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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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उसका स्वरूप ऐसा होगा कि, उसका मूँह मनुष्यकासा और शिरपर गायकी सीगें होंगी, उसकी गायकी पूछ, घोड़ेकी गरदन, चीतेकी पीठ, हरिणकापेट, बन्दरके हाथ, ऊँटके पाँव होंगे और उसके एक हाथमें मुसलमानकी अगूठी तथा दूसरे हाथमें मूसाका ङ्ण्डा होगा । जिसको वह मूसाका सोटा छुलावेगा उसी समय उसका स्वरूप वैकुण्ठवासियोंकासा हो जायगा, जिसके माथेपर मुलेमानकी अगूठीका चिन्ह कर देगा उसी समय वह नरकका हो जावेगा । इस स्वरूपको मसीहूद्दज्जाल और दाबतुलअरज भी कहते हैं । प्रगट हुआ कि इस दाबतुलअरजमें खुदा गमन कर रहा है । नहीं तो उसको ऐसी शक्ति न हो तो यदि खुदा उसमें पैंठा न होता तो यह बल तथा सामर्थ्य कहाँ हो सकता था ?

६८—महाप्रलयका समाचार जड़ तथा चैतन्य सब कहेंगे । इसी कारण जड़में चैतन्य और चैतन्यमें जड़ गमन किया करता है ।

६९—शैतानका नरक जाना—मुसलमान कहते हैं कि, शैतान धिक्कारके योग्य है । भला पहले तो खुदाने कहा था कि, मेरे आतुरिक्त किसीको दण्डवत न करना, फिर खुदाने मिट्टीके पुतलेको दण्डवत करनेको कहा । यह तो खुदाहीकी ओरसे अधिकता थी । यह भी मान लिया कि, खुदाई आज्ञाको मानना उचित था । पर यह भी लिखा है कि, लौहमहफूज पर जब शैतान गया तब वहाँ लिखा हुआ था कि, एक मनुष्य सत्तर सहस्र वर्षतक तपस्या करेगा, अन्तमें वह नरकमें जायगा । शैतान सहस्र वर्ष तक रोता रहा तो भी नरकमें गया । उसकी कोई युक्ति काम न आई ।

मुसद्दस—छः लाख बरस बन्दगी में दिल जो दिया था ।

उस्ताद बदोनेक हयाते आब पिया था ॥

सालह वही इबलीसलकब दोनों लिया था ।

लाहासिल रोना सदहा तोबा किया था ॥

यह देखिले अब अगले करम जीवके जागे ।

तद्बीर नहीं चलती है तकदीर के आगे ॥

आदमसे कहे आदि पुरुष मानलै फरमान ।

हो जाबिता बाहोश व रख साबित ईमान ॥

एकरार खबरदार अदो तेरा है शैतान ।

बेसूद हुआ पन्द जो दुख द्रन्द घेरे आन ॥

दिन आधे ही आदम सो अदन छोड़के भागे ।

तद्बीर नहीं चलती है तकदीरके आगे ॥