कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 835, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंभोतीलाल ! तुमने बहुत दिनोंसे हमारा अन्न पानी खाया है, तुम आपसे आप चलकर अपने पिंजरेमें घुस जाओ नहीं तो मेरा सामना करो । वह कृतज्ञ व्याघ्र चुपके २ राजाके आगे होकर अपने पिंजरेमें घुस गया । उस दिनसे राजाने उसकी सेवा शुश्रूषाका खर्च बढ़ा दिया ।
कांटानिकालनेवाला—कोट काँगडेके पास एक शेरके पाँवमें लोहेकी ऐसी कील गड़ गयी थी कि, जिसके कारण वह बड़ाही दुःखी हुआ, क्योंकि, उसका पाँव बहुत ही सूज तथा पक गया था । वह एक मनुष्यके सामने बैठ गया अपना पिछला पाँव दिखाया । उसने देखा कि, उस शेरके पाँवमें एक मेख चुभी हुई है जिसके कि, कारण वह चल फिर नहीं सकता है । उस मनुष्यने उसके काँटेको पकड़कर खींच लिया, वह सुखी हो कृतज्ञता दिखाता हुआ चला गया ।
एक अहीरके पास बहुततेरी भेंसें थीं । वह शेर बड़ा बलिष्ठ था । जब भेंसको पकड़कर फेंकता था तो वह दूर जा पड़ती थी । गूजर देखा करता था कि, यह शेर तो हमारी भेंसोंकी बड़ी क्षति करता है । एक दिन उसने देखा कि, शेर भेंसोंके झुण्डमें घुस एक अच्छी भेंसका कान पकड़ उस मनुष्यके घर पर लेगया जिसने कि, उसके पैसे मेख निकाली थी । उसके मकानमें उस भेंसको छोड़कर चला आया । वह गूजर यह कौतुक देखता रहा । जान लिया कि, इस शेरने इस भेंसको इस मनुष्यको दे दिया है । उसने इस बातपर कोई हिचकिचाहट न दिखाई । जिसके घर भेंस गई उसने सानन्द रख लिया । पीछे उस शेरने अहीरकी दूसरी किसी भेंसको कोई भी कष्ट नहीं पहुँचाया ।
इस्पारमनसाहबका मत—अपनी हृष्यदेशकी यात्राके बृत्तान्तमें लिखते हैं कि, यह विचित्र बात है कि, यदि कोई शेरको क्रुद्ध करे तो भी वह सहसा मनुष्यकी हत्या किया नहीं चाहता केवल घायल करके जीवित छोड़ देता है अथवा अत्यन्तही उत्तेजित हो तो भी कुछ विलम्ब करके मारता है ।
होप साहब—का यह कथन है कि, हेमिलटन नगरके रहनेवाले एक धनाढ्य पुरुषकी बेगमके पास एक शेर था, कितने ही लोग उसको देखने आगये । द्वारपालने बेगमको समाचार दिया कि, एक जमादार अन्यान्य मनुष्योंके साथ शेर देखनेके लिये खड़ा है । बेगमकी आज्ञासे जमादार भीतर गया । उस समय शेर शिकारके लिये गुरा रहा था । जमादार शेरसे विज्ञ था, उसने पिंजरेके निकट जाकर उसका नाम लेकर कहा कि, नीरू ! नीरू ! तुम मुझको जानते हो ? उस समय तुरन्त ही वह अपना शिर उठाकर खड़ा हुआ, अपना भोजन छोड़कर पिंजरेके किनारे खड़ा हो दुम हिलाने लगा । उस जमादारने उसपर