भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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गायत्रीवचन ।

कह गायत्री देहु रति मोही । तो कह झूठ जिताऊँ तोही ॥
गायत्री कहै है यह स्वार्थ । जानि कही मैं पुनि परमारथ ॥
सुनि ब्रह्मा चित करै विचारा । अबका जतन करउँ इहि बारा ॥
छन्द—जो विमुख या कह करें अब तो नहीं बनि आवई ॥
साखि तो वह देय नाही जननि मोहि लजावई ॥
यहाँ नाही पिता पायो भयो न एको काज हो ॥
पाप सोचत नहि वनै अब करें रति विधि साजहो ॥
सोरठा—कियो भोग रति रंग, विसरचोसो मन दरसका ॥
दोउ कहैं बढयो उमंग, छल मति बुद्धि प्रगास किये ॥ २६ ॥

सावित्रीउत्पत्तिकी कथा ।

कह ब्रह्मा चल जननी पास । तब गायत्री वचन प्रकासा ॥
औरौ करौ जुगति इक ठानी । दूसरि साखि लेउ उत्पानी ॥
ब्रह्मा कहे भली है वाता । करहु सोइ जेहि मानै माता ॥
तब गायत्री जतन विचारा । देह मैल गहि कीन्ह नियारा ॥
कन्या रचि निज अस मिलावा । नाम सावित्री तासु धरावा ॥
गायत्री तिहि कह समुझावा । कहियो दरस ब्रह्मा पितु पावा ॥
कह सावित्री हम नहि जानी । झूठी साख दै आपनि हानी ॥
यह सुनि दोउ कहैं चिंता व्यापा । यह तो भयो कठिन संतापा ॥
गायत्री बहु विधि समझायी । सावित्रीके मन नहि आयी ॥
पुनि गायत्री कहा बुझाई । तब सावित्री बचन सुनाई ॥
ब्रह्मा कर मोसों रति साजा । तो मैं झूट कहों यहि काजा ॥
गायत्री ब्रह्महि समुझावा । दै रति या कहैं काज बनावा ॥
ब्रह्मा रति सावित्रीहि दीन्हा । पाप मोट आपन शिर लीन्हा ॥
सावित्री कर दूसर नाऊँ । कहि पुहपावति वचन सुनाऊँ ॥
तीनों मिलिके चलि भे तहवों । कन्या आदि कुमारी जहवों ॥

ब्रह्माका गायत्री और सावित्रीके साथ

माताके पास पहुँचना और सबका शाप पाना ।

करि प्रनाम सम्मुख रहे जाई । माता सब पूछी कुसलाई ॥
कहु ब्रह्मा पितु दरसन पाये । दूसरि नारि कहाँसे लाये ॥