कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 181, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेहि स्वासा सँग पारस भारी । कायाते मथि मैल निकारी ॥
तनते मैल काढ़ि प्रभु लीन्हा । सोई मैल रचि पुत्री कीन्हा ॥
करि पुत्री कर ऊपर लीन्हा । उपज्यो प्रेम सहजका चीन्हा ॥
भई पुत्री प्रभु देखा जबहीं । सुरत कीन्हा पारसको तबहीं ॥
निर्मल पारस स्वासा पाँचा । रहो समायी मैलके साँचा ॥
आप मैलते स्वासा कीन्हा । पैठी सुरति रंग तेहि दीन्हा ॥
देके रंग बरन सब फेरा । भीतर मैल मोह मद घेरा ॥
ऊपर सोभा रंग बनावा । भीतर लाल रंग वह छावा ॥
ऊपर सोभा बहुत रंगाई । भीतर आस ललित रुचि छाई ॥
पांच अमीकर पांच सुभावा । पांच तत्त्व तेहि संग बनावा ॥
पांच अमीते पुरुष सरीरा । ताते पांच तत्त्व भए धीरा ॥
पांच अमीते तत्त्व बनावा । पांच अमी तेहि सँग निरमावा ॥
पांच तत्त्व पांचो बेवहारा । तेहिंते भवउ सकल विस्तारा ॥
पुरुष मैलते पुत्री कीन्हा । पांच तत्त्व तेहि भीतर दीन्हा ॥
आप सुरति ते पुत्री कीन्हा । पांच कर गुन भीतर दीन्हा ॥
भीतर बाहर तत्त्व पसारा । पांचों तत्त्व रंग अधिकारा ॥
पांच रंग तत्त्व की धारा । पांचों तत्त्व रंग बहु सारा ॥
पांच तत्त्व पांचों रंग भारी । पांचों रंगते कला प्सारी ॥
तत्त्व रंगते लीला धारी । पांच तत्त्व पांचों रंग सारी ॥
तत्त्व रंग बहु लीला धारी । पुत्री बहुत बिचित्र सँवारी ॥
तासु कला अनंत पसारी । ताते बहुत भई विस्तारी ॥
वरनि न जाव रूप उजियारी । सुन धर्मनि मैं कहैं विचारी ॥
कलाअनंत प्रभु पुत्री कीन्हा । पारस सार ताहिमें दीन्हा ॥
उत्पति पारस पुत्री पावा । प्रगटी कला अनंत सुभावा ॥
नखसिख देह सिध प्रभु कीन्हां । पँचई स्वासा भीतर दीन्हां ॥
जब स्वासा काया महँ आई । प्रगटी ज्योति जगामग झाई ॥
आठो अङ्ग बना बहुत रंगा । पारस सार ताहि के संग ॥
निर्मल उदित ताहि सो दंता । चमकैं बिजुली कला अनंता ॥
तत्त्व रंगकी उठै तरंगा । शोभा विशद मनोहर संग ॥
पँचऐँ स्वास जब बाहर कीन्हां । उत्पन पारस ता संग दीन्हां ॥
स्वासा पारस मिलि भै एका । सोभा वरन रूप रस ठेका ॥