कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 186, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंएहि विधि रचों सकल दुनियाई । लोभ मोह लालच बरियाई ॥
रचिकै खानि करों रजधानी । राज पाट सिंहासन ठानी ॥
साखी—रचना रचों सब लोककी, नख सिख रहों समाय ।
पुरुष नाम जाने बिना, सत्यलोक नहि जाय ॥
तुम अद्या अरु हम अविनासी । बारह खंड छै लोकके वासी ॥
पाप पुत्र दोए रचों अवारा । जाकहैं सेव यह संसारा ॥
पाप पुत्र दिठ फँदा होई । जा महँ अरुझि है सब कोई ॥
जोग जज्ञ व्रत संयम पूजा । सोल हमहीं और नहि दूजा ॥
रचों छुधा मायादि विकारा । पुरुष लोकको मूंदें द्वारा ॥
रचों क्रोध माया विकरारा । पुरुष लोकको रोको द्वारा ॥
पुरुष लोक हहई रचि लीजै । इकछत राज हमहि तुम कीजै ॥
तुमरे संग है पारस सूर। जाते होय सकल विधि पूरा ॥
जहि ते लोक पुरुष परगासा । सो पारस है तुमरे पास ॥
सो पारस अब हमको देह । रंग हमारा सबै तुम लेह ॥
अद्या वचन ।
कामिनी कहे वचन बुद्धि धीरा । उपजेहु कालरूप बलवीरा ॥
जो जो वचन कहेउ तुम भाई । सो हमरे चित्त एकु न आई ॥
पुरुष लोक कस मूंदहु द्वारा । लेउ थाप अपने सिरभारा ॥
जो छल हमते कीन्ह भाई । तैसा छल तुम्ह भुगतहु जाई ॥
पारस कामिनि धरा दुराई । हाथ मलै सिर धुनि पछताई ॥
हाथ मीजि छिनछिन पछितावे । कहि कामिनि धर्महि समुझावे ॥
कामिनि कहै कुबुध समझाई । हम तुम चलहु पुरुषमहँ जाई ॥
बकसै पुरुष दयाकरि तोही । सीस नवायके लीन्हे मोही ॥
बिन दीये बरियाई लैहो । पुरुष लोक पुनि जाय न पैही ॥
कामिनि कहा वचन परवाना । धरमरायके भयो अभिमाना ॥
धर्मराय वचन ।
कामिनि तोरि बुद्धि है थोरी । अब ना जाऊँ पुरुषकी खोरी ॥
पुरुषलोक इहई रचि राखों । रचौ बिचारी बुद्धि बलभाखों ॥
अब तौ पुरुषत्रास नहि मोही । गहौं बाहकों राखा तोही ॥
तैं कन्या का डहकसि मोही । रचा पुरुष भम कारण तोही ॥
तैं कामिनि कठोर निरमोही । रचा पुरुष हमहीं लग तोही ॥