कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 138, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकि, इन प्रमाणोंकी जहाँ जहाँ आवश्यकता है ये वहीं वहीं दे दिये जायें किन्तु, कितने कारणोंसे वह न होसका, इसलिये यहा दे दिया है ।
प्रमाण कबीर वाणीका ।
देबो प्रकरण ५ पृष्ठ २२.
प्रथम वानी सुनियो चितलाई । आदि अंतकी संधि देहुँ बताई ॥
प्रथम आदि समरथ हत सोई । दुसरा अंस हता नहिं कोई ॥
आदि अंकुर सुरति तब कीन्हा । सात करीको गरभ तब दीन्हा ॥
इच्छा सूरति दुसरे उपजाई । सातो करी में चित्त बनियाई ॥
छिपा रूपहिं कीन्ह परगासा । स्वाति रूप इच्छा रहिवासा ॥
सात तेहिंते इच्छा उपजाई । भिन्न भिन्न परकार बनाई ॥
विमल शब्द विगसित तब भयेऊ । तब हुलासबुंद पाँच करिमें दयेऊ ॥
तब पांच अंड भयो उत्पानी । तत एक भिन्न परसानी ॥
नहिं तब धरनी नहिं अकासा । नहिं तब दुसरो हतो अवासा ॥
धावै अंड करै चौचन्दा । आपु अदेख और सहज अनन्दा ॥
तबकी बात नहीं कोई जाने । कहाँ समुझाय तो झगरा ठाने ॥
धर्मदास सुनियो चितलाई । फूटो अंड सूरतसे भाई ॥
सहज अंकुर बीज निरमाई । तिहिंकी इच्छा अंड उपजाई ॥
तब सरबनते साजी बानी । तेहिंते मूल सुरति उत्पानी ॥
अबोलबुन्दतेहिं सुरतिको दीन्हा । पांच अंश तब उत्पन कीन्हा ॥
पांचों अंस तब कहाँ बुझाई । पांचों अंडमें तुम जाओ समाई ॥
एकहिं एक अंड तब गयेऊ । आपहु आप कलामें ठयेऊ ॥
तबअविगति एक खेल बनावा । पांच सरूप पांचों अंडहिं आवा ॥
फूटो अंड तेज भई धारा । सबमें देखु पांच ततसारा ॥
पांच तत भिन्न भिन्न विस्तारा । सात अद्विस्ट तेहिंमाहिं संचारा ॥
देखि सरूप अंडकर भाई । सोहंग सुरति तबहिं उपजाई ॥
पुरुष सकती भई दौय प्रकारा । तिन्हको सोंप्यो उत्पन सारा ॥
तासों अंकुर भेद बतावा । वचन सुरत एक संग समावा ॥
ताते ओहं पुरुषको अंसा । ओहं सोहं भए दो बंसा ॥
तिनकी आज्ञा उत्पन्न कीन्ही । शब्द सनद उनहूको दीन्ही ॥
मूलसुरति औ पुरुष पुराना । रचना बाहेर कीन्ह अस्थाना ॥
ओहं सोहं अंडनमें रहेऊ । सकल सृष्टिके कर्ता कहेऊ ॥