कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 805, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंमांसमें हाड़ है, हाड़में गूद है, गूदमें बिन्द है, बिन्दमें पौन है, पौनमें प्राण है, पौन और प्राण क्या भिन्न गाड़ ।
अतः वीर्यके साथ आत्मा है, आत्माके साथ उसके कर्म हैं । यदि वीर्यमें प्राण न होता तो उससे किसी वस्तुकी उत्पत्ति न होती । यदि आत्मा किसी और स्थानसे लाकर मातृगर्भमें डाला जाता तो शरीर भी किसा और स्थानसे लाकर स्त्रीके पेटमें रखा जाता । यह नहीं कि, आत्मा तो बँकुण्ठसे लाई जावे शरीर आपसे आप पेटमें बन जावे ।
५८ जिनका सर्प होना—मदारजुलनबोवतमें कहा है कि, जिन जब होता है तब अपना यथार्थ स्वरूप छोड़कर सर्प बन जाता है । जब उसके आयुका दौरा पूरा होजाता है तब सर्पकी देहमें गमन करता है । उसका चिह्न यह है कि, जब सापको मारते हैं उस समय ध्यान करना चाहिये कि, जिस सर्पके शरीरसे रक्त निकल उसकी जिन समझना चाहिये । जिसमें जलके स्वरूप कुछ पीला पीला या जल निकल उसको यथार्थ सर्प जानना उचित है । जिन तो आवागमन करे पर मनुष्य बिना आवागमनकेही रहे इस बातमें कोई विशेष प्रमाण दिखाई नहीं देता ।
५९ लौहमहफूजपर भाग्य—मुसलमानोंका विश्वास है कि, सब मनुष्योंका भाग्य पहलेसेही लौहमहफूजपर लिखा है । वह लौहमहफूज आकाशपर है दूसरी रवायतमें है कि, प्रत्येक मनुष्यके लिये पृथक् पृथक् लौहमहफूज है । फिर कहते हैं कि, सबके लिये एकही पुलसरात है । दूसरी रवायतम है कि, प्रत्येक मनुष्यके लिये पृथक् पृथक् पुलसरात है । ऐसेही कहा है कि, सबके लिये एकही तराजू है जिस पर सबकी भलाई बुराई तौली जायगी ; फिर दूसरी रवायतमें लिखा है कि, प्रत्येकके लिये पृथक् २ तराजू हैं । ये सब बातें अविद्याके कारण हैं कि कहने तथा समझनेमें लोगोंकी स्पष्टता नहीं । यह मैं पूर्वमें ही लिख आया हूँ कि, पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनोंमें एकही बात है, कुछ विभिन्नता नहीं । यह कुछ कहा नहीं जाता कि, ब्रह्माण्ड पिण्ड हो गया कि, पिण्ड ब्रह्माण्ड हो गया । आकाश तथा पृथ्वी दोनों स्त्री और पुरुष होगये हैं इनसे समस्त संसारकी रचना हुई है यह दोनों दो हैं अथवा एक ? यह कौन कह सके वह लौहमहफूज कहनेको दो है वही दुबिधा तथा धोखा है वो मायाका खेल है उसे कौन पहचान सकेगा, पूर्वजन्मके सब चिन्ह मनुष्योंके शरीरसे दिखाई देते हैं यही लौहमहफूज है । जैसा कि मैं प्रथम लिख आया हूँ यह हृदय बुद्धिके समीप है बुद्धि आत्माके समीप है । आत्मलाभसे सब लाभ है । मनुष्य देह पाकर यदि अपनी मुक्तिका उपाय