हा पारसको तबहीं ॥
निर्मल पारस स्वासा पाँचा । रहो समायी मैलके साँचा ॥
आप मैलते स्वासा कीन्हा । पैठी सुरति रंग तेहि दीन्हा ॥
देके रंग बरन सब फेरा । भीतर मैल मोह मद घेरा ॥
ऊपर सोभा रंग बनावा । भीतर लाल रंग वह छावा ॥
ऊपर सोभा बहुत रंगाई । भीतर आस ललित रुचि छाई ॥
पांच अमीकर पांच सुभावा । पांच तत्त्व तेहि संग बनावा ॥
पांच अमीते पुरुष सरीरा । ताते पांच तत्त्व भए धीरा ॥
पांच अमीते तत्त्व बनावा । पांच अमी तेहि सँग निरमावा ॥
पांच तत्त्व पांचो बेवहारा । तेहिंते भवउ सकल विस्तारा ॥
पुरुष मैलते पुत्री कीन्हा । पांच तत्त्व तेहि भीतर दीन्हा ॥
आप सुरति ते पुत्री कीन्हा । पांच कर गुन भीतर दीन्हा ॥
भीतर बाहर तत्त्व पसारा । पांचों तत्त्व रंग अधिकारा ॥
पांच रंग तत्त्व की धारा । पांचों तत्त्व रंग बहु सारा ॥
पांच तत्त्व पांचों रंग भारी । पांचों रंगते कला प्सारी ॥
तत्त्व रंगते लीला धारी । पांच तत्त्व पांचों रंग सारी ॥
तत्त्व रंग बहु लीला धारी । पुत्री बहुत बिचित्र सँवारी ॥
तासु कला अनंत पसारी । ताते बहुत भई विस्तारी ॥
वरनि न जाव रूप उजियारी । सुन धर्मनि मैं कहैं विचारी ॥
कलाअनंत प्रभु पुत्री कीन्हा । पारस सार ताहिमें दीन्हा ॥
उत्पति पारस पुत्री पावा । प्रगटी कला अनंत सुभावा ॥
नखसिख देह सिध प्रभु कीन्हां । पँचई स्वासा भीतर दीन्हां ॥
जब स्वासा काया महँ आई । प्रगटी ज्योति जगामग झाई ॥
आठो अङ्ग बना बहुत रंगा । पारस सार ताहि के संग ॥
निर्मल उदित ताहि सो दंता । चमकैं बिजुली कला अनंता ॥
तत्त्व रंगकी उठै तरंगा । शोभा विशद मनोहर संग ॥
पँचऐँ स्वास जब बाहर कीन्हां । उत्पन पारस ता संग दीन्हां ॥
स्वासा पारस मिलि भै एका । सोभा वरन रूप रस ठेका ॥

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पुरुष अंश लीला औतारा । उपजी कन्या कला अपारा ॥
अनन्त कलासो कन्या धारा । रूप अनूप भया उजियारा ॥
जब कन्या प्रभु उत्पन्न कीन्हां । पाँच स्वासा ता संग दीन्हां ॥
ता स्वासा संग पारस भारी । पांचे तत्व सो देह सँवारी ॥
उपजी कन्या अगम स्वभावा । अष्टंगी कहि पुरुष बुलावा ॥
आठों अङ्ग बना निरवाना । शोभा सुरति रूप सुख साना ॥
जब कन्या प्रभु देखा हेरी । कला अनंत रूपकी ढेरी ॥
देखि रूप चित हर्षित कीन्हा । उत्पति पारस तासंग दीन्हा ॥
जीवन शब्द मूल रहिवासा । सुरति निरति दीन्हा तेहि पासा ॥
पुरुष रचा जब आपु शरीरा । उपजी सुरति निरति गंभीरा ॥
काया कमलको व्यवहारा । जो चाही सो सबै सुधारा ॥
दहिने अंग तेज कर दाऊ । बायें शीतल सबै सुगाऊ ॥
मध्यम पुरुष सुरति अंकुरा । ताहि सुरति संग पारस पूरा ॥
ता दिन तीनों गुन ठयऊ । इंगला पिंगला सुखमन कियऊ ॥
मठ तिरमठ सो तहाँ बनावा । इंगला पिंगला सुखमन नावा ॥
ताहि समय तीनों घर ठयऊ । ईडा पिंगला सुखमन भयऊ ॥
तीनों घर कर तीन सुभाऊ । शीतल तेज समितकर भाऊ ॥
अमी अग्रमय तेज शरीरा । उपजे चन्द्र सूर दोऊ बीरा ॥
अग्र तेज औ सौम्य सुरंगा । तीन शक्ति उपजी तेहि संगा ॥
कला अनंत शक्तिके पासा । लीला बहुत बिचित्र प्रकासा ॥
कला अनंत सक्ति गंभीरा । तीनहु सक्ति मध्य दोय बीरा ॥
तिनहु संग अहै दोउ बीरा । इक शीतल इक तेज शरीरा ॥
तीनों शक्ति अंग दोउ बीरा । काया मथिकथि कहै कबीरा ॥
अभय शक्ति है चन्द्र सनेहा । इंगला नाडी संग उरेहा ॥
उलैघिनी शक्ति सूर सनेहा । पिंगला नाडी संग उरेहा ॥
चेतन शक्ति सुखमना संगा । बसै मध्य तहैं सुरति सुरंगा ॥
बसै मध्य तहैं सुरति तरंगा । सुरति निरति कायाके संगा ॥
नख शिख ज्योति विराजे अङ्गा । शोभा विशद मनोहर संगा ॥
पांचतत्व त्रय सकती राजै । ताहि संग दोय वीर विराजै ॥
तत्वरैंग सकती घरकीन्हां । तेहि महैं उनपनि पारस दीन्हां ॥

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उत्पनि पारस भा परसंगा । उपजी जोति कला बहुरैगा ॥
पाँचऐँ स्वासा देह समाना । उपजी जो कला अधिकाना ॥
जागी देह अँखडित अँगा । शोभित भई कन्ना पर संगा ॥
उत्पनि अँश पुरुषके संगा । भाखों भेद कला बहु रैगा ॥
जब कायामो आई स्वासा । जागी जोति पुहुप परगासा ॥
उपजी जो अखंडित बानी । बोले बचन पुहुप रस खानी ॥
मधुर बचन और लीला धारी । देखि रूप तब पुरुष दुलारी ॥
समय—पाँच तत्व तिन सकति सँग, चंद्र सूर दोउ वीर ।

तीनों घर स्वासा रमे, बाहर भीतर तीर ॥

चौपाई ।

उपजी रूप रैंगकी खानी । बोले अमी विरहकी बानी ॥
उपजी कन्या कला अनूपा । पुरुषसे उत्पन पुरुष स्वरूपा ॥
जेहि पारस सब उत्पत्ति कीन्हौ । सो पारस कन्या कहँ दीन्हौ ॥
पारस हाथ महा बल जाना । तब कहँ भा अभिमाना ॥
उपजा रंग रोस गंभीरा । बैठी अमी सरोवर तीरा ॥
यहि विधि सोरह सुत निरमाया । भिन्न भिन्न अस्थान बनाया ॥
जेहिको जेता तन बिस्तारा । तेहिको तैसा लोक सुधारा ॥
काहुको दीप सत्ताइस दीन्हौ । काहूको सात पाँच दशचीन्हौ ॥
काहू चौदह काहू बीसा । काहू सत्रह काहु उनीसा ॥
काहू बारह पन्द्रह तीसा । काहू इकइस बाइस चौवीसा ॥
काहू छत्तीस बत्तीसहि भारी । दीन्हों वास भये अधिकारी ॥
सब कहँ दीन्हों लोक बनाई । आपु रहे प्रभु अछप छिपाई ॥
झूल्पनि पारस पुत्रिहि दीन्हा । सौपेउ तेज धर्म सों लीना ॥
ताते धर्म भये बली बंडा । बैठो सात दीप नौ खंडा ॥
जिहि विधि रचना पुरुष बनाई । तैसी कला धरम निरमाई ॥
जेहि विधि रचना पुरुषहि कीन्हौ । तैसेहि धरम रचा सब चीन्हौ ॥
पुरुष समान रचा अस्थाना । बैठि शून्यमें करे अनुमाना ॥
जावन बिना जीव नहि होई । रचि अस्थूल बैठि मुख गोई ॥
रचना रचि मनमें पछिताई । सून्व शरीर जीव कहँ पाई ॥
जेहि पारस प्रभु लोक बनाया । सो पारस प्रभु कहाँ छुपाया ॥
सो पारस अब कहवौ पाऊँ । जेहि पारसते जिव निरमाऊँ ॥

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हेरत पारस आये तहवौ । बैठि सरोवर कामिनि जहवौ ॥
कामिनि धरम भये एक ठाँऊ । अंक मिलाय कीन्ह बहु भाऊ ॥
शील रंग रस कीन्ह मिलापा । धर्म राय सो कीन्ह विलापा ॥
करै विलाप कला बहु भारी । मुख चतुराई हिरदय विकारी ॥
कामिनिसो कीन्हो व्यवहारा । उपजा रंग रूप रसधारा ॥
धरम कहै कामिनिसों वाता । गहै अंग जमकाहै गाता ॥
कामिनि देह कामकी खानी । बोले मधुर बिरहकी वानी ॥
उपजा मोह महा मद भारी । कामिनि कामकला अनुसारि ॥
देखि कला अनुसार भुलाना । व्याकुल भये रंग अभिमाना ॥
कामिनि देखि धरम अकुलाना । उपजा रंग रोष अभिमाना ॥

धर्मराय वचन ।

धर्म कहै कामिनि सों वानी । तोरे है पारस सहिदानी ॥
सो पारस अब तुमरे पास । जाते पूजे मनकी आसा ॥
सो पारस देहु मोर हाथा । तुमहूँ रहो हमारे साथा ॥
सा०—तैं तो पारस पायऊ, अब चलो हमारे देस ॥
कहा मोर जो मानहू, मानहु मोर उपदेश ॥
धर्मराय जब कही कुवानी । तब कामिनि चित संका आनी ॥

अद्यावचन ।

कामिनी कहै धर्मसों वानी । काहे धर्म होहु अज्ञानी ॥
हम तुम एक पुरुषकर कीन्हौ । तुमकहूँदीन्ह सो हमहुँकोदीन्हौ ॥
हम लहुरे तुम जेठे भाई । हमसो कहा करहु अधिकई ॥
यहि कहि कन्या अठलानी । एके नाल कुमारग वानी ॥
वहनिहि भाइहि हुई कुवानी । आगे चली यही सहिदानी ॥
जबही कामिनि कही अस बानी । धरमराय चित दुबिधि आनी ॥

धर्मराय वचन ।

कामिनि चलहु हमारे देसा । कहा करहु मानहु उपदेसा ॥
छल बल करि अपने पुर बाला । तहाँ आनिकै रारि बढावा ॥
धरमराय कामिनिसों बोला । शोभा सुरति अमीरस डोला ॥
निरखि नैन कामिनिसों बोलै । शक्ति आधीन बैन बहु खोलै ॥
सोरह शक्ति कला शशि पूरी । तीनों शक्ति लिये कर छूरी ॥
नैन निरखि मूरति हो झोंके । तत्व निःतत्व आप तन ताके ॥

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विधिलौं लाइ बधिक विधि बोले । निरखत अंग २ तनु डोले ॥
अंतरगति विधि विधिहि मनायों । कुमति हाथपर साजनि आयो ॥
विधि दीन्ह बुन्द इक आई । चित सकाई एक रचो उपाई ॥
यहि पुर एक अंचभो ठयऊ । पारसको परताप जनयऊ ॥
इच्छा रूप हरष चित जागी । रचत सरोवर बार न लागी ॥
भूल्यो धरम चित अकुलाना । ऐसो सरवर मैं नहि जाना ॥
अछय अजूनि विधि पारस आना । कहा अचम्भो आनि तुलाना ॥
देखो तेहि पारसको चीन्हौं । जेहिंते मानसरोवर कीन्हौं ॥
सूर मलीन उदय शशि जोना । वाती बरन अंग तु अलोना ॥

धर्मराय वचन

जादिन पुरुष रचा तुव देहा । ता दिन मुहिं तुहिं जुरा सनेहा ॥
मोहिं कारन तोहि पुरुष बनावा । तू कस मोते अंग छिपावा ॥
मोहिं कारन तोहि रचना कीन्हा । रचिके खानि तोहि चितदीन्हा ॥
देह नात हमरे घर नाहीं । हम तुम रहे एक घर माहीं ॥
उत्पति पारस तुमरे पास । जाते पूजै मनकी आसा ॥
देह सबै हम रची बनाई । पारस दै तुम लेहु जगाई ॥
हम तुम खानि रचै बहु बानी । जाते होय न एकौ हानी ॥
हम तुम मिलि होयैं यकसारा । जाते होय स्निस्टि विस्तारा ॥
जैसी रचना पुरुष प्रगासा । तैसी रचो लोक रहिवासा ॥
जीव सीव रचि खानि बनाओ । जागे जोति ज्ञान फैलाओ ॥
जीव रची सब खानि बनाई । जागे जोति ज्ञान फैलाई ॥
लाज सकुचि आ रचों सगाई । वरण विचारि छूत बिगराई ॥
ठांव ठांव रचि राखों आपा । माता पिता सोग संतापा ॥
ससुर भैसुर औ भमित भाई । सिव सकति रची पूठ लगाई ॥
जाता पांत बहुते बिलगाओ । हंसन लाज भाव बन धाओ ॥
रचि अचार कपट विस्तारों । तीरथ वरत परतिमा धारों ॥
बहु बिधि करौं पखंड पसारा । तीरथ बरत औ नेम अचारा ॥
बद कितेब धरि फँद सँवारों । रची देओं दोग्य पर्वत भारों ॥
दो दीन दुइ राह चलाओ । झगरा कराइ सदा अरुझाओ ॥
एक एकते रारि बढावे । मुक्तिपंथते रहे भुलावे ॥
दोऊ दीन बाँधी मरजादा । रचों बाद ममता औ स्वादा ॥

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एहि विधि रचों सकल दुनियाई । लोभ मोह लालच बरियाई ॥
रचिकै खानि करों रजधानी । राज पाट सिंहासन ठानी ॥
साखी—रचना रचों सब लोककी, नख सिख रहों समाय ।

पुरुष नाम जाने बिना, सत्यलोक नहि जाय ॥
तुम अद्या अरु हम अविनासी । बारह खंड छै लोकके वासी ॥
पाप पुत्र दोए रचों अवारा । जाकहैं सेव यह संसारा ॥
पाप पुत्र दिठ फँदा होई । जा महँ अरुझि है सब कोई ॥
जोग जज्ञ व्रत संयम पूजा । सोल हमहीं और नहि दूजा ॥
रचों छुधा मायादि विकारा । पुरुष लोकको मूंदें द्वारा ॥
रचों क्रोध माया विकरारा । पुरुष लोकको रोको द्वारा ॥
पुरुष लोक हहई रचि लीजै । इकछत राज हमहि तुम कीजै ॥
तुमरे संग है पारस सूर। जाते होय सकल विधि पूरा ॥
जहि ते लोक पुरुष परगासा । सो पारस है तुमरे पास ॥
सो पारस अब हमको देह । रंग हमारा सबै तुम लेह ॥

अद्या वचन ।

कामिनी कहे वचन बुद्धि धीरा । उपजेहु कालरूप बलवीरा ॥
जो जो वचन कहेउ तुम भाई । सो हमरे चित्त एकु न आई ॥
पुरुष लोक कस मूंदहु द्वारा । लेउ थाप अपने सिरभारा ॥
जो छल हमते कीन्ह भाई । तैसा छल तुम्ह भुगतहु जाई ॥
पारस कामिनि धरा दुराई । हाथ मलै सिर धुनि पछताई ॥
हाथ मीजि छिनछिन पछितावे । कहि कामिनि धर्महि समुझावे ॥
कामिनि कहै कुबुध समझाई । हम तुम चलहु पुरुषमहँ जाई ॥
बकसै पुरुष दयाकरि तोही । सीस नवायके लीन्हे मोही ॥
बिन दीये बरियाई लैहो । पुरुष लोक पुनि जाय न पैही ॥
कामिनि कहा वचन परवाना । धरमरायके भयो अभिमाना ॥

धर्मराय वचन ।

कामिनि तोरि बुद्धि है थोरी । अब ना जाऊँ पुरुषकी खोरी ॥
पुरुषलोक इहई रचि राखों । रचौ बिचारी बुद्धि बलभाखों ॥
अब तौ पुरुषत्रास नहि मोही । गहौं बाहकों राखा तोही ॥
तैं कन्या का डहकसि मोही । रचा पुरुष भम कारण तोही ॥
तैं कामिनि कठोर निरमोही । रचा पुरुष हमहीं लग तोही ॥

गजल आजिज प्रथम अध्यायका परिशिष्ट अनुराग सागरसे सृष्टिकी उत्पत्तिके प्रकरणका प्रमाण

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पहिल वचन बिहरते बोली । लानी कठिन कामकी गोली ॥
काम सतावै निश दिन मोही । दे पारसकी लीलहुँ तोही ॥

अद्यावचन ।

कामिनि कहै धरम सुनु बाता । चढी कालिमा तोहरे गाता ॥
हठ निग्रह कामिनि किहु ताही । धरमराय पकरी तब बाँही ॥
गही बाँह कामिनिकी जबहीं । काम बाण घट व्यापे तबहीं ॥
धरम राष कामिनिपर कीन्हा । गहि पग सीस लील तेहि लीन्हा ॥
लीलत कामिनि सब्द उचारा । पुरुष २ करि कीन्ह पुकारा ॥
कामिनि पुरुष नाम जब लीन्हौं । आज्ञा पुरुष अंसही दीन्हौं ॥
योगजीत आये तेहि वारा । सुर्त बान सो कालहि मारा ॥
पुरुष कोप ताऊपर कीन्हौं । कन्या उगल धरम तब दीन्हा ॥
उगली कन्या बाहेर आई । देखि काल अति रोष कराई ॥
हाहाकाल रोषकरि धावा । कामिनि पारस कहाँ चोरावा ॥
कामिनी कपट देख विषधारा । पारस मानसरोवर डारा ॥
मानसरोवर झलकै अंगा । गयऊ पताल जहाँ जलरंगा ॥
परीक्षा चार पारस परवाना । उपजी चारखान निरवाना ॥
एक परीक्षाते सरबर गयउ । पारसके सम पारस ठयऊ ॥
दूजो अंश भया निरवाना । शिला सिंधु परवत परमाना ॥
रतन शिला ताहिकी धारा । सो पाजी द्वारे संचारा ॥
तीसर अंश नार प्रगटयऊ । अंशहि अंश चतुरगुन भयऊ ॥
चौथा अंश कामिनि अनुमाना । जाते स्वर्ग नरक परवाना ॥
अंशहि अंश अंशते जानी । एक प्रती चौगुन उत्पानी ॥
चार २ गुन गुनहि समाना । अंशते अंश चतुर परमाना ॥
पारस मानसरोवर माहीं । पारस बुद्धि आपही आहीं ॥
पारस कामिन बहुत दुरावे । सुरेत सनेह तहाँ फिर आवे ॥
पारस अंत नहीं ठहराई । बासरूप कामिनि संग धाई ॥
कामिन काल पुरुष पद परसे । पारष नीर नेत्र मह दरसे ॥
नैन निरख मूरत अनुरागी । धरम अंश कामिनि तन लागी ॥
पारस अंश चितै नहि डोले । बहुरि २ कामिनिस्ों बोले ॥
पारस अंश घट रहा छपाई । निकसी कन्या बाहर आई ॥
जेहि कारण कामिनी हठ कीना । पारस संग छान सो लीना ॥

सृष्टिके आदिमें क्या था

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उत्पत्ति पारस धरम तब पावा । कन्या रही ताहिके ठाँवा ॥
जब लगि कन्या भई सियानी । तबलगि धरम रची सब खानी ॥
खानि वानी रचि कीन पसारा । बेदवाद बहुमत विस्तारा ॥
कबीर बचन ।

साखी-रचना रची लोककी, सब घट रहा समय ।
पुरुष नाम जानै नहीं, ताते लोक न जाय ॥
रचा रची सब लोककी, दीन्हा सबहि भुलाय ।
पुरुष नाम जाने विना, सत्य लोक नहीं जाय ॥

चौपाई ।

पुरुष नाम ज्ञानी जो पावे । लोक दीप पलमाहिं ढहावे ॥
पुरुष नाम जानै नहीं भेदा । रचे खानि चौरासी खेदा ॥
रचे बानि औ चारों वेदा । चित चंचल औ अन्ध अभेदा ॥
दुख सुख सबै रची बहु भांती । जरा मरन पूजा औ पाती ॥
रचि सब खानि बैठ अभिमानी । तब लगि पुत्री भई सयानी ॥
उपजा जोबन रसको भावा । तब कन्या कहैं विरह सतावा ॥

अद्यावचन ।

कामिनी कहे धरमसों बानी । हमतो तुमरे हाथ बिकानी ॥
सूर्त डोलायके पारस लीन्हा । मदन भुअंगमके बसि कीन्हौ ॥
जोबन विरह महामद गाजे । विनु संयोग गर्भ नहीं छाजे ॥
मोह महा झर बरषे लागी । मन समाध कामिनि सों लागी ॥
गर्भ किए मा करदी राजा । कामिन सोह दुह दिसवाजा ॥
मनसा लहर उद मद मन भएउ । काम दहन घृत आहुत दयेउ ॥
उपजा मदन माह औगाहा । पुत्री पितासों भएउ विवाहा ॥
साखी-बहनीसे बेटी भई, बेटीसों भइ नार ।
नारीसों माता भई, मनसा लहर पसार ॥

चौपाई ।

बरबस धरमराय हर लीन्हा । बिन लेखा रजधानी कीन्हा ॥
विषया वेद व्याह जमनाता । चौदह काल संघ उतपाता ॥
चौदह पारस लोक निसानी । शब्द व्याह चौदह जमहानी ॥
मनसा व्याह देव रिषिगन्धी । हंसहि हंस भगति युगबंधी ॥
सुरत हंस घट रचो विदानी । धर्म समाध बसाए आनी ॥

सृष्टिकी उत्पत्ति सत्यपुरुषकी रचना सोलह सुतका प्रगट होना

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उपजा मदन मोह औगाहा । कन्या पितहि तब भया विवाहा ॥
कन्या व्याकुल भई तेंहि माहा । अतिसय मनमें उपज्यो दाहा ॥
धरम रायको उपज्यो भावा । कामिनि हिये हाथ लगावा ॥
उपजी रंग रोषकी खानी । कामिनि चरन गही तब आनी ॥
मनसा लहरि ताही के दीन्हा । उपजे तीन लोककर चीन्हा ॥
ममता शील ताहिको दीन्हा । फैली तीन लोक सो चीन्हा ॥

तीनों देवोंकी प्राकट्य ।

कामिनि संग करे सुख भारी । उपजा तीनलोक अधिकारी ॥
तीनहि सकति पुरुष संम दीन्हा । तीनों सुत उपजावे लीन्हा ॥
पांच तत्त्व तीन गुन चीन्हा । जिनते सकल पसारा कीन्हा ॥
तीनहुँ सुत उपजे बहुरंगा । पारस रहा धरमके संगा ॥
पारस रहा ताहिके संगा । ताते तीनों भये अपंगा ॥
तीनउ सुत उपजे अधिकारा । धर्मराय तब भया निरारा ॥
तीनों सुत कहँ दीन्ही भारा । धर्मराय उठि भये निनारा ॥
राजपाट कामिनि कहँ दीन्हा । आपन बास शून्य महँ लीन्हा ॥
कामिनि दरस सदा लौ लावै । राज पाट सब कीति बनावै ॥
कामिनि आपन कला फैलावे । तीनों सुतको राज सिखावे ॥
राज नीति सुत चितहि धरहीं । मनसा ध्यान पिताको करहीं ॥
खोजत खोजत बहु युग गयऊ । पिता पुत्रसों भेट न भयऊ ॥
ध्यान धरत बहुते युग गयऊ । हारि थके अंत नहि पयऊ ॥
कामिनि पुरुष एकसंग रहई । सुतकी बात पुरुष सों कहई ॥
वहांकी बात न सुतसों भाखे । करे दुलार सदा संग राखे ॥
इहिबिधिवहुतदिवस चलि गयऊ । सुत न खोज पिताकर कियऊ ॥
धरत ध्यान बहुते युग गयऊ । पिताको खोज पिता करकियऊ ॥
मातासों पूछे सुत बाता । पिता हमार कहाँ गये माता ॥
माता कहँ सुतन्हसों बानी । पिता तुम्हार हमहुँ नहि जानी ॥
रचना सकल हमहीते होई । हमसों दूसर और न कोई ॥
रचना सब मोहीते होई । दूसरा जान परो नहि कोई ॥
हमहीं पिता हमहीं हैं माता । हमहीं तीन लोककी दाता ॥
हमहीं छोंडि कोइ दूसर नाही । तुम जो पूछहुँ सो कहँ काहीं ॥
तीन लोकमहँ असर नाही । माता कपट करें मन माहीं ॥

निरंजनकी तपस्या और मान सरोवर तथा सुन्नकी प्राप्ति

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तब सुत सोच कीन्ह मनमाहीं । पिताका भेद बतावत नाहीं ॥
आपु आपु कह सुत सब रुठे । माता वचन कहै सब झूठे ॥
तब माता कहै वचन रिसाई । पिताको दरश करहु तुम जाई ॥
माता कहै फूल लै धावहु । पिताको शीश परसिके आवहु ॥
पुहुप समाधि वासले धाओ । पिताके शीश परसिके आओ ॥
चले पुत्र पिताकी आसा । पिता रहे पुत्रनके पास ॥
खोजत बहुतदिवस चलि गयऊ । पिताको दरस कतहुँ नहि भयऊ ॥
तीनों सुत सो दरशन भयऊ । पिता निकट सुत दूर सिधयऊ ॥
पिता निकट सुत दूर सिधाये । खोजत कतहुँ अन्त नहि पाये ॥
खोजि थाक माता पहुँ आये । कोहु साँच कोहु झूठ सुनाये ॥
ब्रह्महि भाषा झूठ संदेसा । सकुचि वचन नहि कहो महेसा ॥
भाषा विस्नु सत्यकी रेखा । खोजी थाकि पिता नहि देखा ॥
माता बिहँसि कही तब बानी । ब्रह्मा झूँठ झूँठ तौ खानी ॥
शिव लजाय शिर नीचे राखा । सांच झूँठ एको नहि भाखा ॥
ताते करहु योग तप जाई । जटा बढ़ाय विभूति रमाई ॥
तुम सुत करो योग तप जाई । शीस जटा तन भसम चढाई ॥
लेहुआ मंडल भेषसो कीन्हौ । शिवको थापि भवानी दीन्हौ ॥

साखी—जप तप योग समै दूढ, आगे ध्यान पसार ।

माता कह्यो क्रोध करि, चतुर मुख अन्ध अहार ॥

मातहिँ कीन्ह विस्नु पर दाय । मुखहिँचूमिके कंठ लगाया ॥
सत्य वचन सुत बोलेउ बानी । तीनहुँ लोक करहु रजधानी ॥
शिव ब्रह्मा करिहँ तोर सेवा । गण गंधर्व रिषि मुनिदेवा ॥
ब्रह्मा मोसों झूँठ लगावा । तेहि कारण बिधि झूँठ कहावा ॥
ब्रह्मा वेद पढे बहु भांती । कुकरम करदिवस औ राती ॥
झूठी बात वेद निरमाई । चार वरनमें बडी बढाई ॥
पहिले चारों वरन पुजावै । दछिणा कारण गरा कटावै ॥
गरा कटाए करावै पूजा । गाय भँसमें ब्रह्म न दूजा ॥
लिये मूँड पडिवो रमाई । ब्राह्मण भये सो काल कसाई ॥
खाये अखज चले अरडाई । जस मड वाको श्वान अघाई ॥
ब्राह्मणहूको झूठी आसा । हरि नहि भजे न हरिके दासा ॥
कह कवीर ब्रह्मा कहँ रोए । उत्तम जन्म पाए जड खोए ॥

निरंजनको सृष्टि रचनाका साज मिलना

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झूठी बात वेद निरमाई । चार बरन आश्रमहिं दिढाई ॥
रिषि अठासी सहस्र बखानी । ते ब्रह्माके सुत उत्पानी ॥
जेते रिषि तेते मतधारी । अस्तुति करिहैं सब तुम्हारी ॥
ब्रह्मादिय मुनि देव गण भारी । अस्तुति करिहैं विस्नु तुम्हारी ॥
निसिदिन ध्यान पिताको धरिहो । किंचित ध्यान जोत अनुसरिहो ॥
साखी-विचलि गयउ निजनामको, गहे कुमारग जानि ।

तीनलोक गुन विस्तरेऊ, निरंजन आदि भवानि ॥
कहै कबीर सुनौ धर्मदासा । दोऊ मिलि यह यहमत परकासा ॥
यह सब खेल कामिनी कीन्हा । निरंजन बास शून्यभौ लीन्हा ॥
जोति निरंजन ध्यान लखाई । शिव ब्रह्माको भेद सुनाई ॥
सेवहु विस्नु निरंजन ध्याना । हेसुत वचन निश्चय मम जाना ॥
जाते ज्ञान अगम फैलैहो । जाते तामस सिद्ध कहैहो ॥
सिद्धनका मत होइहै भारी । ज्ञान अगमगुण होहि भिखारी ॥
अंश दहन तन तामस भारी । असुर भाव पशु अवतारी ॥
मत पाखंड ठगोरी टोना । षट् दरशन पाखंड सिखलोना ॥
यंत्र मंत्र विषया अधिकारी । अन्तरध्यान भगत तुव धारी ॥
तब गुण सहस्र नाम ऊचरिहैं । एक अंश चौसठ योगिन होइहैं ॥
कर खपर लें मंगल गैहैं । यहि उपदेश महादेव दैहैं ॥
शंकर चिह्न इहै सौ पैहैं । सिवको भगत तेहि लोके जैहैं ॥
रज रुचि सतगुन दया समानी । असुर हतन भक्तन रजधानी ॥
आगम कहो संघ सुनि लीन्हैउ । जहाँ जसभाव तहाँ तस कीन्हैउ ॥
चारि खानि ब्रह्मै निरमाई । चार वेद मत चार चलाई ॥
शिवको वरन भेद नहिं होई । क्रोधरूप धरि भेष विगोई ॥
माता विस्नुपर दया कीन्हौ । पिता दिखाय निकटहि दीन्हौ ॥
अनुभव दया विस्नु जब पावा । पिता दास भया सुखपावा ॥
पिताको दरस विस्नु जब पावा । तब माता कह शीश नवावा ॥
माता पिता एक ह्वै गयऊ । विस्नु देखि चित हर्षित भयऊ ॥
जोतिहि जोत एक होय गयऊ । आप भान विस्नु भुलयऊ ॥
माता पिता सुत एक भयऊ । विस्नु समाज जोतिमहँ गयऊ ॥
तेहि पाछे जग सिरजे लऊ । ताको वरन सविस्तर कहऊ ॥
प्रथमें चारि खानि निरमाई । लछ चौरासी जोनि बनाई ॥

सहजका धर्मरायके पास जाकर पुरुषकी आज्ञा सुनाना

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चारि खानिकी चारिउ बानी । उपजी तीन लोक सहिदानी ॥
चारि खानि रचि कियो पसारा । चारि वरन पाषण्ड सँवारा ॥
चौदह भुवन करयो विस्तारा । चौदह जमको राज पसारा ॥
लछ चौरासी जोनी कीन्हा । चारि खानि महाँ एकहि चीन्हा ॥
लछ चौरासी बचन बखाना । चारि खानि जिव एकैसाना ॥
रचना रची स्त्रिस्ट बहु रंगा । सुर नर मुनि गये कामतरंगा ॥
कामदेवकी कला अनंगा । पशु पंछी सुर नर मुनि सँगा ॥
कामकला सबही भरमावै । शिव सकती रंग काम लगावै ॥
उत्पति प्रलय रची अविनाशी । कामिनि काम कालकी फाँसी ॥
कनक कामिनि फन्द बतावा । तेहि फंदे सबही अरुझावा ॥
कनक कामिनी फन्दा कीन्हा । चार खानिमें एकै चीन्हा ॥
नर वानर कीट पतंगा । सबके की रखवारी कर संगा ॥
नर नारि जत खान सँवारी । सब घट काम करै रखवारी ॥
पशु पंछी जत कीट पतंगा । रच्छक भच्छक सबके सँगा ॥
स्वासा सार होय गुँजारी । पांचों तत्त्व सँग विस्तारी ॥
पांचों तत्त्व तुरै बल जोरा । तापर चढे साहु औ चोरा ॥
चारिउ खानि हाय गुंजारा । स्वासा चलै अखंडित धारा ॥
देहदसा जस पुरुष सँवारा । तँसी देह रची करतारा ॥
पांच तत्त्व तीनों गुण साजा । आठ काठ पिंजरा उपराजा ॥
अष्टंगी तहाँ आप विराजे । अष्ट धातु मिलि रूप विराजे ॥
पिंजरामें सुगना एक रहई । बाकी गति मंजारी लहई ॥
सुवा सुख पिंजरा महाँ माने । तके मंजरी सो नहि जाने ॥
सुगना पढै दिवस औ राती । रछक पिंजरा ऊपर सँघाती ॥
रछक भच्छक संग रहावै । सदा पढावै घात लगावै ॥
बैठे दोऊ अपने दावा । एक घातक यक सुआ पढावा ॥
जस सुआ पिंजरा महाँ गहई । ऐसो देह प्राण दुख सहई ॥
नख शिख रचा काल फूलवारी । फूली बास कुबास सवारी ॥
कनक कामिनि काल बनाई । चारि खानि महाँ रहा समाई ॥
कामिनि काम सँवारे जानी । चारिउ खानि रहा विकशानी ॥
चारि खानि महाँ स्वास अमाना । काल कुटिल तेहि माहिँ समाना ॥
काल करमकी खानि बनाई । शिव शकती महाँ रहा समाई ॥