भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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खड़ा करदे वहीं खड़ा रहता था। बड़ा सुन्दर पीले रङ्गका सुदृढ़ था। कभी किसी की कोई क्षति न करता था, खेतमें जाता परन्तु जो उसके चारों ओर हरियाली खड़ी होती उसमें कदापि मुँह न लगाता, मालिक जो घास दाना उसके सामने रख दिया करता वही खाता दूसरेको हराम जानता था। उसको जमींदार मण्डी में पांच बार लेगया प्रत्येक बार सौ सौ रुपया इनाम पाता रहा। इस बैलको जब हलमें लगाते तो कोई बैल उसकी समता नहीं कर सकता था। सबसे आगे जाता था यह बैल जब किसी गायके पीछे छोड़ा जावे तो वह उसी गायको अपनी स्त्री समझता था। उसके वीर्यसे जो दूसरी गाय उत्पन्न हो उनको अपनी पुत्रीके तुल्य समझता था। कोई कौसी ही युक्ति क्यों न करे पर अपनी पुत्रियोंके निकट न जाता था।

साधवी राम गऊ-पंजाब देशस्थ फीरोजपुरके डरौली मौजेमें कहींसे फिरती हुई बड़ी सुन्दर एक गाय आ गई थी, उसका रङ्ग श्याम श्वेत मिला हुआ था। बड़े डील डौलकी थी, उसके अङ्ग प्रत्यङ्ग ढङ्गले थे। परन्तु उसका मूत्रस्थान अतिलघु तथा नाम मात्रका था। वह केवल मूत्र त्यागनेकेही निमित्त बना था बच्चा जननेके लिये नहीं था। उसका ऐसा अच्छा स्वभाव था कि, रात दिन एक पीपलके तले बैठे रहा करती। एक तो सबेरे आठ बजेके समय, दूसरे सांझको लगभग चार बजे भोजनके लिये ही बस्तीमें जा अपने निश्चित समय पर गांवमें जाकर गृहस्थोंके द्वारपर खड़ी हो जाया करती। अनाज ही खाती भूसा इत्यादि कुछ नहीं खाती। जो कोई कभी उसके सामने कुछ दाना रख दे तो केवल एक बार मुँह डालती, दूसरी बार कदापि मुँह न लगाती थी फिर आगे चली जाती थी दोनों समय अपना काम करके पीपलके वृक्षके नीचे जा बैठती पुघराया करती। वह भी उस गौका नियम था कि, जिस द्वार पर प्रातःकाल जाती वहां फिर सांझ को न जाती। लोग इस गायकी आदत साधुओंकीसी देखकर उसकी सेवा करने लगे। जहां वह गाय बैठती उस स्थानको भलीप्रकार स्वच्छ कर देते तथा बालू इत्यादि बिछा देते थे। पर वह गाय उस गांवमें केवल एक मास तक ही रही फिर दूसरे फिर तीसरे फिर चौथे गांवमें गई। इसी प्रकार फिरती फिरती न जाने कहाँ चली गई। जिस मनुष्यने उस गायको देखा एवं उसकी सेवा की थी उसीने मुझसे यह कहानी कही थी जैसे यह गाय द्वार द्वार भोजनके लिये जाती थी उसी प्रकार मशकवालेके सामने पानीके लिये खड़ी होती अपना मुँह लगाती पानीवाला पानी पिला देता। लोग उसको राम गऊ कहा करते थे।

जंगमोंका बैल-जङ्गम एक प्रकारके फकीर होते हैं। वे लोग अपने बैल