भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 836

थाप दी, अपने हाथसे सुहलाकर कहा कि, तीन वर्ष पीछे इस शोरको देखा है। जिब्राल्टरसे मैं इस शोरकी रक्षा करता आया हूँ। अब मैं बहुत प्रसन्न हुआ हूँ कि, इस पशुने अकृतज्ञता नहीं की। एहसान नहीं भूला। वास्तवमें वह शोर उस जमादारको देखकर बहुत प्रसन्न जान पड़ता था। अपने प्राचीन मित्रको देखके इधर उधर फिरता था। उसकी उंगलियाँ चाटता हुआ प्रेम प्रगट करता था।

कच्चे मांस खिलानेका दोष—एक शोरको पक्का मांस तथा अन्यान्य वस्तु खिलाकर पाला था। वह शोर कुत्तोंके समान नम्र था। घरमें फिरा करता था। एक दिन कहीं उसने रक्त लगे मांसका भक्षण कर लिया। उसको खातेही बहुत घातक हो गया। अत्यन्त शीघ्रताके साथ उसने उस मनुष्यको जो समीप खड़ा था फाड़ डाला। भयानक रवसे गरजता हुआ वह बनकी ओर चला गया। फिर उसे किसीके आधीन क्यों रहना था?

शोरका प्रेम—एक शोर बड़ा सुन्दर था, उसकी सुन्दरताके कारण वह सङ्गलसे पेरिस नगरको पहुँचाया गया था। जहाजपर चढ़नेके समय बहुत बीमार हो गया था इस कारण उसे मरनेके लिये लोग पृथ्वी पर छोड़ गये। एक पथिक जो आखेटसे आता था उसने उस शोरको अत्यन्त विवश देख उसपर बड़ी करुणा दिखलाई, कुछ दूध उसके मुँहमें डाला। उससे उसको सन्तोष हुआ। उसको आराम मिला। उस समयसे वह शोर ऐसा हिल गया, एवं अपने ऊपर कृपा दिखानेवालेसे इतना प्रेम करने लगा कि, उसके गलेमें रस्सी डालकर कुत्तोंके समान जिधर चाहता उधर ले जाता था। वह खाना भी उसीके हाथसे खाया करता था। शेरनी शोरका रखवाला तथा सेवा करनेवाला एम. फील्कस नामक एक मनुष्य था, उसे बहुत बीमार हो जानेपर शोरकी सेवासे रहित कर दिया गया। कई दिन बीत गये पर सेवा करने न गया। उनकी सेवाके लिये दूसरा मनुष्य नियुक्त किया गया। पर उनका प्रथम सेवक जो उनको पेरिस नगरमें लाया था बीमार पड़नेसे न आया तो शेर भी खाना पीना सब छोड़ पिंजरेके एक कोनेमें उदास पड़ा रहने लगा। कोई भी अपरिचित मनुष्य उसके समीप जाता तो वो उसपर गुराँता हुआ कोलाहल मचाके अरुचि प्रकट करता था। यहाँ तककी अपनी शेरनीके साथ रहनेसे भी घृणा करता हुआ उससे भी पृथक् रहने लगा। वह पशु रोगी जान पड़ता तो भी भयभीत होकर कोई उसके पास नहीं जाता था। अन्तमें उसका सेवक अरोग्यता प्राप्त करके उसके पास आया। उसने पिंजडेकी छड़ोंके समीप जाकर उसको अपना मुँह दिखलाया जिसमें उसको आश्चर्यान्वित