कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 190, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंतब सुत सोच कीन्ह मनमाहीं । पिताका भेद बतावत नाहीं ॥
आपु आपु कह सुत सब रुठे । माता वचन कहै सब झूठे ॥
तब माता कहै वचन रिसाई । पिताको दरश करहु तुम जाई ॥
माता कहै फूल लै धावहु । पिताको शीश परसिके आवहु ॥
पुहुप समाधि वासले धाओ । पिताके शीश परसिके आओ ॥
चले पुत्र पिताकी आसा । पिता रहे पुत्रनके पास ॥
खोजत बहुतदिवस चलि गयऊ । पिताको दरस कतहुँ नहि भयऊ ॥
तीनों सुत सो दरशन भयऊ । पिता निकट सुत दूर सिधयऊ ॥
पिता निकट सुत दूर सिधाये । खोजत कतहुँ अन्त नहि पाये ॥
खोजि थाक माता पहुँ आये । कोहु साँच कोहु झूठ सुनाये ॥
ब्रह्महि भाषा झूठ संदेसा । सकुचि वचन नहि कहो महेसा ॥
भाषा विस्नु सत्यकी रेखा । खोजी थाकि पिता नहि देखा ॥
माता बिहँसि कही तब बानी । ब्रह्मा झूँठ झूँठ तौ खानी ॥
शिव लजाय शिर नीचे राखा । सांच झूँठ एको नहि भाखा ॥
ताते करहु योग तप जाई । जटा बढ़ाय विभूति रमाई ॥
तुम सुत करो योग तप जाई । शीस जटा तन भसम चढाई ॥
लेहुआ मंडल भेषसो कीन्हौ । शिवको थापि भवानी दीन्हौ ॥
साखी—जप तप योग समै दूढ, आगे ध्यान पसार ।
माता कह्यो क्रोध करि, चतुर मुख अन्ध अहार ॥
मातहिँ कीन्ह विस्नु पर दाय । मुखहिँचूमिके कंठ लगाया ॥
सत्य वचन सुत बोलेउ बानी । तीनहुँ लोक करहु रजधानी ॥
शिव ब्रह्मा करिहँ तोर सेवा । गण गंधर्व रिषि मुनिदेवा ॥
ब्रह्मा मोसों झूँठ लगावा । तेहि कारण बिधि झूँठ कहावा ॥
ब्रह्मा वेद पढे बहु भांती । कुकरम करदिवस औ राती ॥
झूठी बात वेद निरमाई । चार वरनमें बडी बढाई ॥
पहिले चारों वरन पुजावै । दछिणा कारण गरा कटावै ॥
गरा कटाए करावै पूजा । गाय भँसमें ब्रह्म न दूजा ॥
लिये मूँड पडिवो रमाई । ब्राह्मण भये सो काल कसाई ॥
खाये अखज चले अरडाई । जस मड वाको श्वान अघाई ॥
ब्राह्मणहूको झूठी आसा । हरि नहि भजे न हरिके दासा ॥
कह कवीर ब्रह्मा कहँ रोए । उत्तम जन्म पाए जड खोए ॥