कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 140, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंतिसरे अदली अंस निरमावा । सेसनाग सो नाम धरावा ॥
चौथे अंस भए धरमराई । जिन्ह पाप पुण्यको लेखा पाई ॥
चारि अंस अच्छर ते भयऊ । चार अंस चार मत ठयऊ ॥
तब समरथ अनिगति यक कीन्हा । पूरी नींद अच्छरको दीन्हा ॥
चौसठ जुगलौं सोय सिराई । तौलौं कैल सुरत ठहराई ॥
समरथ सुरति जल तत्त्व समानी । कैल अंड कीन्हा उत्पानी ॥
तेहि पीछे अक्षर पुनि जागा । मोह तत्त भये अनुरागा ॥
चक्रित होय अच्छर बिलखाना । सोई मोह सब स्लिस्ट समाना ॥
अंड स्लिस्टमें देखा भाई । व्याकुल भए यह किन निरमाई ॥
समरथ छाप अंड सिर दीन्हा । अच्छर छापदेखि सो लीन्हा ॥
सोई अंड जलमें बिहराना । जिनको वेद नारायण माना ॥
ताते जोत निरंजन भयेऊ । तिनको सब जग करता कहेऊ ॥
अच्छर सुरति समरथकी बानी । तेहि गुण खेल भए उत्पानी ॥
निरंजन नाम अच्छर ठहराई । अर्चित भेद नहिं पावै भाई ॥
कैलिहिं देखा सकल पसारा । तब अच्छर सो वचन उचारा ॥
देउ पिता मोहि आग्या सोई । जो कछु इच्छा उपज्यो मोई ॥
सेवा करत सत्तर जुग बीता । तब मुख बोलै पुरुष अतीता ॥
जाव पुत्र जहां प्रिथ्वीको मूला । तहां कूरम बैठे अस्थूला ॥
सृष्टि भंडार कूरमको भाई । सोलह माथ हथ चौसठ पाई ॥
चले निरंजन कुरम लगि आये । पुरुष ध्यानसे कुरम जगाये ॥
उत्पति हमकूं मागे देह । ना देहो तो मारिकै लेहैं ॥
तर्वाहि कूर्म अपने मन मानी । ऐतो कैल भयो अभिमानी ॥
हम माँगे कछु देब न भाई । जाउ पुरुष लगिवेगि सिध्दाई ॥
कैल कूर्मते युद्ध निर्मयऊ । माथा तीनछीन पुनि लयऊ ॥
लेकर माथै सुन्यमें आवा । कैल सुरत घट मोह समावा ॥
तीनों माथे भच्छ तब लीन्हा । तबते अच्छर पुरुष डर कीन्हा ॥
मनमें तब अभिमान समाई । त कर जोरिके सेवा लाई ॥
सोला चौकडी जब चलिआई । तब लगि निरंजन सेवा लाई ॥
अच्छरपुरुष जो कीन्ह विचारा । तिन्हको समरथ वचन उचारा ॥
विदेह बानि तब अच्छर पाई । तो बानी कन्या भइ भाई ॥
ताको बहुत सिखापन दीन्हा । अस्तंगी तिन कन्या कीन्हा ॥