कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 179, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकमल झोंकि देख्यो सब न्यारा । भये तिमिर तन तेज अपारा ॥
अंधकार प्रभु देखा जबहीं । काया जोति मलिन भई तबहीं ॥
निमिष एक चित संसय आवा । निमिष एक आनंद समावा ॥
पल सनेह चित संसे आवा । निमिष एक चित हरष समावा ॥
मूल समाधि निमिष ठरि गयउ । जागी सुरत सुपन मिट गयऊ ॥
विस्मय हरष दोऊ एक ठाऊँ । एक पुरुष कर दोऊ सुभाऊ ॥
आपु आपहिं भया अतिचारा । तेही औसर बचन उचारा ॥
उठि अवाज शब्द सतभाऊ । कमल मध्य कस सून्य रहाऊ ॥
घटही वचन आप संधाना । तब चौथी स्वासा बंधाना ॥
तेज पुंज भी गरभ सरीरा । फूँकी नाल देह बल बीरा ॥
कमलनाल धरि फूँका जबहीं । चौथा स्वासा निकसा तबहीं ॥
फूँका कमल तेजके नेहा । चला प्रसेव पुरुषको देहा ॥
फूँकत कमल बार नहिं लागा । भया उजियार तिमिर सबभागा ॥
कारन काल कपट यह धोखा । दुइ चित मूल तेजमैंह रोखा ॥
चौथा स्वासा विषय सनेही । मोह विकार धरमकी देही ॥
मोह विकार तिमर अधिकारा । ता संग भये धरम औतारा ॥
तिसरा स्वासा गुप्तहिं राखा । जाते जोर निरंजन भाखा ॥
फूँकत कमल तेज झरि गयऊ । तेहिंते काल ज्योति धरिभयऊ ॥
जोति जहाँ लगिज्वालाभाखा । तेहिं ते नाम निरंजन राखा ॥
महाबली देही धरिके बैठा । जाने धरममहीं हौं जेठा ॥
तेज लगन स्वासा अनुसार । ताते धरमराय बरियारा ॥
तेज तिमिर संग शून्य निवासा । सबतर भयो काल परगासा ॥
निराकार आकार धराये । जोति काल बहु नाम कहाये ॥
चौदह द्वार काल जो भाखै । सुनि सों सबै नाम मन राखै ॥
सांकित अंड भयो प्रचंडा । फूटत अंड भयो कहु खंडा ॥
चौदह बुन्द अमि ठरि गयऊ । चौदह अंस ताहिंते भयऊ ॥
चौदह पौरिया द्वार बैठारा । इन चौदह बहु ज्ञान पसारा ॥
आप समान सबै रचि राखे । चौदह कोटि ज्ञान तिन भाखे ॥
चौदह अंस धरम तहैं पाये । ते चौदह विद्या पौ लाये ॥
वही चौदहो अगम अपारा । तापर काल धरम बटपारा ॥