भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पहिल वचन बिहरते बोली । लानी कठिन कामकी गोली ॥
काम सतावै निश दिन मोही । दे पारसकी लीलहुँ तोही ॥

अद्यावचन ।

कामिनि कहै धरम सुनु बाता । चढी कालिमा तोहरे गाता ॥
हठ निग्रह कामिनि किहु ताही । धरमराय पकरी तब बाँही ॥
गही बाँह कामिनिकी जबहीं । काम बाण घट व्यापे तबहीं ॥
धरम राष कामिनिपर कीन्हा । गहि पग सीस लील तेहि लीन्हा ॥
लीलत कामिनि सब्द उचारा । पुरुष २ करि कीन्ह पुकारा ॥
कामिनि पुरुष नाम जब लीन्हौं । आज्ञा पुरुष अंसही दीन्हौं ॥
योगजीत आये तेहि वारा । सुर्त बान सो कालहि मारा ॥
पुरुष कोप ताऊपर कीन्हौं । कन्या उगल धरम तब दीन्हा ॥
उगली कन्या बाहेर आई । देखि काल अति रोष कराई ॥
हाहाकाल रोषकरि धावा । कामिनि पारस कहाँ चोरावा ॥
कामिनी कपट देख विषधारा । पारस मानसरोवर डारा ॥
मानसरोवर झलकै अंगा । गयऊ पताल जहाँ जलरंगा ॥
परीक्षा चार पारस परवाना । उपजी चारखान निरवाना ॥
एक परीक्षाते सरबर गयउ । पारसके सम पारस ठयऊ ॥
दूजो अंश भया निरवाना । शिला सिंधु परवत परमाना ॥
रतन शिला ताहिकी धारा । सो पाजी द्वारे संचारा ॥
तीसर अंश नार प्रगटयऊ । अंशहि अंश चतुरगुन भयऊ ॥
चौथा अंश कामिनि अनुमाना । जाते स्वर्ग नरक परवाना ॥
अंशहि अंश अंशते जानी । एक प्रती चौगुन उत्पानी ॥
चार २ गुन गुनहि समाना । अंशते अंश चतुर परमाना ॥
पारस मानसरोवर माहीं । पारस बुद्धि आपही आहीं ॥
पारस कामिन बहुत दुरावे । सुरेत सनेह तहाँ फिर आवे ॥
पारस अंत नहीं ठहराई । बासरूप कामिनि संग धाई ॥
कामिन काल पुरुष पद परसे । पारष नीर नेत्र मह दरसे ॥
नैन निरख मूरत अनुरागी । धरम अंश कामिनि तन लागी ॥
पारस अंश चितै नहि डोले । बहुरि २ कामिनिस्ों बोले ॥
पारस अंश घट रहा छपाई । निकसी कन्या बाहर आई ॥
जेहि कारण कामिनी हठ कीना । पारस संग छान सो लीना ॥