भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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को ऐसा सिखाते हैं कि, जो कुछ वे आज्ञा करते हैं, वह वही करता है । बैल उनकी सब बातें समझता है । यदि वे लोग कहें कि, आशीर्वाद दे तो वह शिर उठाकर आशीर्वाद दे देता है । यदि कहें कि, दाहिना पांव उठा तो दाहिना पांव उठाता है । बांयाँ पांव उठा तो बांयाँ पांव उठाता है । अमुक चिन्ह पर अपने पांव रखता चला आ तो वह वैसा ही करता है । बैल चतुराईके अनेक काव्योंको किया करता है ।

ग्वालेकी रखवाली—काठियावार तथा नागौर देशमें गायोंके झुण्ड बनमें चरते फिरते हैं । उनका रक्षक उनके साथ रहता है । जब कभी शेर रक्षक पर आ पड़ता है तो सब गायें इकट्ठी हो जाती हैं । चारों ओरसे चक्र बांधकर अपने रक्षक को मध्यमें कर लेती हैं । जिसमें कि, शेर उसको क्षति न पहुंचा सके, उस समय गायोंका मुँह चारों ओर होता है । जिसमें शेर जिधरसे आवे उधरसे रक्षा कर सके । अपने सींगोंको लड़ाईके लिये तैयार रखती हैं । सब एक बारगीही शेरपर आक्रमण करके शेरको भगा देती हैं । कभी कभी आप भी आखेट बन जाती हैं ।

योग्य गऊ—एक गाय एक स्थानपर चरती फिरती थी, उसके ऊपर एक दुष्ट बालक पत्थर मारा करता था । गाय बहुत सहन करनेके पीछे उस बालक की ओर दौड़ी । उसके वस्त्रोंको सींगोंसे फाड़ डाला पर उसको कुछ कष्ट न पहुंचाया । उस लड़केको पकड़कर दूर धर आई फिर आकर चरने लगी । यह गऊकी पूरी योग्यता थी ।

चीता मारनेवाला सांड—एक सांड था जिसने अपने सींगोंसे कितनेही चौपायोंको मार डाला था । यहां तक कि, उसके सींगोंकी नोक जाती रही थी । एक दिन एक चीते एक गायको मारा उस गायकी सहायताके लिये यह सांड दौड़ा, चीता तथा सांडकी लड़ाई होने लगी । गाय तो मर गई पर सांड लड़ता रहा । जब दिन बीतकर रात हुई, वह चीता अपना भोजन लेने आया । वह सांड फिर लड़ने लगा चीतेको मारकर उसी गायके पास गिरा दिया आप भी बहुत घायल हुआ पर लोगोंने उसके घाव सिये । वो पूर्ण स्वस्थ हो गया ।

राक्षसकी गाय—सन् १८५५ ई० में जम्बू काश्मीरके पर्वतोंके बीच मुझको एक साधु मिला । वह मुझसे कहने लगा कि, आठ साधु भ्रमण करते करते पर्वत के भीतर घुस गये । कुछ दूर जानेपर उनको राह नहीं मिली वे भूलकर इधर उधर फिरने लगे, कुछ पता न लगे कि, किधर जावें जब वे भटकते फिरते थे तो उनको एक बड़ी जातिकी गाय मिली उन साधुओंको देखा तो घेर लिया, जिधर साधू जावें वह उधर ही घेर लेती थी । अन्तमें वो उनको घेर घारकर वहां ले चली जहां कि, आप रहती थी । साधु लोग उस गायके स्थानपर पहुँचे तो उन सबको