भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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प्रथम अंकुर दूसर इच्छा उत्पानी । तिसर मूल चौथ सोहं ठानी ॥
ओहं सोहं की बंधानी । आठ अंस तिन्ते उत्पानी ॥
आठ अंस भए एकहि ध्याना । करता ख्रिस्टिको भयो परवाना ॥
करता सरूप आठ भए अंसा । तिन्हके भए सृष्टि सब वंसा ॥
तेज अंड अंचितकूं दीन्हा । प्रथम सुरत जब उत्पत कीन्हा ॥
जोहं अंस दुसरे भए भाई । धीरज अंड तिन्ह बैठक पाई ॥
तिसरे अंस अंक निरमाई । छमा अण्ड तिन्ह बैठक पाई ॥
चौथे अंस सुकृत है सारा । सत्य अंड है ताहि पसारा ॥
पांचऐ अंस हिरम्पर भाई । सुमत अंड तिन्ह बैठक पाई ॥
दोय अंस दोय करी समाने । तिनका भेद गुरुगम जाने ॥
एक अंस त्रिगुण अवतारा । ते सब सृष्टिके भये कडिहारा ॥
साखी—एती उत्पत सुरत की, भिन्न भिन्न परकार ।

कहें कबीर धर्मदाससों, आगे बंस असार ॥

धर्मदास बचन ।

साँचे सद्गुरु की बलिहारी । धर्मदास विनती अनुसारी ॥
धन्य भाग मोहि मिले गुसाई । अपनो कै मोहि लीन्हमुकताई ॥
चारि वेद अरु सास्त्र पुराना । सबहीके हम सुनिया ज्ञाना ॥
अविगति गति काहु नहिं जानी । जो तुम कही आदिकी बानी ॥
सुरत सोहंगके आठ भए अंशा । तिनके सृष्टि सबही भए वंशा ॥
अपरंपार है तिनका सेषा । अचित्य ख्रिस्टिको कहो विवेषा ॥
साखी—तुम निज सतगुरु सत्य हो, हम निज चिन्हा सोय
अचित ख्रिस्टिको भेद कहो, अविगति पूछौं तोय
धर्मदास तुम बडे विवेकी । तुम्हारे घटमें बुधि बड देखी ॥
अचित्य ख्रिस्टिको कहो पसारा । तेज अंड तिन्ह पाये सारा ॥
वाराहि पालंग अंड विस्तारा । तिहिमें पांच तत्त्व है सारा ॥
इनको बैठक आसन दीन्हा । अंड सिखर लोक तिन्ह कीन्हा ॥
प्रेम सुरति तिन कीन उपचारा । तिन्हते भयो अच्छर विस्तारा ॥
अच्छर सुरत तब मोहमें आई । ताते अंस चार निरमाई ॥
चारिअंस भये चारि परकारा । चौविध दीप चौविधहि पसारा ॥
प्रथम अंस पर माया भयऊ । सो पिरथी तत्त्व बीज निर्मयऊ ॥
दुसरे कूर्म भये अवतारा । पालङ्ग अठानवे कीन्ह विस्तारा ॥