भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

पृष्ठ 180, कुल 1367 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 180

धरम समाधि चितही जम धारा । चौदह मांहि चोर कुतवारा ॥
ताकी कला कहै को पारा । जेहिंके सुत कोटिन उजियारा ॥
कोटिन कला करै बहु भारी । आपहिं पुरुष आपहीं नारी ॥
आपहिं वेद आपही बानी । आपहिं कोटिन ज्ञान बखानी ॥
आदि अजर अवगाह कहावै । मूल नाम गहि धोख लगावै ॥
नाना ज्ञान कथे बहु बानी । प्रकटो आदि आप गुन जानी ॥
कहाँ लगि कहीं कालके भाऊ । वहतो काल बहु नाम धराऊ ॥
मुरति सरोतर जागे नाहीं । मनमथ पवन चंचला ताहीं ॥

धर्मदास बचन—चौपाई ।

धरमदास विनवै चित लाई । समरथ मोहि कहो समुझाई ॥
अहाँ दास विनवौं कर जोरी । दया करो प्रभु बन्दी छोरी ॥
धरमराइ उत्पनि जस पाई । तेज पाइ भया वरियाई ॥
ऊपजै तस भये कसाई । उपज्यो चित चंचल दुखदाई ॥
पुरुष तेज जब शून्य संचारा । ता संग भया धरम औतारा ॥
शील विकार सहित तन पाई । प्रथमें भक्ति दूजे अन्याई ॥
भक्ति कियसि जब रहा अकेला । अधाके संग भया अपेला ॥
सो अधा उन कैसे पाई । कहि विधि पुरुष ताहि निरमाई ॥
साहब कहौ भेद समुझाई । कैसे कन्या पुरुष बनाई ॥
कैसे धरमराय तिहिं पाई । तौन भेद तुम कहो गुसाई ॥
कहौ विचारि दोऊ कर भाऊ । दुइ कर जोरिके बन्दों पाँऊ ॥

सतगुरु बचन ।

धरमदास मैं तुम्हे लाखावों । आदि अन्त सब भेद बतावों ॥
चौथे स्वासा संग अधिकारी । सून्यते जगो भई उजियारी ॥
पुरुष कमलपर बैठे आई । गई गरम उपजी शितलाई ॥
पुरुष कमलपर बैठे जबहीं । परिमल उदित भया तन तबहीं ॥
शीतल पवन सोहागन खानी । मूल कमलपर आसन ठानी ॥
सिंहासनपर सो सत्य विराजे । पारस नेह देह महाँ गाजे ॥
पारस तेज भया तन माही । पँचऐं स्वासा उपजा ताही ॥
उपजत स्वासा देह निहारा । तन परसेव भौ मैल निनारा ॥
काया मैल पुरुष जब जाना । मीजी मैल अबला बलठाना ॥
गएउ तेज भा अबल शरीरा । पाछैं भयो स्वास गंभीरा ॥