कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 847, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंउस जुलाहेने न माना । लोगोंने समझाया कि, हम हिंदू लोग तुझको इन बछड़ोंका मूल्य दे देते हैं, तू इनको हमें दे दे, जुलाहे ने न माना । वे लोग प्रत्येक बछड़ोंका मूल्य पचास पचास रुपया देने लगे । उन बछड़ोंकी सुन्दरता देख मनुष्य दङ्ग हो रहे । दोनों चमकते हुये श्याम रङ्गके थे उनके सींगे हिरणोंके समान पीछेको मुड़ी हुई थीं, उनके माथेपर ऐसे तिलक थे जैसे कि, रामानन्दकी सम्प्रदायके वैरागी बनाते हैं । वैसे ही उनकी छाती तथा दोनों मोड़ोंपर और पीठपर सब चिन्ह थे । उनको लोग वैरागी अथवा ब्राह्मण कहा करते थे । वे दोनों जब युवावस्थापर पहुँचे तो जुलाहेने चाहा कि, उनको हलमें लगावें । लोगोंने बहुत रोका कि, तू ऐसा मत कर, उनका मूल्य हमसे ले ले उनको तू सांड छोड़ दे । सोड़ी प्रतापसिंह ढाई सौ रुपया तथा एक हलकी भूमि दे रहे थे, पर जुलाहेने न माना हठमें आकर कहने लगा कि, इन ब्राह्मणोंको मैं अवश्यही हलमें जोतूंगा । लोग बहुत समझा चुके कि, ये बैल नहीं ये तो सन्त हैं, किसी दोष वश बैल बन गये हैं, तू उनके साथ ऐसा कुकर्म मत कर । जुलाहेने कहा कि, मैं इन ब्राह्मणोंको अवश्यही हलमें जोतूंगा । वे दोनों बैल साधुओंके समान अत्यन्त नरम तथा शान्त स्वभावके थे । छोटे २ लड़के उनसे खेला करते थे उनको जब लड़के पकड़ लेते तो वे अपना सिर झुका देते थे बड़े ही निर्दोष थे, कभी कसीकी कोई हानि न करते थे । प्रत्येक मनुष्य उनको प्यार करता था । जब बैल स्वरूप उन साधुओंको जुलाहे हलमें जोता तो एकबारगीही उसकी देह ढीली होकर ऐसी हो गई कि, जैसी झोला मार जाती है । उसी अवस्थामें जोलाहा मर गया । फिर उसके बेटेने बैलोंको हलमें जोतना चाहा तो लोगोंने मना किया उसने भी कहना न मानकर एक दिन उनको हलमें जोत दिया । उसी दिन उसके पांव में एक ऐसी मेख लगी कि, तलवेको छेदकर पार निकल गई । उस घावपर सेंकड़ों छाले पड़ गये, वह पांव बहुत सूज गया । इसी अवस्थामें तीसरे दिन मर गया । इसी प्रकार उस जुलाहेके घरके सब मनुष्य मर गये । केवल एक आदमी रह गया । तब लोगोंने उसको भी समझाया कि, देख, इन बैलोंको दुःख पहुँचानेसे तेरा घर नष्ट होगया, अब तू इनके साथ अपकार न कर । तब वह जुलाहा उन दोनों बैलोंको दीपमालामें अमृतसरकी मण्डीमें ले गया । सरकारने इन बैलके सौन्दर्यको देखकर सौ रुपये पारितोषिक दिये । एक महाजनने दो सौ रुपया देकर उन बैलोंको खरीद लिया अपने घर ले गया फिर न जाने उन साधुअवतारी बैलोंका क्या हुआ ।
ज्ञानी बैल—एक दूसरा बैल भी उसी गाँवमें एक जमींदारके घर उत्पन्न हो उसीके घर रहता था । उसकी ऐसी अच्छी आदत थी कि, जहाँ उसका स्वामी