भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 182

पुरुष अंश लीला औतारा । उपजी कन्या कला अपारा ॥
अनन्त कलासो कन्या धारा । रूप अनूप भया उजियारा ॥
जब कन्या प्रभु उत्पन्न कीन्हां । पाँच स्वासा ता संग दीन्हां ॥
ता स्वासा संग पारस भारी । पांचे तत्व सो देह सँवारी ॥
उपजी कन्या अगम स्वभावा । अष्टंगी कहि पुरुष बुलावा ॥
आठों अङ्ग बना निरवाना । शोभा सुरति रूप सुख साना ॥
जब कन्या प्रभु देखा हेरी । कला अनंत रूपकी ढेरी ॥
देखि रूप चित हर्षित कीन्हा । उत्पति पारस तासंग दीन्हा ॥
जीवन शब्द मूल रहिवासा । सुरति निरति दीन्हा तेहि पासा ॥
पुरुष रचा जब आपु शरीरा । उपजी सुरति निरति गंभीरा ॥
काया कमलको व्यवहारा । जो चाही सो सबै सुधारा ॥
दहिने अंग तेज कर दाऊ । बायें शीतल सबै सुगाऊ ॥
मध्यम पुरुष सुरति अंकुरा । ताहि सुरति संग पारस पूरा ॥
ता दिन तीनों गुन ठयऊ । इंगला पिंगला सुखमन कियऊ ॥
मठ तिरमठ सो तहाँ बनावा । इंगला पिंगला सुखमन नावा ॥
ताहि समय तीनों घर ठयऊ । ईडा पिंगला सुखमन भयऊ ॥
तीनों घर कर तीन सुभाऊ । शीतल तेज समितकर भाऊ ॥
अमी अग्रमय तेज शरीरा । उपजे चन्द्र सूर दोऊ बीरा ॥
अग्र तेज औ सौम्य सुरंगा । तीन शक्ति उपजी तेहि संगा ॥
कला अनंत शक्तिके पासा । लीला बहुत बिचित्र प्रकासा ॥
कला अनंत सक्ति गंभीरा । तीनहु सक्ति मध्य दोय बीरा ॥
तिनहु संग अहै दोउ बीरा । इक शीतल इक तेज शरीरा ॥
तीनों शक्ति अंग दोउ बीरा । काया मथिकथि कहै कबीरा ॥
अभय शक्ति है चन्द्र सनेहा । इंगला नाडी संग उरेहा ॥
उलैघिनी शक्ति सूर सनेहा । पिंगला नाडी संग उरेहा ॥
चेतन शक्ति सुखमना संगा । बसै मध्य तहैं सुरति सुरंगा ॥
बसै मध्य तहैं सुरति तरंगा । सुरति निरति कायाके संगा ॥
नख शिख ज्योति विराजे अङ्गा । शोभा विशद मनोहर संगा ॥
पांचतत्व त्रय सकती राजै । ताहि संग दोय वीर विराजै ॥
तत्वरैंग सकती घरकीन्हां । तेहि महैं उनपनि पारस दीन्हां ॥