कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 803, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंपिण्ड तो अब नष्ट हुआ उसके सुकर्म तथा कुकर्मका हिसाब ब्रह्मांडके विनाश-कालमें होगा । जब पिंडका प्रलय हुआ तब उसी समय उसका हिसाब किताब हो गया । जब ब्रह्मांडका प्रलय होगा तब भी सबका भलीप्रकार हिसाब होगा । सब जीव अपने कर्मोंके साथ परलोकमें दूसरी उत्पत्ति तक रखे जावेंगे, जिसको मृत्युका सकता कहते हैं मुसलमान लोग उसीको कब्रका दुःख कहते हैं । वह जो यथार्थ बात है उसको भूलकर महम्मदी हदीसोंके लिखनेवाले भौति भौतिकी बातें बनाते हैं । कहते हैं कि, जब मनुष्य मर जाता है तब फरिश्ते उसको खुदाके सनीप ले जाते हैं वहाँसे भले बुरेका चिन्ह लेकर फिर उसको कब्रमें ला रखते हैं । यह सब भूल है वे यथार्थ तात्पर्यको न समझकर बातको दूसरे ढङ्गसे कहते हैं । यदि ज्ञानकी स्वच्छता होती तो ऐसी त्रुटी भी न होती । यह क्या बात है कि, रोगी तो मर गया पर उसका कफन दफन सहस्र अथवा लाख बरसके उपरान्त किया जावे । अवश्य ही उसका हिसाब उसी समय होगा ।
५६—कुरान तथा हदीसोंसे प्रगट है कि, जब महाप्रलय हो चुकेगा तो इसके पीछे सबकी भलाई बुराईको तराजूपर धरकर तौलेंगे, प्रत्येक मनुष्य अपनी अपनी भलाई बुराईके अनुसार फल पावेंगा । जिसका पुण्य अधिक होगा वह वैकुण्ठको एवं जिसकी बुराई अधिक होगी वह नरकको जावेगा, जिसकी भलाई-बुराई समान होगी वह मध्यमें जावेगा । मुसलमान लोग नरक तथा वैकुण्ठका वृत्तान्त जैसा उनको कहना आता है वह कहते हैं । वैकुण्ठ तथा नरकके मध्य स्थानको स्पष्ट नहीं कहते । क्योंकि, इस स्थानको पृथिवी कहते हैं । जहाँ पर जीव देह धरता है भौति भौति की योनिमें आवागमन किया करता है । पृथिवी आकाश और नरकवासी सब आवागमनमें संलग्न हैं कोई भी इससे बरी नहीं है ।
५७ बच्चेकी उत्पत्ति—प्रदारजुलनबौअत और तफसीर जलाली इत्यादिमें लिखा है कि, जब बच्चा गर्भमें आता है तब फरिश्ते आत्माको लाकर बच्चेकी मूर्तिमें डाल देते हैं जब यह बालक मातृगर्भसे बहिर्गत होता है तब हँसता है रोता है । जबतक यह बालक अनजान रहता है तबतक उसको वैकुण्ठके सुख दिखाई दिया करते हैं उनको देख देखकर वह हर्षित होता हुआ हँसता है । उसकी दृष्टिसे विलुप्त होनेके पीछे रोता है यह अपनी माताके गर्भसे बहिर्गत होता है उसको संसारकी बुराई तथा पाप घेर लेते हैं वैकुण्ठके पदार्थोंसे परदा हो जाता है । अन्त पूर्णतया अन्धकार घेर लेता है । फिर यह योग्य अवस्थाको प्राप्त कर जप तप करता है जैसी इसकी भक्ति होती है वैसाही प्रकाश प्राप्त कर लेता है ।