कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 189, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपजा मदन मोह औगाहा । कन्या पितहि तब भया विवाहा ॥
कन्या व्याकुल भई तेंहि माहा । अतिसय मनमें उपज्यो दाहा ॥
धरम रायको उपज्यो भावा । कामिनि हिये हाथ लगावा ॥
उपजी रंग रोषकी खानी । कामिनि चरन गही तब आनी ॥
मनसा लहरि ताही के दीन्हा । उपजे तीन लोककर चीन्हा ॥
ममता शील ताहिको दीन्हा । फैली तीन लोक सो चीन्हा ॥
तीनों देवोंकी प्राकट्य ।
कामिनि संग करे सुख भारी । उपजा तीनलोक अधिकारी ॥
तीनहि सकति पुरुष संम दीन्हा । तीनों सुत उपजावे लीन्हा ॥
पांच तत्त्व तीन गुन चीन्हा । जिनते सकल पसारा कीन्हा ॥
तीनहुँ सुत उपजे बहुरंगा । पारस रहा धरमके संगा ॥
पारस रहा ताहिके संगा । ताते तीनों भये अपंगा ॥
तीनउ सुत उपजे अधिकारा । धर्मराय तब भया निरारा ॥
तीनों सुत कहँ दीन्ही भारा । धर्मराय उठि भये निनारा ॥
राजपाट कामिनि कहँ दीन्हा । आपन बास शून्य महँ लीन्हा ॥
कामिनि दरस सदा लौ लावै । राज पाट सब कीति बनावै ॥
कामिनि आपन कला फैलावे । तीनों सुतको राज सिखावे ॥
राज नीति सुत चितहि धरहीं । मनसा ध्यान पिताको करहीं ॥
खोजत खोजत बहु युग गयऊ । पिता पुत्रसों भेट न भयऊ ॥
ध्यान धरत बहुते युग गयऊ । हारि थके अंत नहि पयऊ ॥
कामिनि पुरुष एकसंग रहई । सुतकी बात पुरुष सों कहई ॥
वहांकी बात न सुतसों भाखे । करे दुलार सदा संग राखे ॥
इहिबिधिवहुतदिवस चलि गयऊ । सुत न खोज पिताकर कियऊ ॥
धरत ध्यान बहुते युग गयऊ । पिताको खोज पिता करकियऊ ॥
मातासों पूछे सुत बाता । पिता हमार कहाँ गये माता ॥
माता कहँ सुतन्हसों बानी । पिता तुम्हार हमहुँ नहि जानी ॥
रचना सकल हमहीते होई । हमसों दूसर और न कोई ॥
रचना सब मोहीते होई । दूसरा जान परो नहि कोई ॥
हमहीं पिता हमहीं हैं माता । हमहीं तीन लोककी दाता ॥
हमहीं छोंडि कोइ दूसर नाही । तुम जो पूछहुँ सो कहँ काहीं ॥
तीन लोकमहँ असर नाही । माता कपट करें मन माहीं ॥