कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 183, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्पनि पारस भा परसंगा । उपजी जोति कला बहुरैगा ॥
पाँचऐँ स्वासा देह समाना । उपजी जो कला अधिकाना ॥
जागी देह अँखडित अँगा । शोभित भई कन्ना पर संगा ॥
उत्पनि अँश पुरुषके संगा । भाखों भेद कला बहु रैगा ॥
जब कायामो आई स्वासा । जागी जोति पुहुप परगासा ॥
उपजी जो अखंडित बानी । बोले बचन पुहुप रस खानी ॥
मधुर बचन और लीला धारी । देखि रूप तब पुरुष दुलारी ॥
समय—पाँच तत्व तिन सकति सँग, चंद्र सूर दोउ वीर ।
तीनों घर स्वासा रमे, बाहर भीतर तीर ॥
चौपाई ।
उपजी रूप रैंगकी खानी । बोले अमी विरहकी बानी ॥
उपजी कन्या कला अनूपा । पुरुषसे उत्पन पुरुष स्वरूपा ॥
जेहि पारस सब उत्पत्ति कीन्हौ । सो पारस कन्या कहँ दीन्हौ ॥
पारस हाथ महा बल जाना । तब कहँ भा अभिमाना ॥
उपजा रंग रोस गंभीरा । बैठी अमी सरोवर तीरा ॥
यहि विधि सोरह सुत निरमाया । भिन्न भिन्न अस्थान बनाया ॥
जेहिको जेता तन बिस्तारा । तेहिको तैसा लोक सुधारा ॥
काहुको दीप सत्ताइस दीन्हौ । काहूको सात पाँच दशचीन्हौ ॥
काहू चौदह काहू बीसा । काहू सत्रह काहु उनीसा ॥
काहू बारह पन्द्रह तीसा । काहू इकइस बाइस चौवीसा ॥
काहू छत्तीस बत्तीसहि भारी । दीन्हों वास भये अधिकारी ॥
सब कहँ दीन्हों लोक बनाई । आपु रहे प्रभु अछप छिपाई ॥
झूल्पनि पारस पुत्रिहि दीन्हा । सौपेउ तेज धर्म सों लीना ॥
ताते धर्म भये बली बंडा । बैठो सात दीप नौ खंडा ॥
जिहि विधि रचना पुरुष बनाई । तैसी कला धरम निरमाई ॥
जेहि विधि रचना पुरुषहि कीन्हौ । तैसेहि धरम रचा सब चीन्हौ ॥
पुरुष समान रचा अस्थाना । बैठि शून्यमें करे अनुमाना ॥
जावन बिना जीव नहि होई । रचि अस्थूल बैठि मुख गोई ॥
रचना रचि मनमें पछिताई । सून्व शरीर जीव कहँ पाई ॥
जेहि पारस प्रभु लोक बनाया । सो पारस प्रभु कहाँ छुपाया ॥
सो पारस अब कहवौ पाऊँ । जेहि पारसते जिव निरमाऊँ ॥